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बेटियां बोझ कब तक

नए अधिकृत आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2007 और वर्ष 2016 के बीच दक्षिण भारत में जन्म के समय लिंगानुपात में अचानक बड़ी गिरावट आई है।

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sex ratio in South India

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बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की सफलता के लिए सरकारी और गैर सरकारी कोशिशों के बीच एक ऐसी खबर आई है जो सबको विचलित करने वाली है। लिंगानुपात को लेकर अब तक उत्तरी भारत के राज्यों पर ही उंगली उठती रही है, लेकिन नए अधिकृत आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2007 और वर्ष 2016 के बीच दक्षिण भारत में जन्म के समय लिंगानुपात में अचानक बड़ी गिरावट आई है। शिक्षा की दृष्टि से आगे रहने का गर्व करने वाले दक्षिण भारत के राज्यों में लिंगानुपात का इस प्रकार गड़बड़ा जाना गंभीर चिंता का विषय होने के साथ डरावना भी है। आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश में इस काल के दौरान प्रति हजार बेटों के जन्म के मुकाबले बेटियों की संख्या में 168 की गिरावट दर्ज की गई, जबकि कर्नाटक में बेटियों के जन्म की संख्या में 108, तमिलनाडु में 95 और ओडिशा में 61 की गिरावट पाई गई। ये आंकड़े जन्म और मृत्यु को दर्ज करने वाले रजिस्ट्रार जनरल के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम में दर्ज हुए हैं। भारत में अधिकतर जगहों पर बच्चों के जन्म का शत-प्रतिशत पंजीकरण होने लगा है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि बेटियों का जन्म दर्ज होने से रह गया होगा।

उत्तरी भारत के राज्यों में बेटों के मुकाबले बेटियों के जन्म के आंकड़े ऐतिहासिक रूप से कम रहे हैं मगर दक्षिण के राज्यों का ऊंचे पायदान से गिर जाना चौंकाने वाला है। आंध्र प्रदेश में लिंगानुपात 2016 में गिर कर प्रति एक हजार बेटों के मुकाबले 806 बेटियों के जन्म पर पहुंच गया और यह प्रदेश इस मामले में पिछड़े प्रदेश राजस्थान के बराबर आ गया, जहां भी यही अनुपात है। रजिस्ट्रार जनरल के ये आंकड़े खतरे की घंटी हैं। भारतीय समाज पुरुष प्रधान रहा है, जिसने स्त्री को दोयम दर्जा दिया। संवैधानिक लोकतंत्र में हालांकि यह भेद कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया मगर सदियों से जिस सामंती और अधिनायकी सोच में यहां का समाज जकड़ा रहा, उससे छुटकारा पाना मुश्किल है और इसी मुश्किल को आसान करने की कवायद का हिस्सा है 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान। हम जब सोच रहे हों कि हालात बेहतर होने वाले हैं तब ऐसे आंकड़ों का आना हमें चिंतित करता है। लेकिन चिंता करने मात्र से तो हालात नहीं सुधरेंगे। जरूरत है हम उन कारणों को खोजें, जो लिंगानुपात बेहतर बनाने के हमारे प्रयासों को ध्वस्त करते हैं।

सरकार और समाज दोनों को गंभीरता से इन कारणों में जाना होगा। दक्षिण भारत के राज्यों से आए नए आंकड़ों के चलते भ्रूण हत्या से इतर कारणों को भी खोजना होगा। इसके लिए विस्तृत समाजशास्त्रीय अध्ययन करने होंगे। इस पर भी मनन किए जाने की जरूरत है कि अर्थव्यवस्था की बेहतरी और साक्षरता में बड़े उछाल के बावजूद ऐसा क्यों हो रहा है। बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकारें अनेकों कार्यक्रम चला रही हैं और वित्तीय मदद देने के साथ ही भारी प्रचार के जरिए लोगों को यह समझाने का यत्न भी कर रही हैं कि वे बेटियों को बोझ नहीं समझें। मगर नए आंकड़े संकेत देते हैं कि गहराई में अंतर्निहित कुछ बाधाएं जरूर हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पा रहे हैं। सरकार और समाज के प्रमुखों, नीति निर्माताओं और अकादमिक अनुसंधानकर्ताओं के लिए यह जानना चुनौती है।