
स्वराज की बुनियाद है आदिवासी जीवन शैली
जयेश जोशी
कृषि मामलों के जानकार, सचिव और सीईओ, वाग्धारा
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हम हैं रक्षक, हम हैं पोषक, हम संरक्षक प्रकृति के।
आदि अनादि, हम अविनाशी, हम संवाहक सृष्टि के।
परहित चिंतन मनन हमारा, हम पुरोधा समष्टि के।
वसुधा के हित जीवन अपना, हम राही सुख समृद्धि के।
आज आदिवासी दिवस हमारे लिए इस रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि जड़ों की तरफ लौटने का यह एक संबल है, अभाव के बावजूद प्रकृति की खुशहाली की सौगात है। समाज को सुरक्षित रखने, प्रकृति को सहेजने की कला आदिवासी परम्पराओं में निहित है। आदिवासी समाज ने इस प्रकृति को सुरक्षित रखने की बुनियाद में अहम भूमिका निभाई है और यह सतत रूप से जारी है। यही स्वराज का मूल आधार है।
आज के बदलते जलवायु परिवर्तन के दौर में आर्थिक, पर्यावरण, सांस्कृतिक और सामाजिक विरोधाभास हमारे सामने हैं। इन्हें रोकने का कारगर तरीका आदिवासी जीवन शैली, आदिवासी संस्कृति और आदिवासी परम्पराओं से ही प्राप्त हो सकता है। आदिवासी समुदाय ने सदा से ही प्रकृति के साथ, प्रकृति के लिए, प्रकृति को देते और सहेजते हुए जीवन जीया है। जल, जमीन, जंगल, जानवर व जैव विविधता को यदि आज तक बचा कर रखा जा सका है, तो इसका श्रेय आदिवासी जीवन शैली को ही जाता है।
कृषि के बारे में चर्चा करें तो आदिवासी समुदाय ने सदैव ‘अहिंसक कृषि’ को ही अपनाया है और चक्रीय जीवन शैली के नेतृत्व को बढ़ावा दिया है अर्थात प्रकृति से कुछ लिया है तो उसे वापस लौटाया भी है। उदाहरणस्वरूप यह देखा जा सकता है कि मवेशी से दूध लिया है तो उसे मिट्टी से उपजाया हुआ घास, भोजन और पोषण को बढ़ाने के रूप में दिया और इसी तरह से मिट्टी जिसमें घास को उपजाया गया, पोषण और उपजाऊ भूमि को बचाने में मवेशी के त्यागे गए मल-मूत्र को साधन के रूप में अपनाया। इसी तरह जिस वन को आदिवासियों ने जीवनयापन का आधार बनाया, उसे सहेजा भी है और जिस जल, जमीन, खदान, खनिज से आज पूरी दुनिया चल रही है, उसके सही संरक्षक आज भी आदिवासी समुदाय और उनके क्षेत्र ही हैं।
भारत वर्ष की आबादी में करीब 8.6 फीसदी भागीदारी आदिवासी समुदाय की है। आदिवासी समुदाय पीढिय़ों से जल, जंगल, जमीन को पूजता है, देवता मानता है। भारतीय संस्कृति में यह सर्वव्याप्त है कि जब भी किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी बात का भरोसा दिलाना हो तो माता-पिता, ईष्ट या भगवान की कसम ली जाती है पर आदिवासी समुदाय में सामान्यत: बीज की कसम ली जाती है। जाहिर है कि आदिवासी समुदाय में आज भी बीज का महत्त्व सर्वोपरि है। यह वर्ष अंतरराष्ट्रीय श्रीअन्न (मिलेट) वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यह देन भी आदिवासी समुदाय की है चूंकि उसका संरक्षण आदिवासी क्षेत्रों में ही होता आया है।
आदिवासी दिवस के दिन इसे कैसे भूल सकते हैं कि स्वराज का सच्चा अनुयायी आज भी आदिवासी समुदाय और उनके द्वारा अनुकरणीय संस्कृति है। मानव समाज के हितार्थ आज यह सोचने की आवश्यकता है कि ऐसे कौन-से विषय हैं जो बदलते जलवायु परिवर्तन और आर्थिक विषमताओं में आज आदिवासी समाज के लिए भी कठिन होते जा रहे हैं? ऊर्जा का मुख्य स्रोत जल, वायु, आकाश, होते हैं तो वर्तमान में ऐसे कौन-से कारण हैं कि आदिवासी समुदाय को भी ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए समाज या सरकार की तरफ देखना होता है? यह विचारणीय प्रश्न हल होना चाहिए, वह स्वराज की प्रथम इकाई है। विगत वर्षों में बाजार ने, शिक्षा ने, समाज ने तथा हमारे सांस्कृतिक व राजनीतिक परिवेश ने कई बदलाव किए हैं। शिक्षा केवल और केवल हमारी आजीविका के लिए होकर रह गई है। जीवन का नेतृत्व करने वाले सभी गुणों व मूल्यों का ह्रास होता चला गया है। पर्यावरण से शुरू हुआ पतन हमारी जीवन शैली में घर कर गया है।
आदिवासी संस्कृति की शिक्षा प्रेरणादायक है। यह किताबी ज्ञान नहीं देती है, इसमें आने वाली पीढ़ी को प्रकृति का ज्ञान, स्वास्थ्य का ज्ञान, कृषि का ज्ञान और आनंद से रहने का ज्ञान मिलता है। यह ज्ञान सदियों से मानव जाति के विकास में सहायक था और स्वराज का सच्चा ज्ञान भी इसे कहा जा सकता है। यह आज की शिक्षा पद्धति का विरोध नहीं है पर इतना अवश्य है कि हमें आने वाली पीढिय़ों को उन विषयों से, उस संस्कृति से जोडऩा होगा जो हमें सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरण से लेकर अन्य सुरक्षा प्रदान करती है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी विकास के चाहे कितने भी सूचकांक तैयार हो जाएं, सभी सूचकांक आदिवासी जीवनशैली और उस आनंद से ही निकलते हैं जो कि पर्यावरणीय प्रकृति के घटक तथा समरसता के हैं, चाहे वे राजनीतिक हो या सांस्कृतिक।
आज सरकार, समाज, परिवारों को सोचना होगा कि हम कैसे इस संवाहक संस्कृति के पुरोधाओं का सम्मान करें, इन्हें उचित स्थान दें। गांधीजी ने जनजातीय आदिवासी जीवन शैली से स्वराज संकल्प दिया था। जरूरत है कि हम उसे मजबूती से पुनर्स्थापित कर सही मायने में संयुक्त राष्ट्र के सूचकांक को पाने का उदाहरण प्रस्तुत करें।
Published on:
09 Aug 2023 10:53 pm
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