
आजादी बनाए रखने का भी मंत्र है 'करो या मरो'
प्रवीण चन्द्र छाबड़ा
वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय स्वाधीनता के आंदोलन में १९२० से १९४२ के वर्षों में शांतिपूर्ण संघर्ष से अहिंसक शक्ति प्राप्त हुई। उसके उपयोग का अवसर ९ अगस्त १९४२ को ही आ गया। कांग्रेस महासमिति की ८ अगस्त की बैठक की रात्रि में महात्मा गांधी ने 'अंग्रेजों, भारत छोड़ो' की चुनौती दी। 'करो या मरो' के आह्वान के साथ अगले ही दिन सुबह जगह-जगह से सत्याग्रहियों की टोली निकल पड़ी। यह सत्ता को हटाने का विद्रोह नहीं था, यह ऐसी अहिंसक क्रांति थी जिसमें द्रोह, घृणा, रोष, हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं था। 'वन्दे मातरम्' का घोष संगीनों से अधिक प्रभावी व सशक्त बन गया। देश का ऐसा कोई नगर, ग्राम या जनपद नहीं रहा, जहां 'अंग्रेजों, भारत छोड़ो' के साथ 'करो या मरो' का नारा नहीं गूंज उठा।
१९३९ में युद्ध की घोषणा के बाद १९४२ में विश्वयुद्ध के विनाशकारी परिणाम आने लगे थे। रूस व अमरीका ने अभी तक औपचारिक तटस्थता बनाए रखी थी। १९४१ में जापान द्वारा अमरीका के पर्ल बंदरगाह में नौ सेना के बेड़े को ध्वस्त कर देने के बाद सोवियत रूस व अमरीका युद्ध में शामिल हो गए। हिटलर, मुसोलिनी व तोजो एक पंक्ति में हो गए तथा स्टालिन, चर्चिल और रूजवेल्ट की अपनी पंक्तिबन गई। १९४२ में अटलांटिक सागर में एक युद्ध पोत पर अमरीका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने विचार विमर्श किया। दोनों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया कि नाजी अत्याचार की समाप्ति पर शांति स्थापित होगी, जिससे सभी राष्ट्रों को अपनी सीमाओं में सुरक्षित रूप से रहने का अवसर मिलेगा। इससे सभी देशों के व्यक्ति भय और अभाव से स्वतंत्र होकर अपना जीवन बिता सकेंगे। इस घोषणा पत्र के अनुसार भारत अपने अधिकार की मांग कर सकता था, परन्तु चर्चिल ने स्पष्ट कर दिया कि यह घोषणा पत्र भारत या ब्रिटेन के साम्राज्य के किसी भाग पर लागू नहीं होगा। इस स्पष्टीकरण से देश में ब्रिटेन विरोधी वातावरण अधिक बनने लगा और धुरी राष्ट्रों जर्मन-जापान के प्रति सहानुभूति के साथ समर्थन के भाव बनने लगे।
विश्वयुद्ध की स्थिति जिस तरह भयावह होती जा रही थी तथा जापान भी भारतीय सीमा की ओर बढ़ता जा रहा था, उससे कलकत्ता तक आतंक फैल गया था। भारत के लोग विवशता के साथ सारी स्थिति देख रहे थे। महात्मा गांधी बार-बार कह रहे थे भारत की सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि ब्रिटेन भारत की सत्ता देशवासियों को सौंप दे। आजादी के लिए मोर्चा खोलना समय की आवश्यकता बन गया था। ब्रिटेन भारत की सुरक्षा की व्यवस्था नहीं कर पा रहा था। इस बीच २८ जुलाई १९४२ को जॉर्ज षष्ठम् ने अपनी डायरी में लिखा कि चर्चिल ने यह कहकर अचंभित कर दिया कि उनके सहयोगी तथा पार्लियामेंट में दोनों या तीनों दल युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को भारतीयों के हवाले करने को तैयार हैं। विचार-विमर्श करने के बाद यह समझ में आ गया है कि भारत छोडऩा ही पड़ेगा।
महात्मा गांधी ने ८ अगस्त को अपने सवा दो घंटे के भाषण में स्पष्ट किया कि यदि स्थिति दूसरी होती तो मैं आपको थोड़ा इंतजार करने को कहता। अब स्थिति असहनीय हो गई है। कांग्रेस के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं रह गया। एक छोटा-सा मंत्र आपको देता हूं, जिसे हृदय पटल पर अंकित कर लीजिए। यह मंत्र है 'करो या मरो' या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या आजादी की कोशिश में अपने प्राण त्याग देंगे। गांधीजी ने कहा कि इस समय से हम आजाद हैं और अपने को आजाद मान लें। हम पर हर कोई हुकूमत नहीं कर सकता। हम अपनी हुकूमत कायम करेंगे। किसी अन्य हुकूमत के मातहत नहीं रह सकते।
उन्होंने प्रेस वालों से कहा कि आपको सरकारी मशीन नहीं बनना चाहिए। जजों से कहा कि आप इस्तीफा तो न दें, पर आप अनुचित आज्ञा का पालन नहीं करें। छात्रों से कहा कि वे कह दें कि हम तो कांग्रेस के आदमी हैं, उसकी आज्ञा का ही पालन करेंगे। फौज से कहा - जब उचित लगेगा, तब कहूंगा कि उन्हें क्या करना चहिए। राजाओं से कहा कि भारत तो आजाद होगा ही और उस भारत में आपको अपना स्थान रखना है। अच्छा होगा आप जनता के सेवक बन जाएं। गांधीजी का 'करो या मरो' का मंत्र आज भी सार्थक है, सिद्ध है। यह मंत्र आजादी पाने से अधिक आजादी को बनाए रखने का है। मनीषियों के वचन कालातीत होते हैं, वे सदैव के लिए होते हैं। वह राष्ट्र जीवंत होता है, जिसमें आहूत होने की कामना है।
Published on:
08 Aug 2022 07:22 pm
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