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बच्चों की दुनिया में लाइक और फॉलोअर्स के पीछे छिपे खतरे

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के संचार मंत्री मिशेल रोलैंड ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला बिल संसद में पेश किया।

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ऋतु सारस्व, समाजशास्त्री और स्तम्भकार


हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के संचार मंत्री मिशेल रोलैंड ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला बिल संसद में पेश किया। रोलैंड ने कहा इसका उद्देश्य युवाओं को सुरक्षा देना है ना कि उन्हें दंडित या अलग-अलग करना। गौरतलब है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म सेवा जांच के लिए ऑस्ट्रेलियाई प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता आयोग की अंतरिम रिपोर्ट में किडफ्लुएंसर्स से संबंधित प्रमुख मुद्दों को स्वीकार किया गया था, जिसमें गोपनीयता संबंधी चिंताएं और संभावित श्रम शोषण के मुद्दे शामिल थे। वर्ष 2020 में फ्रांस ने बाल कलाकारों को फ्रांसीसी श्रम संहिता में सम्मिलित कर उनकी रक्षा के लिए कानून पारित किया। इस कानून के तहत, माता-पिता को अपने बच्चों को उनके श्रम से जुड़ी ऑनलाइन गतिविधियों में शामिल करने से पहले सरकारी अनुमति की आवश्यकता होगी।
भारतीय बाल श्रम निषेध कानून में 2016 का संशोधन बच्चे को विज्ञापन, फिल्म, टेलीविजन धारावाहिक या अन्य मनोरंजन या खेल गतिविधियों सहित ऑडियो-विजुअल मनोरंजन उद्योग में एक कलाकार के रूप में काम करने की अनुमति देता है, ऐसी शर्तों और सुरक्षा उपायों के अधीन, जिससे यह निर्धारित किया जा सके कि इस खंड के तहत ऐसा कोई भी काम बच्चे की स्कूली शिक्षा को प्रभावित नहीं करेगा। बाल श्रम कानून के निषेध की धारा से बाहर यक्ष प्रश्न यह है कि क्या किडफ्लुएंसर्स सुरक्षित हैं? हाल ही में अभिनव अरोड़ा का मामला चर्चा का विषय बनकर उभरा जब अभिनव की मां ने सोशल मीडिया पर अभिनव को निरंतर ट्रोल किए जाने तथा जान से मारने की धमकी दी जाने की शिकायत करते हुए न्यायालय की शरण ली। अभिनव ने बाल संत के रूप में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी एक पहचान बनाई है। अभिनव ने दावा किया कि वह और उसकी बहन यूट्यूब ट्रोलर्स की वजह से स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। पत्रकार जेनिफर वैलेंटिनो-डेविरी और माइकल एच. केलर का शोध ‘ए मार्केटप्लेस ऑफ गर्ल इन्फ्लुएंसर्स मैनेज्ड बाय मॉम्स एंड स्टाल्क्ड बाय मेन’ उस प्रवृत्ति को उजागर करता है कि जैसे-जैसे छोटी बच्चियों के अकाउंट्स के फॉलोअर्स बढ़ते हैं, वैसे-वैसे उनमें पुरुषों का अनुपात भी बढ़ता जाता है, जिनमें से कई बार आपत्तिजनक सामग्री के लिए माताओं और बेटियों को आरंभ में निवेदन किया जाता है और उनकी बात ना मानने पर धमकाया या ब्लैकमेल किया जाता है। बाल सुरक्षा के लिए कार्यरत संस्था थॉर्न का शोध बताता है कि किस प्रकार किडफ्लूएंसर संस्कृति संभावित बाल शोषण तथा अन्य समस्याओं के लिए द्वार खोलती है। लाइक, फॉलोअर, शेयर और व्यू की संख्या एक इन्फ्लुएंसर की सफलता निर्धारित करती है जो इस पीढ़ी पर भारी पड़ सकती है। इसके अलावा, वे इसका इस्तेमाल अपने आत्म-मूल्य को मापने के लिए करते हैं।
युवा इन्फ्लुएंसर अक्सर बाहरी ध्यान और उन्हें देखे जाने के बारे में सोचते रहते हैं। स्वयं को प्रभावी दिखाने की छवि मन मस्तिष्क में इस तरह जगह बना लेती है कि बाहरी दुनिया से प्राप्त प्रशंसा में थोड़ी भी कमी उन्हें अवसादग्रस्त बना देती है। मौजूदा टिक टॉक स्टार, चार्ली और डिक्सी डी’मेलियो ने ऑनलाइन आलोचना और ट्रोलिंग के कारण मानसिक स्वास्थ्य के साथ अपने संघर्ष के बारे में अपने दर्शकों के सामने खुलकर बात की है। अपने हुलु रियलिटी शो ‘द डी’मेलियो शो’ में उसने यह कहा कि नकारात्मक टिप्पणियां और हर दिन यह जांचना कि मेरे बारे में कौन बात कर रहा है, मेरी चिंता का एक बड़ा हिस्सा है।’ यह निर्विवाद है कि जब किसी सार्वजनिक मंच से कोई तस्वीर सामने रखी जाती है तो उसका उपयोग किसी भी तरह से, किसी के द्वारा भी नकारात्मक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। प्रसिद्धि और धन की ललक में बच्चों को सोशल मीडिया की ओर धकेलना किसी भी स्थिति में उनके उज्जवल भविष्य के लिए घातक है और यह अभिभावकों का दायित्व है कि वह अपने बच्चों को इस दुनिया से दूर रखें, अन्यथा प्रसिद्धि की चाह कहीं बच्चों को किसी अनचाहे खतरे की ओर न धकेल दे।