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अनिद्रा व मूड स्विंग के दुष्चक्र में उलझी युवा पीढ़ी

मूड स्विंग शब्द का सबसे पहले उल्लेख 1916 में सदर्न मेडिकल जर्नल में मिलता है। इटली के यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन एंड फार्मेसी के मनोवैज्ञानिकों के अनुसार नींद की कमी के कारण बार-बार खाने की इच्छा भी होने लगती है और इससे मोटापा भी बढ़ता है, सर्दी जुकाम और हृदय गति बढऩा, रक्तचाप बढऩे-घटने जैसे हालात होने लगते हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 23, 2026

डॉ. राजेंद्र प्रसाद शर्मा, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार

आज की जीवनशैली से युवा मूड स्विंग के सहज शिकार हो रहे हैं। काम का अत्यधिक बोझ, समय-असमय ऑनलाइन और हाइब्रिड मीटिंगों का दौर, कहने को कार्य समय निर्धारित होने के बावजूद इंटरनेट की दुनिया में कभी भी कहीं भी किसी भी समय पर ऑनलाइन होने का दबाव और इसी तरह की गतिविधियों के कारण युवाओं की जीवनशैली बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इससे उनमें अनिद्रा की शिकायत देखी जा रही है। मानसिक तनाव और मनोवैज्ञानिक दबाव के चलते नींद पूरी नहीं हो पाती है और इसके साइड इफेक्ट के तौर पर मूड स्विंग, ब्रेन फॉग आम होते जा रहे हैं।

पूरी नींद स्वस्थ शरीर की पहली आवश्यकता है। स्वस्थ शरीर के लिए 7 से 9 घंटे की नींद जरूरी मानी गई हैं। एम्स के मनोचिकित्सक डॉक्टर श्रीनिवास टी के अनुसार नींद केवल आराम नहीं, बल्कि दिमाग और भावनाओं को नए सिरे से तैयार करती है। हार्मोन और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती है। वैसे भी शारीरिक और मानसिक थकावट को नींद कुछ ही क्षणों में दूर कर देती है और पूरी नींद होने के बाद व्यक्ति तरोताजा महसूस करता है। हमारी जीवनशैली और चारों ओर के जाने-अनजाने दबाव ही इतने हो जाते हैं कि नींद पूरी ही नहीं हो पाती और मूड स्विंग जैसे हालात होने लगे हैं। मूड स्विंग शब्द का सबसे पहले उल्लेख 1916 में सदर्न मेडिकल जर्नल में मिलता है। इटली के यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन एंड फार्मेसी के मनोवैज्ञानिकों के अनुसार नींद की कमी के कारण बार-बार खाने की इच्छा भी होने लगती है और इससे मोटापा भी बढ़ता है, सर्दी जुकाम और हृदय गति बढऩा, रक्तचाप बढऩे-घटने जैसे हालात होने लगते हैं।

बीसवीं सदी में तो मूड स्विंग आम होता जा रहा है। नींद पूरी नहीं होने के कारण जहां आलस्य, थकावट और स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं हो जाती हैं। स्लीप साइकिल प्रभावित होने लगता है। मूड स्विंग ऐसा नहीं है कि कोई लाइलाज हो। अब स्लीप बैंक का कंसेप्ट भी सामने आ रहा है। जब आपको लगे कि काम का बोझ अधिक होने वाला है तो समय निकाल कर कुछ समय सोकर आराम किया जा सकता है। देखा जाए तो जीवनशैली में बदलाव से इसका आसानी से हल खोजा जा सकता है। नींद नहीं आने या यों कहें कि अनिद्रा को नियमित जीवनशैली से ठीक किया जा सकता है। इसके लिए रात को समय पर खाना खाने, सोने का समय तय करने, ऑनलाइन स्क्रीन पर रहने की समय सीमा तय करने, योग-ध्यान और व्यायाम, तनाव कम करने के कारण खोजने, परिवार के साथ अधिक समय बिताने, समय का समग्र प्रबंधन तय करने से काफी कुछ समाधान खोजा जा सकता है। मूड ट्रेकर के माध्यम से भी समाधान प्राप्त किया जा सकता है। डायरी लेखन इसका एक समाधान हो सकता है।