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आतंकवाद से जंग: पहलगाम हमले के बाद नई साइबर रणनीति जरूरी

— डॉ.पवन दुग्गल (सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता एवं साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ )

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

May 06, 2025

पहलगाम में हुए हमले ने भारत के लिए एक नई चुनौती पैदा की है। अब देश को अपनी साइबर संपत्तियों और महत्त्वपूर्ण सूचना ढांचे पर होने वाले नए तरह के हमलों के लिए तैयार रहना होगा। भारत पहले भी ऐसे हमलों का निशाना रहा है, लेकिन मौजूदा हालात में विरोधियों की ऐसी गतिविधियों को अंजाम देने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो गई है। देश के महत्त्वपूर्ण सूचना ढांचे को निशाना बनाना, राष्ट्र के विकास, प्रगति और समृद्धि को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने की मंशा रखने वाले तत्वों की प्राथमिकता बन सकता है।

सरकार अपनी ओर से महत्त्वपूर्ण सूचना ढांचे की सुरक्षा के लिए कदम उठा रही है। राष्ट्रीय सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र इस दिशा में सराहनीय काम कर रहा है, लेकिन कानूनी दृष्टिकोण से भारत अब भी कई देशों से पीछे है। फिलहाल, भारत के पास साइबर सुरक्षा के लिए कोई ठोस कानून नहीं है। हमारे पास ऐसा व्यापक कानूनी ढांचा भी नहीं है, जो महत्त्वपूर्ण सूचना ढांचे की सुरक्षा से संबंधित सभी मुद्दों का त्वरित रूप से समाधान कर सके। वर्ष 2013 की राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति इस दिशा में एक आशाजनक दस्तावेज थी, लेकिन इसका प्रभावी क्रियान्वयन न हो पाने के कारण यह काफी हद तक कागजी शेर साबित हुई। ऐसे समय में जब भारत के सूचना ढांचे पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) आधारित हमले किए जा रहे हैं, भारत को एक नई रणनीति विकसित करने की आवश्यकता है।

हमें न सिर्फ साइबर सुरक्षा के लिए विशेष कानून चाहिए, बल्कि एआइ आधारित साइबर हमलों का जवाब देने के लिए भी नई तकनीकी रणनीति चाहिए। भारत को अपने महत्त्वपूर्ण सूचना ढांचे की सुरक्षा के लिए एआइ का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन इस सावधानी के साथ कि यह मानव नियंत्रण में हो। हाल ही स्पेन में बिजली गुल होने से हवाई अड्डे और ट्रेनें ठप हो गई थीं। स्पेन की घटना यह दर्शाती है कि नेटवर्क और महत्त्वपूर्ण सूचना ढांचे को कितनी आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। भारत पर भी ऐसे हमलों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। भारत को एक व्यापक राष्ट्रीय साइबर संकटमोचक योजना बनाने और उसे शीघ्रता से लागू करने की जरूरत है। ऐसी योजना भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक मजबूत सोच विकसित करने के लिए महत्त्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से, भारत में अभी तक साइबर संकट से निपटने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है, जबकि हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर इस अवधारणा का बहुत महत्त्व बढ़ गया है। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ ने साइबर संकट से निपटने के लिए अधिनियम बनाया है। भारत को भी ऐसी विस्तृत कार्य योजना चाहिए, जिसमें यह स्पष्ट हो कि साइबर हमले की स्थिति में क्या करना है। इसमें सभी पक्षों यथा सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिकों के अधिकार, कत्र्तव्य और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना होगा।

वर्ष 2000 का सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम अब 25 वर्ष पुराना हो चुका है और अपनी उपयोगिता खो चुका है। इसे छोटे-मोटे संशोधनों से नहीं, बल्कि इसमें पूरी तरह से बदलाव किए जाने की जरूरत है। नए आइटी अधिनियम में उभरती साइबर सुरक्षा चुनौतियों की वास्तविकताओं को प्रभावी ढंग से प्रतिबिंबित करने वाले नए प्रावधानों के साथ आधुनिक बनाया जाना चाहिए। यह समय की आवश्यकता है कि हम तुरंत प्रतिक्रिया देने की बजाय साइबर सुरक्षा के लिए मजबूत कानूनी ढांचे में निवेश करें। यह एक अच्छी शुरुआत होगी, लेकिन इसमें अभी बहुत कुछ करना बाकी है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि साइबर सुरक्षा भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता से सीधे जुड़ी है। वैश्विक साइबर सुरक्षा में भारत की भूमिका अहम है। भारत अपने सुरक्षा ढांचे की सुरक्षा के लिए जो कदम उठाएगा, वह अन्य देशों के लिए भी मिसाल बनेगा। इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर काम करना होगा। दोनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी ताकि भारत की साइबर संपत्तियां सुरक्षित रहें और हमारा साइबर पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हो।