
'स्वदेश' में पानी लाने की कोशिश खेती नहीं, बिजली के लिए दिखती है।
विनोद अनुपम
(राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक)
देश के कई शहरों से गर्मी के इस मौसम में भू-जल के पूरी तरह से समाप्त होने की खबर सुर्खियां बनी हैं। तीस साल से भी अधिक हो गए होंगे जब प्रधानमंत्री ने कहा था कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। लगभग उसी समय शेखर कपूर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'पानी' बनाने की घोषणा की थी। 'पानी' तो अभी तक नहीं बन सकी, लेकिन कुछ फिल्में हिन्दी सिनेमा के पास अवश्य हैं जहां परदे पर पानी अपने पूरे वजूद और महत्त्व के साथ दिखाई देता है।
देव आनंद की 'गाइड' और आमिर खान की 'लगान' में जब परदे पर पानी की बूंदें आसमान से बरसते दिखती हैं तो खुशी से सिर्फ पात्र ही उल्लसित नहीं होते, दर्शकों के मन में भी पानी की जीवनदायिनी अहमियत का अहसास हो जाता है। लेकिन जब परदे से गांव गिरांव ही गायब हो गए तो भला कहां दिखेंगे खेत और कहां दिखेगी पानी की उन बूंदों का अहमियत। 1971 में ख्वाजा अहमद अब्बास ने समय, समाज और सरोकार को पानी से जोड़ते हुए एक महत्त्वपूर्ण फिल्म बनाई, 'दो बूंद पानी'। यह फिल्म मूलत: राजस्थान में बन रहे गंगा सागर कनाल प्रोजेक्ट की पृष्ठभूमि में थी, जिसमें अपना योगदान देने के लिए राजस्थान के एक सूखाग्रस्त गांव से नायक जलाल आगा अपना भरा पूरा परिवार छोड़ कर आ जाता है कि यह प्रोजेक्ट राजस्थान के रेगिस्तान की तकदीर बदल देगा। कनाल प्रोजेक्ट तैयार हो जाता है, राजस्थान को पानी मिल जाता है पर नायक को समाज के ही दुष्टों के कारण अपना परिवार खोना पड़ जाता है। यह आजादी के बाद के दौर की ऐसी फिल्में थीं जिनमें आमजन से उम्मीद की जाती थी कि देश के विकास में वे नि:स्वार्थ योगदान दें। जो भी हो पानी की अहमियत तो यह फिल्म बखूबी दर्शाती ही थी।
भारत कृषि प्रधान देश माना जाता रहा है तो आश्चर्य नहीं कि खेती, सूखे और पानी के संबंध पर हिन्दी में कई फिल्में बनीं, पर कथानक में पानी के सीधे हस्तक्षेप को दर्शाती फिल्मों को याद करें तो सिर्फ 'मदर इंडिया' की ही याद आती है। यहां ऑस्कर तक पहुंची 'जल' की चर्चा आवश्यक है, कच्छ के रण पर केंद्रित इस फिल्म में पानी को मनुष्य ही नहीं, पक्षियों के लिए भी इसकी अहमियत रेखांकित की गई थी। 'स्वदेश' में पानी लाने की कोशिश खेती नहीं, बिजली के लिए दिखती है। सिनेमा ही नहीं, सिनेमा के गीतों में भी पानी की चर्चा अधिकांशत: मुहावरे के रूप में ही सुनी जाती है। वास्तव में जब भी तरलता और सरलता का चरम पारिभाषित करना होता है तो हमारे पास पानी के सिवाय विकल्प नहीं होता। पानी आदि तत्त्व माना जाता है, यह हमारे जीवन ही नहीं, स्वभाव को भी नियंत्रित करता है। यह कहीं न कहीं जीवन की सीख भी देता है, जो सिनेमा में भी ध्वनित होता रहा है। फिल्म 'अनोखी रात' का गीत... ओह रे ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में, सागर मिले कौन से जल में... हमारे संपूर्ण जीवन दर्शन को अभिव्यक्त करता हुआ लगता है।
लेकिन यह सवाल अपनी जगह ही है कि क्या हिन्दी सिनेमा में पानी की वास्तविक समस्या भी दिखेगी। सिनेमा के एजेंडे में यह नहीं है, तो फिर वाकई सिनेमा में पानी का दिखना चिंतित करता है, क्योंकि कहा जाता है द्ग परदे पर बारिश के एक दृश्य को फिल्माने में 20 हजार लीटर पानी खर्च हो जाता है। यदि वाकई परदे पर हम पानी देखते रहना चाहते हैं तो निश्चित रूप से हमें कोशिश करनी होगी पानी को अपनी जिन्दगी में कायम रखने की भी।
Published on:
12 Jun 2022 05:37 pm
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