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पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है तम्बाकू सेवन

31 मई: विश्व तम्बाकू निषेध दिवस

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Patrika Desk

May 31, 2022

31 मई: विश्व तम्बाकू निषेध दिवस

31 मई: विश्व तम्बाकू निषेध दिवस

डॉ. के.एल. पोकरना

(जन स्वास्थ्य शिक्षा विशेषज्ञ)

हालांकि तम्बाकू सेवन मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, यह सर्वविदित है लेकिन इसके नुकसान केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके दीर्घकालिक आर्थिक व सामाजिक दुष्प्रभाव भी देखे गए हैं। आज तम्बाकू सेवन की यह समस्या विकास से जुड़ा मुद्दा बन गई है। दरअसल, विकास के तीन स्तम्भों, जैसे पर्यावरणीय निरंतरता, आर्थिक विकास एवं सामाजिक समावेशन को तम्बाकू प्रभावित करता है। इसे संयुक्त राष्ट्र के तम्बाकू नियंत्रण सहस्त्राब्दि विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भी महत्त्वपूर्ण मुद्दा बनाया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस वर्ष तम्बाकू निषेध दिवस का विषय 'तम्बाकू पर्यावरण के लिए खतरा' रखा है।

विश्व स्तर पर तम्बाकू उत्पादन: दुनिया के 125 देशों में तम्बाकू की पैदावार होती है। इस फसल का मूल्य 20 अरब अमरीकी डॉलर है। चीन, भारत, ब्राजील, अमरीका एवं तुर्की में होने वाली पैदावार विश्व के कुल उत्पादन का दो तिहाई अंश है। इससे कुल 60 लाख किसान जुड़े हैं, जिनमें दो तिहाई किसान चीन, भारत व इंडोनेशिया के हैं।

पर्यावरण के लिए हानिकारक: तम्बाकू की खेती, उसका वितरण आदि पर्यावरण को क्षति पहुंचाते हैं। इससे पर्यावरण व कृषि विज्ञानी दोनों चिंतित हैं। कारण कई हैं, जैसे तम्बाकू की खेती के लिए व तम्बाकू को खराब होने से बचाने के लिए लकड़ी का उपयोग। इसके लिए वृक्ष काटे जाते हैं, पेड़ों की कमी से वर्षा नहीं होती और मरुस्थल बढऩे की आशंका बढ़ती है। इसके अलावा तम्बाकू की खेती के दौरान रासायनिक प्रदूषण फैलता है और तम्बाकू तैयार करने की रासायनिक प्रक्रिया में ऊर्जा की अधिक खपत होती है। खाद्य एवं कृषि संगठन के शोध के मुताबिक एक एकड़ भूमि में तम्बाकू की फसल से 150 हरे वृक्षों का विनाश हो रहा है। विश्व में प्रतिवर्ष 35 लाख हेक्टेयर भूमि तम्बाकू उत्पादन की भेंट चढ़ जाती है। चूंकि यह नकदी फसल है, ज्यादा मुनाफे के लिए किसान तम्बाकू की खेती पसंद करते हैं। इस दौरान मिट्टी के पोषक तत्व अन्य फसलों के मुकाबले तेजी से घटते हैं और भूमि की उर्वरता नष्ट होती है। जैव विविधता संतुलन भी प्रभावित होता है। न केवल तम्बाकू सेवन करने वाले को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं, बल्कि पास से आ रहे तम्बाकू के धुएं को अनजाने ही श्वास में ले लेने वाला व्यक्ति भी कई स्वास्थ्य समस्याओं से घिर सकता है। तम्बाकू के कारखानों से निकलने वाला कचरा जलस्रोतों को प्रदूषित करता है और कार्बन डाइ ऑक्साइड जलवायु परिवर्तन का बड़ा कारक है। डब्लूएचओ के निदेशक (हेल्थ प्रमोशन) रुडिगर क्रेच के अनुसार, एक सिगरेट का जलना कई संसाधनों को जलाता है। संसाधन पहले ही कम हैं और विडम्बना है कि मानव जीवन इन्हीं संसाधनों पर निर्भर है। तम्बाकू की खेती व पैकेजिंग से जुड़े लोगों का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। तम्बाकू पत्तियों से त्वचा में निकोटिन रसायन समाविष्ट हो जाता है, जिससे ग्रीन तम्बाकू सिकनेस (जीटीएस) रोग होता है। यह दरअसल लम्बे समय तक तम्बाकू के सम्पर्क में रहने के कारण होने वाला 'संकुचित त्वचा' रोग है।

नियंत्रण के उपाय: भले ही भारत में तम्बाकू आबकारी राजस्व व विदेशी विनिमय आय का मुख्य स्रोत है पर हानियों को देखते हुए सरकार तम्बाकू नियंत्रण के उपायों पर भी काम कर रही है। एक ओर आजीविका का साधन, तो दूसरी ओर सेवन करने वालों के लिए मौत की वजह, ऐसे में तम्बाकू का सामाजिक परिप्रेक्ष्य तय करना मुश्किल हो जाता है। सामान्य दृष्टिकोण यह है कि नुकसान को देखते हुए इसके उत्पादन एवं उपयोग पर नियंत्रण अनिवार्य है। तम्बाकू के उत्पादन व वितरण पर अधिक कर लगाना, सेवन से स्वास्थ्य हानि के लिए चेतावनी देना और जागरूकता फैलाना नियंत्रण के उपाय हैं, जिसके लिए स्वास्थ्य, वित्त, कृषि, श्रम, महिला व बाल विकास, शिक्षा एवं गृह मंत्रालयों को मिलकर काम करने की जरूरत है। सतत स्वास्थ्य शिक्षा व जनजागृति कार्यक्रमों की भी आवश्यकता है।