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शराब त्रासदियों से नुकसान असल में कहीं ज्यादा

सामयिक: जरूरी है शराब उत्पादन, विक्रय और खपत के चलते सेहत पर प्रतिकूल असर का लागत-लाभ विश्लेषण

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जयपुर

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Nitin Kumar

Jul 02, 2024

मिलिंद कुमार शर्मा

एमबीएम विश्वविद्यालय, जोधपुर के प्रोडक्शन एंड इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर

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कुछ दिन पहले तमिलनाडु के कल्लाकुरिची जिले के करुणापुरम गांव में हुई जहरीली शराब दुखान्तिका में अब तक साठ से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और कई लोग अब भी गंभीर रूप से अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। एक ओर वर्ष 2047 तक देश विकासशील से विकसित होने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प है, वहीं इस तरह की दुखान्तिकाओं का घटित होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यहां यह रेखांकित करना आवश्यक है कि ऐसी दुर्घटनाओं में समाज के सबसे निर्धन एवं कामगार वर्ग से आने वाले लोग ही अत्यधिक प्रभावित होते हैं।

जहरीली शराब को बनाने में प्रयुक्त मेथेनॉल प्रमुखत: जानलेवा कारक होता है। मेथेनॉल का औद्योगिक प्रयोग मुख्यत: कृत्रिम सूत, फाइबर, कपड़ा, पेंट, औषधि, निर्माण कार्य में प्रयुक्त प्लाइवुड, कृषि रसायनों इत्यादि में होता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मेथेनॉल हमारे दैनिक जीवन में काम आने वाले रसायनों में से एक प्रमुख रासायनिक पदार्थ है। पर इसका प्रयोग सस्ती कच्ची शराब में होने पर यह अत्यंत घातक सिद्ध हो सकता है।

किसी भी वयस्क के लिए शुद्ध मेथेनॉल के एक मिलीलीटर के 10वें अंश का प्रति किलोग्राम भार के हिसाब से उपभोग उसके जीवन के लिए अत्यंत जोखिम भरा हो सकता है क्योंकि इसका सीधा दुष्प्रभाव यकृत की अम्ल-क्षार प्रणाली पर पड़ता है जिससे रक्त अम्लीय हो जाता है। रक्त के अत्यंत अम्लीय होने पर यह श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। चिकित्सीय भाषा में इसे रक्ताम्लता या एसिडिमिया के रूप में जाना जाता है।

मेथेनॉल के उपभोग से दृश्य हानि, अंधता एवं मस्तिष्क में रक्तस्राव से मृत्यु की भी आशंका रहती है। प्राय: यह देखा गया है कि मेथेनॉल के उपभोग का प्रभाव दो दिन तक रहता है। अत: इसका अनवरत प्रयोग शरीर को स्थायी रूप से क्षीण कर सकता है। यह जांच का विषय होना चाहिए कि उद्योग में काम आने वाले इस नियंत्रित रसायन की सुलभ उपलब्धता किस प्रकार कच्ची शराब बनाने में हो जाती है, जिससे कई मानव जीवन एवं परिवार काल कलवित हो जाते हैं। दूसरी ओर, प्रामाणिक शराब बनाने में एथेनॉल का प्रयोग होता है, जो कि एक मनो-सक्रिय औषधि है। इसका अल्प मात्रा में सेवन तंत्रिका संचरण का स्तर कम कर नशा उत्पन्न करता है। यह भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है पर मेथेनॉल जितना नहीं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, लम्बे समय तक एथेनॉल का अल्प उपभोग भी स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता है क्योंकि इससे कैंसर, हृदयाघात, उच्च रक्तचाप, मधुमेह जैसी गंभीर व्याधियां उत्पन्न होने की संभावना रहती है। चूंकि प्रामाणिक शराब अवैध रूप से विक्रय की जाने वाली कच्ची शराब की तुलना में महंगी रहती है इसलिए निचले तबके के लोग या दिहाड़ी मजदूर वर्ग अक्सर कच्ची शराब की तरफ आकर्षित होता है और उन्हें ही इस त्रासदी का शिकार बनना पड़ता है। जहां सरकारों के लिए शराब विक्रय राजकोषीय आय का एक बड़ा स्रोत है, वहीं दूसरी ओर कच्ची शराब से होने वाली जनहानि से जूझना भी एक बड़ी चुनौती है।

एक तरफ जहां शराबबंदी से सरकारों को राजकोषीय घाटा झेलना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर तमिलनाडु में हुई शराब दुखान्तिका जैसी त्रासदी के फलस्वरूप होने वाले जनसांख्यिकीय नुकसान का आकलन भी अब आवश्यक हो गया है। शराब उत्पादन एवं इसके विक्रय से होने वाली आय से सरकारों को पूंजी निवेश एवं समाज कल्याण से जुड़ी योजनाएं लागू करने में मदद मिलती है, पर अब समय आ गया है कि नीति निर्धारक इसके लागत-लाभ विश्लेषण पर गंभीरतापूर्वक विचार करें, और शराब दुखान्तिकाओं एवं शराब से जन सामान्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर भार, हेल्थकेयर क्षेत्र से जुड़े कार्मिकों की उत्पादकता एवं दूसरी सामाजिक व नैतिक समस्याओं के बारे में भी चिंतन करें। यद्यपि कुछ राज्यों जैसे कि गुजरात, बिहार, नगालैंड और मिजोरम में पूर्ण शराबबंदी है, पर यह समस्या का स्थायी समाधान भी नहीं है क्योंकि तब समाजकंटक इसके अवैध व्यापार को बढ़ावा देते हैं। इस संकट का एक प्रभावी हल जन जागरूकता हो सकता है। सरकारों एवं गैर-सरकारी संस्थानों को चाहिए कि वे निचले तबके के लोगों को नशे की लत से दूर करने के लिए गंभीर प्रयास करें।