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Patrika Opinion: आर्थिक अनुशासन की अनदेखी का नतीजा

कर्ज सीमा को लेकर अमरीका का मौजूदा संकट श्रीलंका, पाकिस्तान और लेबनान जैसा भी नहीं है। दरअसल, यह संकट अमरीका में सरकार को आर्थिक अनुशासन में रखने के लिए संविधान में तय व्यवस्था का पालन नहीं करने से उपजा है।

May 24, 2023 / 10:39 pm

Patrika Desk

Patrika Opinion: आर्थिक अनुशासन की अनदेखी का नतीजा

Patrika Opinion: आर्थिक अनुशासन की अनदेखी का नतीजा

दुनिया के अधिकांश देशों का बजट यों तो आमदनी के मुकाबले ज्यादा खर्च का रहता आया है। घाटे वाले बजट के कारण ही सरकारों को कर्ज लेना पड़ता है। लेकिन अमरीका जैसे दुनिया के सबसे अमीर देश पर भी कर्ज सीमा न बढऩे पर डिफॉल्टर होने का खतरा मंडराने लगा है। सीधे तौर पर दुनिया के देशों के लिए यह संकट एक संदेश भी है कि सत्ता में बैठे लोगों को आर्थिक अनुशासन की पालना नहीं करने पर कई संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
अमरीका पर जो खतरा मंडरा रहा है वह दरअसल कर्ज सीमा बढ़ाने के मुद्दे से जुड़ा है। अमरीका में कर्ज सीमा बढ़ाने के लिए वहां की संसद यानी अमरीकी कांग्रेस से अनुमति जरूरी होती है। कर्ज सीमा बढ़ाने को लेकर राष्ट्रपति जो बाइडन और विपक्षी रिपब्लिक पार्टी के बीच सहमति नहीं बन पा रही। दिक्कत यह है कि बाइडन की डेमोक्रेटिक पार्टी के पास संसद में बहुमत नहीं है। हालांकि, बाइडन दावा कर रहे हैं डिफॉल्टर होने की नौबत नहीं आएगी क्योंकि हाउस स्पीकर केविन मैक्कार्थी से उनकी बातचीत सकारात्मक रही है, जो जल्द ही सिरे चढ़ जाएगी। वैसे, दोनों नेताओं के बीच अब तक की बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। कर्ज सीमा को लेकर अमरीका का मौजूदा संकट श्रीलंका, पाकिस्तान और लेबनान जैसा भी नहीं है। दरअसल, यह संकट अमरीका में सरकार को आर्थिक अनुशासन में रखने के लिए संविधान में तय व्यवस्था का पालन नहीं करने से उपजा है। वहां संविधान में सरकार पर आर्थिक अंकुश रखने का प्रावधान भी इसीलिए किया गया है ताकि वह संसद की अनुमति लिए बगैर मनमाना कर्ज न ले सके। अमरीका की राष्ट्रीय कर्ज सीमा फिलहाल 31,400 लाख करोड़ डॉलर है। अपनी कल्याणकारी योजनाओं का खर्च पूरा करने के लिए बाइडन सरकार लगातार कर्ज लेती जा रही है। यही कारण है कि अमरीका का कर्ज जनवरी में ही तय सीमा छू चुका है। इस मामले में समझौता नहीं हो पाने की बड़ी वजह है विपक्षी रिपब्लिकन सांसदों का यह मत कि सरकार का लगातार इतना पैसा खर्च करना जारी नहीं रह सकता। जबकि सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए इसे जारी रखना चाहेगी।
हो सकता है कि जून से पहले अमरीका में कर्ज सीमा संकट को लेकर समाधान निकल जाए, लेकिन भारत समेत उन देशों की केन्द्र व राज्य सरकारों के लिए भी यह एक सबक है, जो राजनीतिक फायदे के लिए कल्याणकारी योजनाओं में मुफ्त सुविधाओं पर सरकारी खजाना लुटाने में जुटी रहती हैं।

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