
पुरातन और विज्ञान: ब्रह्मा के चार मुख और सूर्य की स्थिति
प्रमोद भार्गव
ब्रह्मा सनातन धर्म के आदि देव और सृष्टि के सर्जक हैं। ब्रह्म या ब्रह्मा प्रकृति की वह अदृश्य शक्ति है, जिनकी मुट्ठी में सृजन के सूत्र हैं। पुरातन मनीषियों ने इन्हें समझा और वैज्ञानिक ढंग से रोचक कथाओं में मानवीकरण किया। अतएव ब्रह्मा सृष्टि-सृजन के उद्देश्य से जब सावित्री का ध्यान करते हुए साधना करते हैं तो उनका अण्ड रूपी शरीर नर व मादा दो स्वतंत्र भागों में बंट जाता है। यही पिंड मनु और शतरूपा कहलाए। इसी शतरूपा को सरस्वती, सावित्री, गायत्री एवं ब्राह्माणी कहा गया है। पद्म-पुराण में कहा है कि ब्रह्मा की पीढिय़ों ने राजस्थान के पुष्कर में दस हजार वर्ष रहकर सृष्टि-सृजन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। ब्रह्मा के चार सिर चारों दिशाओं में निहारने के प्रतीक हैं। आकाश में अवलोकन के लिए उनका पांचवां सिर भी प्रगट होते दर्शाया है। इस मुख को हम नभचरों के सृजन का ध्यान रखने के क्रम में देख सकते हैं।
हालांकि इस सिर को अंत में शिव काट देते हैं। फलत: ब्रह्मा चतुरमुखी ही रह जाते हैं। ब्रह्मा के चार मुख सूर्य की चार प्राकृतिक अवस्थाओं और वर्ण के प्रतीक हैं। उदयकालीन सूर्य, ब्रह्मा का रक्तवर्णी मुख है। अस्तमान अर्थात सायंकालीन सूर्य, ब्रह्मा का कृष्णवर्णी मुख है और रात्रिकालीन सूर्य, नारायण-श्यामवर्णी मुख है। इस नाते ब्रह्मा परिक्रमा करती हुई अतीन्द्रीय माया की काया के पार सूर्य के रूप और रंग का अनुसंधान कर रहे होते हैं। यहां ब्रह्मा के ये चार मुख सूर्य की प्रकृति को जानने की जिज्ञासा से जुड़े हैं। ब्रह्मा के चार मुख बुद्धि तत्व के भी प्रतीक हैं। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य ये चार भाव बुद्धि में प्रखरता लाते हैं। अतएव यही चार मुख चार वेद, चार युग और चार वर्णों के भी प्रतीक हैं। साफ है, ऋषि-मुनि प्रकृति के साथ-साथ शरीर-रचना के गूढ़ रहस्यों को भी ब्रह्मा और उनकी गतिविधियों के रूप में व्यक्त करते रहे हैं।
(लेखक लेखक एवं साहित्यकार हैं और मिथकों को वैज्ञानिक नजरिए से देखने की दक्षता रखते हैं)
Published on:
01 Mar 2021 07:27 am
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