
के.एस. तोमर - वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तंभकार,
चुनाव आयोग की ओर से पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ देश की राजनीति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर आ खड़ी हुई है। इन पांच राज्यों के चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं हैं, बल्कि वे आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को भी प्रभावित कर सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी के लिए ये चुनाव एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा हैं। पिछले एक दशक में भाजपा ने उत्तर और पश्चिम भारत में अपना प्रभुत्व मजबूत किया है, लेकिन अब उसकी सबसे बड़ी चुनौती पूर्व और दक्षिण भारत में अपने राजनीतिक आधार का विस्तार करना है। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए ये चुनाव अस्तित्व और पुनर्जीवन की लड़ाई की तरह हैं। यदि पार्टी इन राज्यों में प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पाती तो राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका और कमजोर हो सकती है। पिछले दस वर्षों में भारत का राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला है। लेकिन पूर्व और दक्षिण भारत में राजनीतिक समीकरण अब भी जटिल बने हुए हैं, जहां क्षेत्रीय दलों का प्रभाव और स्थानीय पहचान की राजनीति राष्ट्रीय दलों के सामने चुनौती बनकर खड़ी है।
पश्चिम बंगाल: भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती: पश्चिम बंगाल इन चुनावों में भाजपा के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य बना हुआ है। राज्य की राजनीति अभी भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव में है। 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 213 सीटें जीतकर लगभग 48 प्रतिशत मत हासिल किए थे, जबकि भाजपा 77 सीटों और लगभग 38 प्रतिशत वोट के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी। इससे राज्य की राजनीति दो प्रमुख धु्रवों में बंटती दिखाई दी। भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य में उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया था और खुद को तृणमूल कांग्रेस का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बना लिया था। हालांकि विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने सत्ता बरकरार रखी। भाजपा संगठनात्मक विस्तार और केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता के माध्यम से राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। फिर भी तृणमूल कांग्रेस का मजबूत जमीनी संगठन, ममता बनर्जी का व्यक्तिगत प्रभाव व अल्पसंख्यक मतदाताओं का संभावित ध्रुवीकरण भाजपा के लिए चुनौती बने हुए हैं। कांग्रेस के लिए तो बंगाल में स्थिति और भी कठिन है क्योंकि उसका राजनीतिक आधार पिछले वर्षों में कमजोर हो चुका है।
असम: सत्ता बचाने की चुनौती: असम में भाजपा अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में चुनावी मैदान में उतर रही है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी ने अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत किया है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 126 सदस्यीय विधानसभा में 75 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी थी, जिनमें भाजपा को अकेले 60 सीटें मिली थीं। असम गण परिषद जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन और विकास परियोजनाओं ने भाजपा की स्थिति मजबूत की। पहचान, क्षेत्रीय आकांक्षाओं व आव्रजन जैसे मुद्दे यहां राजनीति को प्रभावित करते रहते हैं। कांग्रेस इन मुद्दों के आधार पर चुनौती देने की कोशिश कर सकती है, पर संगठनात्मक कमजोरी उसके लिए बाधा है।
केरल: भाजपा के लिए कठिन मैदान: केरल की राजनीति लंबे समय से वाम लोकतांत्रिक मोर्चे और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे के बीच केंद्रित रही है। 2021 के चुनाव में वाम मोर्चे ने 140 में से 99 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी थी, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 41 सीटें मिली थीं। भाजपा लगभग 12 प्रतिशत वोट हासिल करने के बावजूद एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। भाजपा के लिए केरल अब भी कठिन राजनीतिक क्षेत्र बना हुआ है। कांग्रेस के लिए केरल मजबूत प्रदर्शन का प्रमुख आधार बना हुआ है।
तमिलनाडु: क्षेत्रीय दलों का दबदबा: तमिलनाडु की राजनीति मुख्यत: क्षेत्रीय दलों के इर्द-गिर्द घूमती है। द्रविड़ मुनेत्र कषगम और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम लंबे समय से राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 234 में से 159 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की थी, अन्नाद्रमुक गठबंधन को 75 सीटें मिली थीं। भाजपा, जो अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही थी, चार सीटें जीतने में सफल रही थी। भाजपा की यहां अभी सीमित शक्ति है, पर संगठन विस्तार की कोशिश कर रही है।
पुडुचेरी: छोटा लेकिन महत्वपूर्ण मुकाबला: पुडुचेरी आकार में छोटा होने के बावजूद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। 2021 के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 30 में से 16 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की थी, जबकि कांग्रेस गठबंधन को 11 सीटें मिली थीं।
राष्ट्रीय राजनीति पर असर: इन पांच राज्यों के चुनावों के परिणाम राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक असर डाल सकते हैं। यदि भाजपा विशेषकर पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में बेहतर प्रदर्शन करती है तो यह उसके राजनीतिक विस्तार की धारणा को और मजबूत करेगा। यदि विपक्ष अपने गढ़ बचाने में सफल रहता है तो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की चर्चा को बल मिल सकता है। कांग्रेस के लिए यह दिखाने का अवसर है कि वह अब भी भाजपा को चुनौती दे सकती है। यह चुनाव सिर्फ क्षेत्रीय मुकाबले नहीं हैं। वे उस राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत बन सकते हैं जो अंतत: 2029 के निर्णायक लोकसभा चुनाव तक पहुंचने वाली है।
Updated on:
18 Mar 2026 04:44 pm
Published on:
18 Mar 2026 02:00 pm
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