
श्रद्धांजलि: माधुर्य का पर्याय लता मंगेशकर
दीपक महान
(वृत्तचित्र निर्देशक)
निर्विवाद रूप से 'अद्भुत' शब्द ही लता मंगेशकर की अविश्वसनीय प्रतिभा को उपयुक्त रूप से परिभाषित कर सकता है। उनका उत्कृष्ट गायन अगर स्त्री की अदम्य शक्ति, आकर्षण और संवेदनशीलता का प्रतीक था, तो साथ ही उसमें नारी मन की कोमलता, दृढ़ता और माधुर्य को भी महसूस किया जा सकता था। उनके स्वर की मिठास को शब्दों में वर्णित करना मुश्किल है, पर याद आता है कि क्यों उनकी गायिकी की परिपक्वता पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के उस्ताद बड़े गुलाम अली खान ने कहा था कि 'लता शायद ही कभी गलत स्वर लगाती है।'
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की प्रतिभा से लता मंगेशकर शुरू से परिचित थीं और उन्हें संगीतकार बनवाने में उनका प्रबल योगदान भी रहा।
प्यारेलाल ने एक बातचीत में बताया था कि बच्चों से बड़ों तक अगर उनकी आवाज का जादू व्याप्त था, तो इसलिए कि उनकी वाणी में अमृत घुला हुआ था। हालांकि संगीतकार खय्याम आशा भोसले के संग कार्य कर ज्यादा सहज रहते थे, पर लता के सुर की उत्कृष्टता और निपुणता के वे भी कायल थे।
उनका भी कथन था कि 'नारी की घुटन हो या उसके यौवन की खुशी, एक दुल्हन का विस्मय हो या झुर्रीदार माता का ममत्व, लता का स्वर सब को साकार कर देता था।' खय्याम यह स्वीकारते थे कि फिल्म 'कभी-कभी' उन्हें यश चोपड़ा ने सिर्फ इसलिए दी, क्योंकि उन्हें 'रजिया सुलतान' का लता का गाया गीत 'ऐ दिले नादान' बहुत पसंद आया था।
खय्याम साहब के साथ मेरी बातों का सिलसिला लम्बा रहा है। ऐसे ही एक बार उन्होंने बताया था कि जहां आशा भोसले खुश होने पर भूरी-भूरी प्रशंसा करती थीं, वहीं लता को जब कोई धुन पसंद आती तो 'वह कुछ बोलती नहीं थीं, लेकिन उनकी आंखों में एक चमक आ जाती थी और वे हौले-हौले मुस्कुराने लग जाती थीं।'
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खय्याम मानते थे कि अमर गायक मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर का आम भारतीयों के लिए एक भावनात्मक सहारा था, क्योंकि मानवीय भावनाओं और व्यक्तिगत संबंधों को उन्होंने उत्कृष्ट गीतों के साथ प्रेषित किया।
वैसे लता मंगेशकर के बारे में उनकी भतीजी पद्मिनी कोल्हापुरे से ज्यादा कौन जान सकता है?
कोल्हापुरे जहां आशा भोसले को जीवट व्यक्तित्व और अपनी प्रेरणा मानती हैं, वहीं लता मंगेशकर के बारे में उनका कहना है कि 'वे बहुत ही अंतर्मुखी स्त्री थीं, जो हर बात को ध्यान से सुनती थीं।' श्रवण के इसी गुण के बारे में प्यारेलाल भी इशारा करते थे कि 'लताजी धुन की बारीकी तत्काल पकड़ लेती थी और उन्हें दुबारा कुछ बताने की जरूरत नहीं पड़ती थी।'
कोल्हापुरे के अनुसार 'क्योंकि बचपन में लता मंगेशकर ने अपने पिता दीनानाथ मंगेशकर के संग नाट्यशाला में कार्य किया था, इसलिए गायिकी में उनकी अभिव्यक्ति बहुत सशक्त होती थी।'
स्वर कोकिला के निधन का शोक तो है, पर ये सांत्वना भी है कि उनकी आवाज हमेशा हमारे साथ रहेगी। उनकी आवाज ही तो उनकी पहचान है।
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Published on:
07 Feb 2022 08:42 am
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