
-डॉ. प्रभात ओझा
पिछले दिनों इंदौर शहर में दूषित पानी पीने से लोगों की मौत और बीमार होने की खबर चिंताजनक है। यह तब हुआ है, जब मध्य प्रदेश का यह शहर स्वच्छता सर्वेक्षण के मुताबिक लगातार आठ वर्षों से देश में नंबर वन पर बना हुआ है। प्रारम्भिक जानकारी के अनुसार शहर के भागीरथपुरा में यह समस्या पाइप लाइन के फटने और उसमें सीवरेज के जुड़ जाने से हुआ है। देश के सबसे स्वच्छ शहर के माथे पर यह कलंक उसकी ही असावधानी से लगा है। सच यह है कि स्वच्छ पेयजल स्वच्छता का पहला मानक हुआ करता है। पानी जीवन के हर पड़ाव पर आवश्यक है। इसीलिए 'जल है तो जीवन है' का सूत्र वाक्य आमतौर पर प्रचलित है।
वर्तमान केंद्र सरकार ने इसे ही ध्येय बनाकर राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम का पुनर्गठन कर देश में 'हर घर नल जल' मुहिम शुरू की। सरकार की संकल्पनिष्ठ मंशा का अंदाज इससे भी लगता है कि केंद्र में अलग से जलशक्ति मंत्रालय गठित किया गया है। कहा गया है कि वर्ष 2019 में जहां देश के 16.71 प्रतिशत ग्रामीण घरों में पानी के कनेक्शन थे, वह पिछले वर्ष के अक्टूबर तक 81 फीसदी से ज्यादा हो गए थे। इसके 93 प्रतिशत तक होने के भी दावे हैं। स्वाभाविक है कि जलापूर्ति योजनाओं के तहत हर घर में पेयजल पहुंचाने का उद्देश्य लोगों को निरोग रखना ही है। इन योजनाओं के पानी से सबसे बड़ा लाभ पेयजल को आर्सेनिक और फ्लोराइड से मुक्त रखना है। आर्सेनिक से प्राय: चमड़ी का काला होना और शरीर पर घाव हो जाने के सामान्य रोग तो होते ही हैं, इसकी अधिकता से फेफड़े, किडनी और मूत्राशय का कैंसर जैसे गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं। आर्सेनिक न्यूरोलॉजी संबंधी दिक्कतों का भी कारक है। खासकर बच्चों का मंदबुद्धि होना भी इसी कारण है। जहां तक फ्लोराइड की बात है, यह हड्डियों और दांतों को तो नुकसान पहुंचाता ही है, इससे स्मरण शक्ति घटने के अलावा किडनी और हृदय सम्बंधी दिक्कतें भी होती हैं। पेट संबंधी रोग तो फ्लोराइड की अधिकता से होते ही हैं। दुखद है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उनके अनुसार भारत के एक करोड़ 96 लाख घरों में आर्सेनिक और फ्लोराइड की अधिकता वाला पानी मिलता है। पेयजल में यह अतिरिक्त आर्सेनिक सिर्फ पश्चिम बंगाल में करीब डेढ़ करोड़ लोगों को प्रभावित कर रहा है। फ्लोराइड की अधिकता देश के 19 राज्यों में करोड़ों लोगों को बीमार बनाती है।
प्रश्न है कि पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड कैसे बढ़ जाते हैं। पहला कारण तो प्राकृतिक स्रोत ही हैं। चट्टानों और पथरीली मिट्टी से रिसकर आने वाला पानी अधिक आर्सेनिक वाला हो सकता है। पृथ्वी की पपड़ी में भी आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा होती है। बरसात अथवा नदियों का पानी ग्रेनाइट आदि के संपर्क में आता है और भूजल के साथ जुड़ जाता है। हालांकि इससे बड़े कारण हमारी अपनी गलतियां अथवा असावधानी ही हैं। देश के कई शहरों में कल-कारखानों का कचरा नदियों में डाला जाता है। इन नदियों से लिया जाने वाला पेयजल यदि ठीक तरीके से परिष्कृत नहीं किया गया, तो प्रदूषण के ये तत्व हम तक आसानी से पहुंच जाते हैं। हमारी असावधानियों में दूसरा खेतों में रसायनों का बहुतायत उपयोग है। ये रसायन सीधे फसल में तो पहुंचते ही हैं, लंबी अवधि में खेतों के नीचे भूगर्भीय जल से भी मिल जाते हैं। हमारी गलतियों में तीसरा बड़ा मामला पानी के लिए अत्यधिक बोरिंग और सबमर्सिबल पंप का बढ़ रहा उपयोग है। ऐसा करते समय हम इस बात से अनजान रहते हैं कि इन उपकरणों से पानी में दूषित तत्व भी आ जाते हैं। एक मानक के अनुसार पानी में आर्सेनिक की उपस्थिति 0.01 पीपीएम तक ठीक है। यह अधिकतम 0.05 पीपीएम तक हो सकता है। इसी तरह फ्लोराइड 1.0 पीपीएम से 1.5 पीपीएम तक ही हो सकता है।
उक्त आंकड़ों से हमें कुछ सीख लेनी होगी। तथ्य यह है कि भारत भूजल का उपयोग करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है। कुछ दशकों में बोरिंग के अत्यधिक उपयोग से भूजल में कमी हो रही है। अनुमान के अनुसार देश में करीब 3 करोड़ भूजल आपूर्ति केंद्र हैं। इनसे ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी की 85 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 48 प्रतिशत की आपूर्ति होती है। कुछ हद तक निश्चिंत हुआ जा सकता है कि 'हर घर नल जल' जैसी योजनाएं इस ओर से सचेत है। फिर 'स्वजल' जैसे कार्यक्रम में पेयजल की जांच के कई स्तर तय किए गये हैं। प्रश्न यह है कि देश की स्थानीय इकाइयां इस दिशा में कितना सावधान रहती हैं। सरकारें साधन ही उपलब्ध करा सकती हैं। आज स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता में कमी के कारण दुनियाभर में 260 अरब डॉलर का नुकसान होता है। भारत में यह नुकसान 42 अरब रुपए का आंका गया है। स्वाभाविक रूप से सरकारों के साथ- साथ स्थानीय इकाइयों और आम लोगों को भी स्वास्थ्य के मूल कारण पानी पर अधिक ध्यान देना पड़ेगा।
Updated on:
08 Jan 2026 07:37 pm
Published on:
08 Jan 2026 06:06 pm
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