
छायावादी युग भारतीय नवजागरण का काल था, जहाँ सभी स्तरों पर मुक्ति के लिए संघर्ष था। नारी भी अपनी मुक्ति की खोज में प्रयासरत थी।
अंकिता सिन्हा
छायावादी काव्य का युग एक नई संवेदनशीलता के काव्य का युग था। यह काल महात्मा गांधी की सक्रियता, किसान आंदोलन, प्रथम विश्व युद्धोत्तर स्थितियों, विश्वयापी आर्थिक संकट, श्रमिक हड़तालों, अरविंद घोष,तिलक के विद्रोही तेवरों आदि का काल था, जहाँ मुक्ति की छटपटाहट ने हिंदी साहित्य में छायावादी काव्य का आकार ग्रहण किया। परिणामस्वरूप, उस युग के कवि विशिष्ट अर्थों में संवेदनशील थे। उनकी कविताओं ने प्रकृति की प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण और तथाकथित नैतिक रूढ़ियों से मुक्ति का अलख जगाया। इसने न केवल रीतिकाल की सर्वथा भोगवादी प्रवृति से मुक्ति चाही, वरण् द्विवेदी युग की दुराग्रही भोग-विरोधी मानसिकता से भी छुटकारा चाहा। यहाँ तक कि छायावाद ने व्यवहारिक जीवन की भौतिकता और घोर सांसारिकता से मुक्ति पाने के प्रयास में एक नए रहस्यवाद की रचना कर डाली। इस नए छायावादी रहस्य के प्रणेताओं में से प्रमुख थीं, मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत, परदुख कातर हृदया कवयित्री महादेवी वर्मा। जिनका व्यक्तित्व अपनी इंद्रधनुषी आभा लिए उनके काव्यलोक में उपस्थित होता है। उनका सहृदया धीर-गंभीर नारी चरित्र उनकी आभा में अभिवर्धन ही करता है। उन्होंने काव्य रचना को अत्यंत धीर-गंभीर कार्य माना है और समस्त प्राणी जगत के प्रति उनकी करुणा उमड़ती है। उनकी जीवन दृष्टि मानवीय गुणों से संपृष्ट और संवेदनाओं से अनुप्राणित है।
छायावादी युग भारतीय नवजागरण का काल था, जहाँ सभी स्तरों पर मुक्ति के लिए संघर्ष था। नारी भी अपनी मुक्ति की खोज में प्रयासरत थी। महादेवी में भी मुक्ति की उड़ान स्पष्ट, असीम और अनंत है। उनमें नारी के अभिमानी रूप की अभिव्यंजना हुई है। उनकी मुक्ति की आकांक्षा भाषा के स्तर पर भी प्रकट होती है और शिल्प के स्तर पर भी महादेवी वर्मा ने अपने काव्य के लिए गीत विधा का ही चयन किया है। उनके युग की भौतिकता और अध्यात्म के बीच का द्वंद्व उन्हें रहस्य का आवरण ओढ़ने के लिए बाध्य करता है और वे अभिव्यक्ति के लिए प्रायः प्रतीकों का सहारा लेती हैं। उनकी कविता में दुःख और करुणा का भाव प्रधान है। वेदना के विभिन्न रूपों की उपस्थिति उनके काव्य की प्रमुख विशेषता है। इन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती उनकी गीत की एक पंक्ति है –
“शलभ! मैं शापवश वर हूँ, किसी का दीप निष्ठुर
हूँ।“
जिससे उनके अंतस में पलती अथाह पीड़ा का स्पष्ट संकेत मिलता है। एक विचित्र- सा सूनापन, एक विलक्षण एकाकीपन बार-बार उनकी कविताओं में उमड़ता दिखाई देता है। पीड़ा का संसार ही उनके काव्य संसार की सौगात है। साम्राज्य मुझे दे डाला, उस चितवन ने पीड़ा का
विफल प्रेम का यह रूदन महादेवी के काव्य की अंतर्वस्तु है। यह पीड़ा ही कवयित्री का प्रारब्ध है-
मेरी मदिरा मधुवाली
आकर सारी ढुलका दी
हँस कर पीड़ा से भर दी
छोटी जीवन की प्याली
महादेवी वर्मा की वेदना अनुभूतिजन्य होने के कारण उनकी कविताओं में इसकी अभिव्यक्ति अत्यंत सहज ढंग से हुई है। वे सहजता से कहती हैं- रात-सी नीरव व्यथा, तम-सी अगम मेरी कहानी
परंतु महादेवी की कविता में अभिव्यंजित दुःख और वेदना जैसे भाव आरोपित बिलकुल नहीं है, इसका कारण तो कवयित्री स्वयं नहीं है। हमारे असंख्य सुख हमें चाहे मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी न पहुँचा सकें, किंतु हमारा एक बुंद आंसू जीवन को अधिक मधुर अधिक ऊर्वर बनाए बिना गिर नहीं सकता। निष्ठुर दीप-सी तिल-तिल जलती कवयित्री अपने काव्य में इस व्यक्तिगत व्यथा को शब्द देने में संकोच नहीं करती है।
महादेवी की वेदना निरंतर वैयक्तिक भी नहीं है। स्वयं उन्होंने अपने जीवन में दुःख और अभाव की बात से इंकार किया है। वस्तुतः उनके वेदना भाव का प्रासाद दो आधार-भूमियों पर टिका हुआ है- आध्यात्मिक भावभूमि और मानवतावादी भावभूमि, जो कि परस्पर अन्योन्याश्रित हैं।
विजन वन में बिखरा कर राग, जगा सोते प्राणों की प्यास,
ढलकर सौरभ में उन्माद, नशीली फैलाकर विश्वास
लुभाओ इसे न मुग्धवसंत, विरागी है मेरा एकांत
और मैं क्यों पूछं यह विरह निशा, कितनी बीती क्या शेष रही?
जब व्यक्ति वेदना के अनुभव से गुजर चुकता है और उसकी तीव्रता के दंश सह चुकता है, तो वह पराई पीर की उसी धरातल पर खड़े होकर समझ सकता है। यहीं से उसके उसमें समग्र मानव जाति के दुःखों के प्रति सहानुभूति और करुणा के भाव जन्म लेते हैं। पद्य के क्षेत्र में ‘सांध्य-गीत” और ‘दीपशिखा’ आते-आते उनकी वेदना को मानवमात्र के प्रति करुणा का रूप लेते देखा जा सकता है। ‘दीपशिखा’ महादेवी की अनुपम कृति है, जहाँ कवयित्री की चिंता केवल मनुष्य नहीं, तंवंगी पक्षी है। आत्मवादी कवि के रूप में महादेवी बहुत अधिक प्रबल है, किंतु उनके अंतर्मुखी चिंतन में जहाँ विरह-मिलन, तृप्ति-अतृप्ति, आशा-निराशा की हल्की-गहरी उर्मियाँ मचलती रहती हैं,जिनमें जीवन के अनेक उद्बोधन गीत भी फूट पड़े हैं, करुणा और मानवता की अनगिनत ध्वनियाँ भी मुखर हो उठी हैं। महादेवी के काव्य-लोक में वेदना की परिणति आनंद में होती है। कवयित्री दुःख और पीड़ा के बोझ तले सिसकती नहीं; अपितु निरंतर बढ़ते हुए आनंद भाव की ओर उन्मुख होती है। वह आनंद की ऐसी अवस्था में पहुँच जाती है, जहाँ नयन श्रवणमय और श्रवण नयनमय हो जाता है। वेदना की धारा प्रवाहित हो कर अंततः आनंद के सागर में ही जा मिलती है। यहाँ तक कि मृत्यु को भी महादेवी वर्मा अंत या दुखद न मान कर महाप्रयाण ही मानती हैं।
कुछ समीक्षक महादेवी की वेदना या पीड़ा का कारण व्यक्तिगत एकाकीपन और अभाव को भी रहस्यानुभूति का कारण मानते हैं। परंतु, यह समीक्षा समुचित नहीं मानी जा सकती है। महादेवी का काव्यकर्म और रहस्यवाद एक-दूसरे का पर्याय हैं। महादेवी की कविताओं में रहस्यानुभूति की उपस्थिति का आकलन करें तो यह प्रमाणित होता है कि वे सर्वत्र और प्रत्येक उपादान तथा प्रकृति –व्यापार में एक विराट सत्ता का दर्शन करती हैं। आत्मा-परमात्मा के रागात्मक संबंध के इस पक्ष की व्याख्या करते हुए, वे स्वयं कहती हैं,समर्पन के भाव ने ही आत्मा को नारी की स्थिति दे
डाली। सामाजिक व्यवस्था के कारण नारी अपना कुल, गोत्र आदि परिचय को छोड़ कर पति को स्वीकार करती है और स्वभाव के कारण अपने आपको पूर्णतःसमर्पित कर उस पर अधिकार पाती है। अतः, नारी के रूपक में सीमाबद्ध आत्मा का असीम में विलय हो कर असीम हो जाना सहज ही समझा जा सकता है। महादेवी वर्मा की रहस्यानुभूति पर यदि हम सतर्क दृष्टिपात करें, तो हम देखते हैं कि उनके काव्य में रहस्यवाद की सभी
चरणों की अभिव्यंजना हुई है। उनमें सर्वथा प्रथम चरण कौतुहल और जिज्ञासा रहस्यानुभूति है। मानव किसी चकित शिशु सा जब ब्रह्मांड के विराट लीला व्यापार को देखता है, तो बस चकित सा रह जाता है और जब उसकी बुद्धि कोई भी व्याख्या प्रस्तुत नहीं कर पाती है, तो वह रहस्य में डूब जाता है।
किसी शिल्प ने अनजान
विश्व प्रणय की सुषमा सा
यह कलियों की चितवन में कौन?
चकित मानव को हर ओर एक परम सत्ता के ही दर्शन होते हैं और वह उसकी महक पाने को आतुर रहता है। महादेवी अपने परमप्रिय के परोक्ष दर्शन कर अपने परमप्रिय से मिलने की इच्छा व्यक्त करती हैं-
जो तुम आ जाते एक बार!
कितनी करुणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाने बन पराग
गाता प्राणों का तार-तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वह पग पखार
और जब यह कामना पूरी होती नहीं दिखती है, तो वे स्वप्न का सहारा लेने में भी कोई संकोच नहीं करती हैं-
तुम्हें बाँध पाती सपने में,
मैं पलकों में पाल रही हूँ,
वह सपना साकार किसी का ।
परंतु, महादेवी वर्मा एक रहस्यवादी कवयित्री के रूप में केवल अद्वैतवाद से बंध कर नहीं चलती हैं। वे प्रियतम के साथ एकाकार हो जाना चाहती हैं। महावेदी वर्मा की सर्जनाओं में रहस्यानुभूति के विविध रूपों के दर्शन होते हैं। महादेवीजी की कविता में विरह के उद्धरणों की कोई कमी नहीं है, बल्कि उनका संपूर्ण काव्य ही विरह के रंग में रंगा हुआ था। मिलन की इच्छा, स्मरण, स्वप्न और साक्षात मिलन के बाद विरह का अनिवार्य चरण भी आता है। वे सर्वत्र एक विराट सत्ता के अस्तित्व का अभिज्ञान करती हैं, वे उससे मिलने की इच्छा रखती हैं,
उसके प्रति समर्पण भाव रखती हैं, और उसकेसाथ तादात्मय को तत्पर रहती हैं। यह परमसत्ता उन्हें अपनी विराट उपस्थिति से चकित कर देती है, और कौतुहल तथा जिज्ञासा से आप्लावित होती हैं, प्रकृति के विविध उपकरणों में वह उस अलौकिकप्रिय के अपार अमिट सौंदर्य की कल्पना करती हैं। वे अपनी नारीसुलभ लज्जा और संकोच का बिना परित्याग किए ही उसके साथ एकाकार होना चाहती हैं। उनकी रहस्यानुभूति उन्हें मानव समाज के उपेक्षित और शोषित वर्ग के कल्याण के प्रति भी सजग करती है। उनमें छायावादी युग की मुक्ति की कामना और मुक्ति संघर्ष का तीव्र रूप भी मिलता है। नारी होने के कारण उनमें मुक्ति की तड़प अपेक्षाकृत गहन है। मुक्ति की यही आकांक्षा उनकी गद्य रचनाओं में तो और भी प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त होती है। अतएव, छायावादी रहस्यवाद की विवेचना में महादेवी वर्मा एक अनिवार्य अध्याय हैं, और उनकी रचनाएं समग्र छायावादी रहस्यवाद के अप्रतिम सोपानों का मार्ग सदैव आलोकित करती प्रतीत होती हैं।
Published on:
09 Aug 2018 01:23 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
