हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार और रंगकर्मी सुभाष चन्द्र उर्फ मुद्राराक्षस नहीं रहे। इस सप्ताह के पहले दिन यानी13 जून को उन्होंने लखनऊ में आखिरी सांस ली। वे कुछ समय से बीमार थे। उनका जन्म 21 जून 1933 को लखनऊ के बेहटा गांव में हुआ। उनके पिता शिवचरणलाल 'प्रेम' उत्तर प्रदेश के लोकनाट्य स्वांग सपेड़ा और नौटंकी के उस्तादों में थे। 1976 में वे रेडियो की नौकरी छोड़कर लखनऊ वापस आ गए और फिर पूरी जिंदगी स्वतंत्र लेखक के बतौर बसर की।
बहुआयामी प्रतिभा के धनी मुद्राराक्षस ने सोलह नाटकों का निर्देशन किया, पंद्रह लिखे जिनमें नौ प्रकाशित हुए। उनके बारह उपन्यास, पांच कहानी संग्रह, तीन व्यंग्य संग्रह और आलोचना की पांच किताबें छपीं। साहित्य और रंगमंच के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, अम्बेडकर महासभा का दलित रत्न सम्मान, शूद्र महासभा का शूद्राचार्य सम्मान समेत अनेक सम्मान मिले। वे भगवती बाबू, नागर जी और यशपाल की तिकड़ी के लिए मशहूर ये शहर श्रीलाल शुक्ल और कामतानाथ से पहले ही खाली हो चुका था और अब इस सिलसिले का एक और चिराग बुझ गया।