23 मार्च 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

दागी राजनीति का सच और अधूरा सुधार

पिछले एक दशक में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने राजनेताओं के खिलाफ 193 मामले दर्ज किए, पर सजा केवल दो मामलों में हुई यानी एक प्रतिशत से भी कम। चुनाव पूर्व शपथ-पत्रों के अनुसार आपराधिक मामलों वाले सांसदों का अनुपात 2004 के 24 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 46 प्रतिशत हो गया है।

3 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Mar 23, 2026

अजीत रानाडे, वरिष्ठ अर्थशास्त्री (द बिलियन प्रेस)

फरवरी 2026 के अंत में दिल्ली की एक अदालत ने आबकारी नीति मामले में सभी 23 आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि नीति में कोई 'व्यापक साजिश या आपराधिक मंशा' नहीं थी। इनमें से एक आरोपी ने निर्दोष साबित होने से पहले 530 दिन जेल में बिताए। पिछले एक दशक में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने राजनेताओं के खिलाफ 193 मामले दर्ज किए, लेकिन सजा केवल दो मामलों में हुई यानी एक प्रतिशत से भी कम। दूसरी ओर, राजनीति के अपराधीकरण का एक यह चिंताजनक तथ्य भी देखिए। चुनाव पूर्व शपथ-पत्रों के अनुसार, आपराधिक मामलों वाले सांसदों का अनुपात 2004 के 24 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 46 प्रतिशत हो गया है। देश के 45 प्रतिशत मौजूदा विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 29 प्रतिशत पर हत्या, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। राजनीति का यह बढ़ता अपराधीकरण लोकतांत्रिक जीवन के लिए घातक है।

यही विरोधाभास वर्तमान में संयुक्त संसदीय समिति के पास विचाराधीन संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 के केंद्र में है। इस विधेयक के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई कैबिनेट मंत्री पांच साल या उससे अधिक की सजा वाले किसी आरोप में लगातार तीस दिनों तक जेल में रहता है, तो उसका पद स्वत: समाप्त हो जाएगा। मंशा 'जेल से सरकार' चलाने की परंपरा को खत्म करना है, लेकिन जिस तरीके से यह व्यवस्था बनाई गई है, वह बेहद त्रुटिपूर्ण है। अदालत में लंबित मामला कोई साधारण पुलिस एफआइआर या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की शिकायत नहीं होता। अदालत में आरोप तभी तय होते हैं, जब पूरी जांच के बाद न्यायाधीश स्वतंत्र रूप से यह मान लेते हैं कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है। यह एक न्यायिक प्रक्रिया है, जिसमें अदालत अपने विवेक का प्रयोग करती है।

सामान्य नागरिक के खिलाफ यदि ऐसा कोई गंभीर आपराधिक आरोप तय हो जाए तो उसे सरकारी नौकरी मिलना लगभग असंभव हो जाता है, फिर भी राजनेता हर मामले को 'राजनीतिक प्रतिशोध' बताते हैं। यह सवाल उठता है कि हत्या, बलात्कार, अपहरण या जबरन वसूली जैसे गंभीर मामलों में भी क्या अदालतें बिना पर्याप्त आधार के आरोप तय कर देती हैं? स्पष्ट है कि ऐसा नहीं होता। विधेयक की खामी है कि यह पद से हटाने के लिए अदालती कार्यवाही के बजाय गिरफ्तारी को आधार बनाता है। गिरफ्तारी एक कार्यपालिका की कार्रवाई है, जबकि आरोप तय करना न्यायपालिका की प्रक्रिया है। जांच एजेंसियां बिना दोषसिद्धि या मुकदमे के भी किसी को गिरफ्तार कर सकती हैं और लंबे समय तक हिरासत में रख सकती हैं। मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून और यूएपीए जैसे कानूनों में 30 दिनों के भीतर जमानत मिलना लगभग असंभव है। इससे एक खतरनाक स्थिति बन सकती है कि कोई भी सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों को ऐसे कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तार कराकर तीस दिन जेल में रखे और अदालत के मामला परखने से पहले ही उन्हें पद से बेदखल कर दे। इस विधेयक में ऐसे दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई सुरक्षा प्रावधान नहीं है।

विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट ने यह स्पष्ट सिफारिश की थी कि अयोग्यता का आधार अदालत की ओर से आरोप निर्धारण होना चाहिए, न कि गिरफ्तारी। हालांकि इस बहस का एक दूसरा पक्ष भी है। भारत की निचली अदालतों में दोषसिद्धि की दर बहुत कम है। यदि यह कानून लागू होता है, तो आशंका है कि उन लोगों को भी पद गंवाना पड़ेगा जो अंतत: निर्दोष साबित होंगे। लेकिन इसका समाधान राजनीति में दागी चेहरों को स्वीकार करना नहीं, बल्कि न्यायिक और जांच प्रणाली को सुधारना है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 व 2017 में निर्देश दिया था कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमों की सुनवाई फास्ट ट्रैक में होनी चाहिए। सीआरपीसी की धारा 321 के तहत सरकार की ओर से रसूखदार नेताओं के खिलाफ मामले वापस लेने की शक्ति पर अंकुश लगना चाहिए। जांच एजेंसियों को भी अदालतों के समक्ष ठोस साक्ष्य रखने के आधार पर ही कार्रवाई करनी चाहिए। उन्हें किसी राजनीतिक दबाव में नहीं आना चाहिए। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार यदि कोई मंत्री तीस दिन जेल में रहने के कारण पद से हट जाता है और बाद में जमानत पर रिहा हो जाता है, तो उसे फिर से मंत्री बनाया जा सकता है। यानी आरोप वही हैं, केवल कुछ समय का व्यवधान है। साथ ही, यह केवल मंत्रियों पर लागू होता है। सबसे बड़ी बात कि यह विधेयक उन उम्मीदवारों को चुनाव लडऩे से नहीं रोकता, जिनके खिलाफ गंभीर आरोप पहले से तय हो चुके हैं।

वोहरा समिति (1993) से लेकर सर्वोच्च न्यायालय (2018) तक इस समस्या के समाधान के कई सुझाव दे चुके हैं। सभी ने संसद से आग्रह किया है कि यदि चुनाव से कम से कम छह महीने पहले किसी सक्षम न्यायालय ने पांच साल या उससे अधिक की सजा वाले अपराध में आरोप तय कर दिए हैं, तो उम्मीदवार को अयोग्य घोषित किया जाए। राजनीतिक दलों को आरटीआइ के दायरे में लाना और 'नोटा' को मजबूत करना अनिवार्य है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने सुझाव दिया है कि यदि किसी मंत्री, सांसद या विधायक के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(1), 8(2) और 8(3) के अंतर्गत या पांच वर्ष से अधिक सजा वाले अपराध में अदालत की ओर से आरोप तय हो जाएं, तो उसे स्वत: पद से हटा दिया जाए। 130वां संविधान संशोधन वर्तमान स्वरूप में इन दोनों खतरों के बीच उलझा दिखाता है- न तो यह राजनीति को अपराधमुक्त करने में प्रभावी है और न ही इसके दुरुपयोग की आशंका को दूर करता है।