
बागियों ने ऐसे किया था अपराधी जीवन से किनारा
बागियों ने ऐसे किया था अपराधी जीवन से किनारा
विजयदत्त श्रीधर
संस्थापक-संयोजक,
सप्रे संग्रहालय,
भोपाल
पचास साल पहले देश में बड़ा परिवर्तन हुआ था। असल में 14 अप्रेल से 31 मई 1972 के बीच चंबल घाटी और बुन्देलखण्ड के 405 बागियों ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सान्निध्य में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चित्र के सामने आत्मसमर्पण किया था। बागियों ने इस तरह अपराधी जीवन से किनारा किया था। समाज की मुख्यधारा में वापसी के लिए प्रायश्चित का संकल्प लिया था। दुनिया को भले ही यह परिघटना अनहोनी और अकल्पनीय लगी थी, परंतु भारतीय संस्कृति में ऐसे विलक्षण साक्ष्य विद्यमान हैं।
भगवान बुद्ध की करुणा ने अंगुलिमाल की जीवन-दिशा बदल दी थी। कलिंग युद्ध के महाविनाश ने सम्राट अशोक को बुद्ध-मार्ग की ओर प्रवृत्त किया था। सन 1920 में ग्वालियर रियासत के महाराजा माधौराव सिंधिया ने जीवन और मृत्यु में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया, तब डाकू कहे जाने वाले विपथगामियों ने जीवन की मुख्य धारा में लौटने का मार्ग चुना। सच ही, मन में पश्चाताप हो और प्रायश्चित करने का संकल्प उपजे तो हृदय परिवर्तन की सर्वाेच्च मानवीय संवेदना प्रकट होती है।
सन 1960 के मई महीने में जब संत विनोबा भावे भूदान-ग्रामदान की अलख जगाते हुए चम्बल क्षेत्र में आए तब मानो पश्चाताप, प्रायश्चित और क्षमा की त्रिवेणी ही प्रवाहित हो उठी। 10 मई से 26 मई के बीच 20 बागियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसकी पहल नैनी जेल में निरुद्ध बागी तहसीलदार सिंह ने की थी। बाबा को पत्र लिखा था। बिना शर्त; पश्चाताप, प्रायश्चित और कानून का सामना करने की इच्छा लिए हुए, जिनसे वैर या रंजिश रही उन्हें हृदय से क्षमा करते हुए और पीडि़तों से क्षमा मांगते हुए, उन आत्मसमर्पणकारियों ने शुद्ध हृदय से वे आरोप स्वीकार कर लिए जो सच्चे थे। खुशी-खुशी उम्र कैद काटी। लेकिन, तंत्र की जड़ता ने सद्विवेक, सद्भावना, सद्इच्छा के उस अभिनव प्रयोग को आगे नहीं बढऩे दिया।
साठ के दशक में मानसिंह, पंडित लोकमन आतंक के पर्याय थे। मोहरसिंह, माधोसिंह, मूरतसिंह सत्तर के दशक के बड़े दस्यु गिरोहों के सरदारों के नाम हैं। छोटे-बड़े गिरोहों और कुल दस्युओं की संख्या बहुत बड़ी रही है। वे अपने को डाकू नहीं बागी मानते रहे हैं। उनकी बंदूकें ही नहीं गरजती थीं, बल्कि उनके नाम से ही चम्बल घाटी और बुंदेलखण्ड कांपते थे। उनका हृदय परिवर्तन मानवता के इतिहास की मिसाल है।
इधर, पद यात्रा से वापस पवनार आश्रम लौटे संत विनोबा भावे ने 75 वर्ष की आयु पूरी होने पर क्षेत्र संन्यास ले लिया था। उधर, 1971 के सितंबर महीने में चम्बल के बागी सरदार माधोसिंह ने जगरूप सिंह को बाबा के पास भेजा। विनोबा भावे ने क्षेत्र संन्यास के कारण असमर्थता जताई और जयप्रकाश नारायण के पास जाने को कहा। तब माधोसिंह ने खुद जयप्रकाश नारायण से संपर्क साधा और उन्हें चम्बल घाटी को बागी-समस्या से मुक्त कराने तथा बागियों को आत्मसमर्पण कर प्रायश्चित करने का अवसर प्रदान करने का बीड़ा उठाने के लिए मना लिया। जयप्रकाश नारायण ने मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान की सरकारों तथा केन्द्र सरकार से संपर्क किया।
अप्रेल, 1972 में जयप्रकाश नारायण चम्बल घाटी में पहुंचते हैं। अप्रेल महीने की 14, 16, 17 एवं 23 तारीख और 1 मई को चम्बल घाटी के कुल 270 बागियों ने महात्मा गांधी के चित्र के समक्ष शस्त्र समर्पण किया। जे.पी. का एक ही वादा था कि किसी को फांसी नहीं होगी, परन्तु कानूनी कार्रवाई का सामना करना होगा। अपराध स्वीकार करने होंगे। जिनके नाम से चम्बल घाटी कांपती थी, उन्होंने जयप्रकाश नारायण का परामर्श स्वीकार किया। इस तरह पूरे देश ने, दुनिया ने इतिहास की इस अद्भुत परिघटना को होते हुए देखा। अध्यात्म में रची-बसी भारतीय संस्कृति में ही ऐसा संभव हो सकता है।
आत्मसमर्पण की इसी शृंखला में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाशचंद सेठी ने जयप्रकाश नारायण से आग्रह किया कि चम्बल घाटी का कार्य पूरा होने पर वे बुन्देलखण्ड की दस्यु समस्या के समाधान और वहां शान्ति बहाल करने में सहयोग प्रदान करें। जयप्रकाश नारायण 10 मई को छतरपुर पहुंचते हैं। बागियों का हृदय परिवर्तन करते हैं। 31 मई, 1972 को 84 दस्यु वहां भी आत्म समर्पण करते हैं।
मेजर जनरल यदुनाथ सिंह, आत्म समर्पित दस्यु तहसीलदार सिंह और पंडित लोकमन, सर्वोदयी कार्यकर्ता हेमदेव शर्मा, चतुर्भुज पाठक, गांधी आश्रम जौरा के सूत्रधार डॉ. एस.एन. सुब्बाराव की भूमिका हृदय-परिवर्तन के इस महायज्ञ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही।
Published on:
26 Apr 2022 08:27 pm
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