
अब बच्चों के मुंह से एकाएक वह सब सुन लेना या ऐसा कुछ कर जाना जो उसकी उम्र के प्रतिकूल है, हम वयस्कों को शर्मिंदा व अन्यमनस्क कर रहा है।
आज मासूम बचपन तीव्र-संचार की हमारी इस आधुनिक दुनिया में बहुत तेजी से वयस्क हो उस दुनिया में सहज ही घुसपैठ करने लगा है, जहां उनका प्रवेश कुछ समय पहले निषेध घोषित था। आज सबसे बड़ी चुनौती मासूमियत को निष्कलंक व पवित्र रखने की है। अब बच्चों के मुंह से एकाएक वह सब सुन लेना या ऐसा कुछ कर जाना जो उसकी उम्र के प्रतिकूल है, हम वयस्कों को शर्मिंदा व अन्यमनस्क कर रहा है। इन्हीं में से कुछ को अब अपराधी व बलात्कारी का तमगा भी संकोच व हैरत के साथ मिल जाना समाज की तथाकथित प्रगतिशीलता व संवेदशीलता को कठघरे में खड़ा कर देता है।
बारीकी से देखें तो यह अव्यक्त नैराश्य की स्थिति है जिसे हम भी नजरअंदाज करना सीख रहे हैं या यों कहिए कि आधुनिकता पर दोष मढ़कर पतली गली से निकल रहे हैं। जबकि यही कटु सत्य है कि इस स्थिति के हम सब जिम्मेदार हैं। याद कीजिए कि कितनी बार हमने ही घर-परिवार में गुरिल्ला युद्ध पद्धति से रिश्तों की मर्यादा को किनारे कर दिया था। घर से बाहर हमारे द्वारा चयनित ट्यूटर व शिक्षक भी कम जिम्मेदार नही हैं, जो अपने बैच के स्तर को बढ़ाने के लिये बच्चों को गाहे-बगाहे मानसिक यंत्रणा देने की हद तक लांघ जाते हैं। यह यंत्रणा अवसाद बनकर बच्चों को जीवन के प्रति कठोर व निरंकुश बना रही है व बेवक्त समझदार भी। आखिर हम सब क्या करें जो भविष्य के कर्णधारों की मासूमियत कुछ देर और नैसर्गिक रह सके ताकि वे महसूस कर सकें कि रिश्तों की खुशबू सूंघने को ही जुगनू नीचे उतरते हैं। उन्हें यह महीन अंतर समझाना ही होगा कि आज भी अगर एक गौरेया इंसानी बस्ती में सुरक्षित है तो बस्ती से बाहर भी कोई बाज अपने हिस्से के प्रति आश्वस्त है।
बच्चों की मासूमियत को बचाने के लिये हम वयस्कों को भी कुछ अधिक मासूम बने रहने की कवायद करनी ही पड़ेगी। आखिर जो बीज हम आज बो रहे हैं वे ही कल हमारी छाया बनने वाले हैं... दूसरों के लिए नहीं तो खुद के लिए ही कुछ संवेदनशील हो जाएं, कुछ स्वार्थी भी!! बस, हमारे बच्चे मासूम रह सकें, इसके लिए हम सबको अपने हिस्से की मासूमियत को बचाए रखना है।
इतना भी मुश्किल नहीं है मासूम बने रहना!
बस, मासूम नकाब तराशने मुल्तवी किए जाएं!!
- मंजुला बिष्ट
Published on:
18 Sept 2018 04:00 pm
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