
जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने का मिले संदेश
शैलेंद्र यशवंत
पर्यावरणीय विषयों के जानकार और सामाजिक कार्यकर्ता
जी-20 अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग का प्रमुख मंच है। इसमें 19 देश और यूरोपीय संघ शामिल हैं। जी-20 सदस्य देश दुनिया की दो-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह ब्लॉक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 85 फीसदी, अंतरराष्ट्रीय व्यापार का 75 फीसदी कवर करता है। जी-20 देश, विशेष रूप से धनी पश्चिमी देश, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के तीन-चौथाई से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं।
दुनिया जिस ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु संकट का सामना कर रही है, उसकी मुख्य वजह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन है। जलवायु संकट जैसे-जैसे तीव्र और व्यापक हो रहा है, गरीबी और असमानता, भोजन और पानी की असुरक्षा, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के नुकसान जैसे अन्य तरह के संकट और गहरे होते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रतिकूल प्रभाव मानव अधिकारों के साथ-साथ चरम मौसमी घटनाओं जैसे लू, बाढ़, सूखा और समुद्र के स्तर में वृद्धि के रूप में सामने आता है। जी-20 की मजबूती इसके सदस्य देशों में ही निहित है क्योंकि यह प्रमुख शक्तियों और सामूहिक नेतृत्व के बीच वैश्विक सहयोग का प्रतिनिधित्व भी करता है। इसके सदस्य देश अब भी विकास के विभिन्न चरणों से गुजर रहे हैं। ऐसे में युद्ध, ऊर्जा संकट, खाद्य संकट, बीमारियों में बढ़ोतरी, प्राकृतिक आपदाएं जैसे अनेक संकट से निपटने के लिए सामान्य आधार खोजना एक दुरुह चुनौती है। जी-20 देशों को अपने मतभेदों की बजाय सामूहिक रूप से इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि वे करीब आने के लिए क्या कर सकते हैं। दिल्ली में होने जा रहे जी-20 शिखर सम्मेलन में, भारत की अध्यक्षता को जलवायु, प्रकृति, ऊर्जा और क्लाइमेट फाइनेंस यानी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण आदि को लेकर ऐसे समझौतों का लक्ष्य रखना चाहिए जो मानवाधिकारों का पूरी तरह से सम्मान करते हों और वैश्विक प्रतिक्रिया को मजबूत कर सकें। इन समझौतों का लक्ष्य उत्सर्जन में भारी कटौती करना, अनुकूलन के लिए अधिक समर्थन प्रदान करने के साथ नुकसान एवं क्षति के समाधान को सम्बोधित करना होना चाहिए। इसे प्रकृति की रक्षा और पुनस्र्थापन तथा खाद्य प्रणालियों में सुधार को प्राथमिकता देनी चाहिए। ज्यादा महत्त्वपूर्ण तो यह है कि इस समूह के नेताओं को जलवायु से जुड़े एजेंडे के लिए प्रमुख प्रतिबद्धताओं पर आम सहमति प्रदर्शित करनी चाहिए जिसमें घरेलू और वैश्विक स्तर पर सभी जीवाश्म ईंधन, पारंपरिक और अपरंपरागत दोनों स्र्रोतों से सब्सिडी को तेजी से, निष्पक्ष और स्थायी रूप से हटाना, नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के विकास में तेजी लाने के लिए रणनीति साझा करना, वनों और अन्य पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण, नष्ट हो चुके वनों की स्थिति में सुधार करना तथा खाद्य प्रणालियों में सुधार करना शामिल है।
जी-20 की उन्नति में रुकावट उत्पन्न करना किसी भी देश के हित में नहीं है, फिर भी किसी नीति या विनियमन के जवाब में प्रतिरोध या विरोध की संभावना हो सकती है। उदाहरण के लिए जीवाश्म ईंधन के उत्पादन को चरणबद्ध तरीके से बंद करने पर सऊदी अरब द्वारा आम सहमति न बनने देना और जुलाई में मंत्रिस्तरीय बैठक में महत्वपूर्ण खनिजों पर चीन का प्रतिरोध। पिछले माह जी-20 देशों के ऊर्जा परिवर्तन और ऊर्जा मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत की अध्यक्षता ने महत्त्वाकांक्षी परिणामों के लिए अलग-अलग विचारों के बीच पुल बनाने और संभावित समाधान तलाशने की कोशिश की। इसके बावजूद, जी-20 देशों के ऊर्जा परिवर्तन और ऊर्जा मंत्रियों की बैठक का जो विवरण हाल में प्रकाशित हुआ, वह उन उद्देश्यों और लक्ष्यों से काफी कम है, जिन्हें हासिल करने की जरूरत है। हालांकि, यह संभावना नहीं है कि जी-20 सदस्यों के बीच तनाव कम हो जाएगा। जी-20 शिखर सम्मेलन का लक्ष्य एक साल के विभिन्न मतभेदों-विचारों के बाद नेताओं के बीच बातचीत शुरू करना है। यह शिखर सम्मेलन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वैश्विक चुनौतियों से निपटने और सहयोग करने की सदस्य देशों की इच्छा का समाधान करेगा। पूर्व की प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने के वास्तविक जोखिम हैं। इस वर्ष के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाला भारत एक बड़ी आर्थिक ताकत और प्रमुख रणनीतिक खिलाड़ी है। हाल में भारत विश्व की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया है।
जी-20 भारत के लिए अपने बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को साबित करने का एक मौका है। अन्य विकासशील देशों जैसे कि यूरोपीय संघ और कनाडा को अपने महत्त्वपूर्ण मानदंडों को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय अध्यक्षता के साथ मिलकर काम करना चाहिए, उन धारणाओं को स्वीकार करना चाहिए जिनपर आम सहमति है। हालात को देखते हुए दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक ताकत के समूह- जी-20 की छत्रछाया में धनी और उभरती दोनों अर्थव्यवस्थाओं, को 2023 में एक मजबूत राजनीतिक संकेत भेजना चाहिए। साथ ही सार्वजनिक और सबसे गंभीर खतरों के खिलाफ निर्णायक रूप से कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। जलवायु परिवर्तन के खतरों की कोई सीमा नहीं होती।
Published on:
06 Sept 2023 08:01 pm
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