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Patrika Opinion: सत्ता की चाह बना गठबंधन का मकसद

बेहतर हो कि राजनीतिक दलों में न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत एकता भी हो और चुनाव से पहले नेता भी तय हो।

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Nitin Kumar

Jul 17, 2023

Patrika Opinion: सत्ता की चाह बना गठबंधन का मकसद

Patrika Opinion: सत्ता की चाह बना गठबंधन का मकसद

लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई देते ही हमेशा की तरह राजनीतिक दलों में एकता के सुर तेज होने लगे हैं। विपक्षी दल, पटना की कवायद को आगे बढ़ाते हुए बेंगलूरु में भावी रणनीति बनाने में जुटे हैं तो केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा भी सहयोगियों की संख्या बढ़ाने के लिए मंगलवार को देश की राजधानी में एनडीए की बड़ी बैठक करने जा रही है। सब जानते हैं कि एकता की ऐसी कवायद में न तो विचारधारा का कोई महत्त्व है और न ही जनता से जुड़े मसलों पर साझा कार्यक्रम का। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, मकसद एक ही रहता है- येन-केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना।

बात चाहे एनडीए की हो या फिर यूपीए की, दोनों खेमों में शामिल हो रहे राजनीतिक दलों के इतिहास पर नजर डालें तो भाजपा और कांग्रेस को छोडक़र शेष दल कभी न कभी दोनों मोर्चों में भागीदारी करके सत्ता का सुख लूट चुके हैं। हालत यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन में शामिल रहे उद्धव ठाकरे और नीतीश कुमार इस बार विपक्षी एकता को मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं एनसीपी का एक धड़ा भाजपा के साथ जुड़ गया है। तेलुगुदेशम और जनता दल (एस) सरीखे दल भी इस बार भाजपा के साथ जुडक़र राजनीतिक संभावनाएं तलाश कर रहे हैं। इसका सीधा और साफ मतलब है। ऐसे दलों की प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ अपने अस्तित्व को बचाए रखते हुए सत्ता से जुड़े रहना है। हर चुनाव से पहले एकता के नाम पर बनने वाले ऐसे गठजोड़ों का चुनाव के बाद क्या हश्र होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। आपातकाल के बाद 1977 में शुरू हुई विपक्षी एकता की कवायद कई बार हुई, लेकिन यह कभी स्थायी नहीं रही। सत्ता पाने या बचाने के लिए किए गए इन गठजोड़ों को जनता ने कभी स्थायी समर्थन नहीं दिया। आज जरूरत गठजोड़ की हो सकती है, लेकिन ऐसे गठजोड़ ईमानदारी से होंं, तब ही इनकी सार्थकता साबित हो पाएगी। एक बात यह भी है कि एकता की जुगलबंदी को हवा देने वाले अधिसंख्य दलों का प्रभाव सीमित है और इनकी प्राथमिकता अपने वर्चस्व को बचाए रखने से अधिक कुछ नहीं जान पड़ती है। बेहतर हो कि राजनीतिक दलों में न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत एकता भी हो और चुनाव से पहले नेता भी तय हो।

देखा गया है कि चुनाव पूर्व के गठबंधन भी परिणाम आने के बाद टूट जाते हैं। एक दूसरे के विरोधी दल भी मिलकर सरकार बना लेते हैं। इस तरह जनता ठगी जाती है। यह प्रवृत्ति किसी भी लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं मानी जा सकती। राजनीतिक दलों को अपने कुछ सिद्धांत तो रखने ही चाहिए।