बाबू ने
जिन्दगी में पहली बार सरकार को कोसा। इससे पहले वह अपने अफसरों को कोसता था या मौसम
को कोसता था। कहता- ऎसा चिलमचोर अफसर मैंने अपनी जिन्दगी में नहीं देखा। घरवाली के
मेकअप का सामान तक सरकारी फंड से मंगवाता है। कहता है बाऊजी कागजों में लिख देना कि
दफ्तर के लिए स्टेशनरी लाए और मंगवाता लिपिस्टिक है। लेकिन कुछ दिनों बाद ही वह
कोसना बंद कर देता है। अब दो लिपिस्टिक अफसर की घरवाली के लिए और एक अपनी वाली के
लिए लाकर बिल एडजस्ट कर लेता है। वह मौसम को इसलिए कोसता है कि घर से निकलते ही
बारिश शुरू हो जाती है।
रास्ते में कहीं पानी भरा है तो कहीं सड़क टूटी है। कार
वाले आते-जाते छींटे उड़ाते हैं सो अलग। कुछ दिन बाद मौसम भी अच्छा लगने लगता है।
ऑफिस के बाद साथियों के साथ अच्छे मौसम का लुत्फ लेने के लिए दो घूंट गिट लेता है।
घरवालों से कहता है कि बरसात ने रास्ता जाम कर दिया और मुंह से आने वाली महक को
पसीने की बदबू कह कर बहाने बनाता है।
बाबू जी अब मौसम का भी आनंद लेने लगे हैं।
लेकिन अंगूठा निशानी। दफ्तर आओ तो अंगूठा निशानी और जाओ तो अंगूठा निशानी। यानी अब
हाजिरी रजिस्टर बंद और बॉयोमैट्रिक प्रणाली शुरू। सुबह वक्त से दफ्तर पहुंचना उनके
लिए भयानक यंत्रणा है। इसकी बजाय तो सरकार काला पानी भेज देती। यह भी कोई बात है
ससुर समय पर ऑफिस आओ। पहले सेलेब्रिटी की तरह देरी से पहुंचते थे और बिगड़ेल छोरों
की भांति जल्दी सटक लेते थे।
अब बैठे-बैठे भजते रहो सरकारी माला। कसम से आठ घंटे
ऎसे बीतते हैं जैसे बामशक्कत जेल। नौकरी में इतने बुरे दिन आएंगे कभी सोचा भी नहीं
था। बाबुओं से भी ज्यादा हैरान परेशान हो रहे हैं कॉलेज के मास्टर। यह क्या बात है।
हर घंटे अंगूठा मशीन में घुसाओ। सजायाफ्ता कैदी बना डाला। अरे हम गुरू हैं गुरू।
सरकार को हमारा आदर करना चाहिए। हम कोई सड़क छाप मवाली हैं जिन्हें हर रोज थाने में
हाजरी बजानी होती है। एक दफ्तर वालों ने कमाल ही कर दिया।
अपने मूल दफ्तर जाकर
हाजरी लगाने की जगह अपने घर के नजदीक वाली शाखा में अंगूठा लगा कर घरका काम निपटाते
और तसल्ली से दफ्तर पहुंचते। हाजरी हो गई, तनखा पक्की, अब काहे का डर। दरअसल
कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, दफ्तरों, अस्पतालों, सचिवालयों में लगी यह अंगूठा निशानी
वाली चमत्कारी मशीनें हमारे राष्ट्रीय चरित्र को दर्शाती है- कितने कामचोर हंैं हम।
कितने लेटलतीफ हैं हम। कितने दोगले हैं हम। अब सरकार ने हमारे माननीय कारिन्दों की
रोक टोक के लिए कारगर कदम उठाए तो सरकार को ही कोसना शुरू कर दिया। अब कहां जाकर
रोए सरकार।
राही