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जिनकी सहज अभिनय शैली से जुड़ जाते थे दर्शक

स्मृति शेष: राजू श्रीवास्तव दर्शक वर्ग अपने को सीधे राजू की सहज अभिनय शैली से जोड़ पाता था। साहित्य में जिसे साधारणीकरण कहते हैं, राजू उस स्थिति तक दर्शक को ले जाने में कामयाब हो जाते थे। राजू एक खांटी कलाकार थे। उनके अंदर लगातार पतनशील होते समाज और कथनी- करनी के अंतर को पकडऩे की दृष्टि थी ।

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Patrika Desk

Sep 23, 2022

जिनकी सहज अभिनय शैली से जुड़ जाते थे दर्शक

जिनकी सहज अभिनय शैली से जुड़ जाते थे दर्शक

अतुल चतुर्वेदी
लेखक और व्यंग्यकार


स्वास्थ्य के मोर्चे पर लम्बी लड़ाई लड़ते-लड़ते राजू श्रीवास्तव आखिरकार हार गए। राजू लंबे संघर्ष और रिजेक्शन के बाद अपनी प्रतिभा के दम पर हास्य की दुनिया में पहचान बना पाए थे। कानपुर से शुरू हुआ उनका यह सफर एक ऐसे कलाकार का सफर था, जिसने आम आदमी के जीवन के अनुभव को न केवल बारीकी से पकड़ा, बल्कि उसमें मानवीय मनोवृत्ति के विकार और विसंगतियों को पिरोकर उसे विशाल दर्शक वर्ग के सम्मुख रखा और उनका दिल भी जीता। वे छोटी से छोटी चीजों से भी हास्य निकाल लेते थे। चाहे सड़क पर बैठी गाय हो या गांव की बारात और ट्यूब लाइट का दृश्य । भैसों का पगुराना हो या कुत्तों की लड़ाई, उनका गजोधर चरित्र जन-जन की पीड़ा को व्यक्त करता था। दर्शक वर्ग अपने को सीधे राजू की सहज अभिनय शैली से जोड़ पाता था। साहित्य में जिसे साधारणीकरण कहते हैं, राजू उस स्थिति तक दर्शक को ले जाने में कामयाब हो जाते थे। राजू एक खांटी कलाकार थे। उनके अंदर लगातार पतनशील होते समाज और कथनी- करनी के अंतर को पकडऩे की दृष्टि थी ।
आज के हास्य कलाकार कॉमेडी के विषय में युवा वर्ग को विशेष रूप से लक्षित करते हैं और बेरोजगारी, फ्लर्ट, ब्रेकअप आदि को परोसते हैं। कॉमेडी के इस कारोबार में अश्लीलता भी तेजी से जगह बनाती जा रही है। इन लाफ्टर शो में जम कर गालियों का प्रयोग ही नहीं किया जाता, बल्कि दर्शकों की उम्र और पारिवारिक मर्यादाओं और रिश्तों का भी जमकर मजाक उड़ाया जाता है। इससे हमारे संस्कारों की जड़ों पर कहीं न कहीं आघात भी हो रहा है। हंसी एक प्रकार का विरेचन है, निर्मल मन की पुकार है। हास्य का एक उपांग भले ही खिल्ली उड़ाना हो जैसा कि हम चार्ली चैपलिन आदि बड़े कलाकारों के सिनेमा में देखते हैं, लेकिन वह हंसी है ताकतवर के विरूद्ध जयघोष या उसे चुनौती देना, न कि निर्बल का उपहास या सामाजिक ढांचे पर बेवजह प्रहार करना। चार्ली चैपलिन, जानी वाकर, महमूद और राजू जैसे कलाकारों ने हास्य को नई ऊंचाइयां दीं। हास्य के संसार को वैविध्यपूर्ण और समृद्ध किया। एक बड़ा दर्शक वर्ग तैयार किया और उनके बौद्धिक स्तर को भी उन्नत किया। उन बुराइयों की ओर इशारा किया, जो इंसानियत और समतामूलक समाज की स्थापना में बाधक हैं। प्रसिद्ध कवि और सिनेमा समीक्षक विष्णु खरे अपने एक लेख में लिखते हैं कि चार्ली करुणा और हास्य का दुर्लभ संयोग उत्पन्न कर देते हैं। कालांतर में आवारा और श्री 420 में अभिनेता राजकपूर भी इसी शैली का अनुकरण करते दिखाई देते हैं। उन्होंने चार्ली चैपलिन की नकल के आरोपों की परवाह नहीं की। कमोबेश यही करुणा महमूद और हालिया राजू के कॉमेडी शो में दिखाई देती थी ।
जो कलाकार जीवन संघर्ष की गलियों से निकल कर आता है, वह कला को जीवन के उद्देश्य से ही संबद्ध करेगा और उसके मूल मर्म को दर्शकों तक पहुंचाकर उनका मानसिक स्तर उन्नत करना चाहेगा, उनको आने वाले खतरों के प्रति और सजग भी करेगा। हमारे हास्य कलाकारों और कॉमेडी शो, लाफ्टर शो के कर्णधारों को गंभीरता से इस बारे में सोचना होगा कि वे न केवल समाज की समरसता के ताने-बाने को बनाए रखें, बल्कि भारत के विविधतापूर्ण समाज की संरचना का भी ध्यान रखें। ध्यान रहे हास्य कहीं फूहड़ता और अश्लीलता के पंक में जाकर उद्देश्य से न विमुख हो जाए। दूसरों पर हंसना आजकल खतरे से खाली नहीं। हंसी को लेकर हमारा समाज आज संकीर्णताओं का शिकार होता जा रहा है। स्वयं पर कार्टून बनवाने और उस पर दस्तखत करने का औदार्य कितने राजनेताओं में बचा है? किसी कवि के शब्दों में हंसी गूलर का फूल हो गई है, वह लैंगिक मजाक और अशिष्ट दोहरे अर्थ वाले चलताऊ कमेंट में परिवर्तित हो गई है। राजू ने इस कठिन दौर में भी अपनी विशेषताओं से हास्य को स्तरहीन होने से बचाए रखा। यही वह प्राण तत्व है, जिसने एक विशाल दर्शक और उनके चहेते वर्ग की आंखों को नम कर दिया।