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शिक्षा, रोजगार व समानता से ही कुपोषण का इलाज

हमें समुदाय के हर उस व्यक्ति या बच्चे को चिह्नित कर पोषण देना सुनिश्चित करना होगा, जो कुपोषण का शिकार है अथवा कुपोषित होने का जोखिम रखता हो। इस दिशा में एकीकृत बाल विकास सेवाएं ठोस और समन्वित प्रयास है। इसमें नियमित भोजन के अलावा बच्चों को पूरक पोषण, टीकाकरण, स्वास्थ्य परीक्षण, अनौपचारिक शिक्षा व माताओं के लिए स्वास्थ्य व पोषण शिक्षा प्रदान की जाती है।

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Patrika Desk

Sep 01, 2022

शिक्षा, रोजगार व समानता से ही कुपोषण का इलाज

शिक्षा, रोजगार व समानता से ही कुपोषण का इलाज


डॉ. पंकज जैन
एसोसिएट प्रोफेसर एवं फिजिशियन, चिकित्सा मामलों के जानकार

पहला सुख निरोगी काया का माना जाता है। और जब बात इस काया को निरोग रखने की होती है तो जरूरत इस बात की होती है कि शरीर को संतुलित और पौष्टिक आहार मिले। एक तरह से ऐसा आहार जिसमें न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक विकास के लिए भी सारे पोषक तत्व मौजूद हों। चिकित्सा जगत में पोषक तत्वों मेंं प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, उचित मात्रा में वसा, विटामिन व मिनरल जैसे- आयरन, केल्शियम, आयोडीन, पोटेशियम, सोडियम, जिंक, मैग्नीशियम आदि की गिनती होती है। जब हम यह कहते हैं कि कोई बच्चा कुपोषण का शिकार है तो यही माना जाता है कि इन्हीं पोषक तत्वों की कमी इसकी बड़ी वजह है। शरीर कुपोषित होगा तो स्वाभाविक रूप से कई बीमारियों की चपेट में आने की आंशका बढ़ जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2020 में वैश्विक स्तर पर कुपोषण के कारण 5 वर्ष से कम आयु के 149 मिलियन बच्चे अपनी आयु की तुलना में कद में छोटे हंै। इतना ही नहीं 45 मिलियन बच्चे अपनी लम्बाई की तुलना में पतले दुबले हैं और 38.9 मिलियन मोटापे के शिकार हैं। अल्प और मध्य आयवर्ग वाले लोग जिन देशों में अधिक हैं वहां पांच वर्ष से कम आयु वर्ग की लगभग 45 प्रतिशत मौतों की वजह कुपोषण ही होती है। कुपोषण के इस वैश्विक भार के आर्थिक, सामाजिक, विकास सम्बन्धी व चिकित्सकीय परिणाम सबको भुगतने होते हैं। आम जनता को भी, परिवार को भी और एक तरह से समूचे राष्ट्र को भी। कई बार चेताया गया है कि यदि कुपोषण की रोकथाम के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसके गंभीर परिणाम भावी पीढ़ी को भुगतने होंगे। कुपोषण के इस भीषण चक्रव्यूह को तोडऩे और आमजन में पोषक तत्वों के स्वास्थ्य पर अनुकूल असर के प्रति जागरूकता लाने के लिए हमारे यहां महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एवं खाद्य व पोषण बोर्ड की ओर से प्रतिवर्ष 1 से 7 सितम्बर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है। इसका खास मकसद लोगों को उचित पोषण के प्रति सचेत करना, पोषक तत्वों के महत्त्व से आमजन को अवगत कराना एवं एक स्वस्थ जीवन शैली को अपनाने के लिए प्रेरित करना रहा है।
यह कहना होगा कि प्रथम बार भारत सरकार द्वारा 1982 में आरंभ किया गया यह राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मिशन सतत रूप से कुपोषण के उन्मूलन के लिए प्रयासरत है। इन प्रयासों के सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। इसके बावजूद कुपोषण बहुआयामी समस्या है। इसके समाधान के लिए ठोस कार्ययोजना और विभिन्न स्तरों पर एकीकृत समन्वय की आवश्यकता है। इसलिए यह जरूरी है कि परिवार और समुदाय को साथ लेकर काम हो। तब जाकर ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनियोजित पहल इस समस्या के निराकरण की पहली सीढ़ी साबित हो सकेगी।
शुरुआत परिवार से करते हैं। गृहिणी किसी भी परिवार के खाद्य उपभोग की मैनेजर होती है। अतएव गृहिणी को स्थानीय जरूरतों के अनुसार खाद्य पदार्थों के बारे में शिक्षित करना होगा। ऐसे ही स्तनपान के महत्त्व, नवजात और शिशुओं के शुरुआती पोषण के बारे में अवगत कराना भी पोषण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। गर्भावस्था से पहले, गर्भावस्था के दौरान एवं स्तनपान के समय पर्याप्त मातृपोषण भी सुनिश्चित करना होगा। साथ ही छह महीने की अवस्था में शिशुओं में स्तनपान के साथ पर्याप्त व सुरक्षित पोषण एवं अनुपूरक खाद्य पदार्थों की शुरुआत को प्रोत्साहित करना होगा। भूख के उन्मूलन और सभी तरह के कुपोषण की रोकथाम की प्रतिबद्धता के लिए आहार व पोषण के निवेश में सुधार, पोषण की रूपरेखा तय कर उसका राष्ट्रीय संसाधनों से तालमेल, मानवीय व संस्थागत क्षमताओं को मजबूत कर पोषण सुधार भी आवश्यक है।
हमें समुदाय के हर उस व्यक्ति या बच्चे को चिह्नित कर पोषण देना सुनिश्चित करना होगा, जो कुपोषण का शिकार है अथवा कुपोषित होने का जोखिम रखता हो। इस दिशा में एकीकृत बाल विकास सेवाएं ठोस और समन्वित प्रयास है। इसमें नियमित भोजन के अलावा बच्चों को पूरक पोषण, टीकाकरण, स्वास्थ्य परीक्षण, अनौपचारिक शिक्षा व माताओं के लिए स्वास्थ्य व पोषण शिक्षा प्रदान की जाती है। खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने संयुक्त रूप से विशेषज्ञों की कमेटी की रिपोर्ट पेश की थी। इसमें भी ग्रामीण विकास व कृषि उत्पादन को बढ़ावे के साथ जनसंख्या स्थिरीकरण, पोषण सुधार कार्यक्रम व पोषण संबंधी स्वास्थ्य गतिविधियों पर जोर दिया गया था। फिर भी शिक्षा, रोजगार और आर्थिक समानता के बिना कुपोषण से निजात दूर की कौड़ी ही प्रतीत होती है।