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आपकी बात…खर्चीली शादियों का समाज पर क्या असर पड रहा है?

पाठकोें की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनींदा प्रतिक्रियाएं...

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

Mar 11, 2024

आपकी बात...खर्चीली शादियों का समाज पर क्या असर पड रहा है?

आपकी बात...खर्चीली शादियों का समाज पर क्या असर पड रहा है?

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर दबाव
शादियों में फिजूल खर्च होता है। धनाड्य वर्ग के लोग शादी में बढ— चढ कर खर्च करते हैं। उन्हें लोगों से अपनी तारीफ सुनना होता है। लेकिन समाज में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर इसका भारी दबाव पडता है। उन्हें भी दिखावे के चक्कर में अनाप—शनाप खर्च करना पडता है। अन्यथा समाज में वह अलग—थलग महसूस करता है। अधिक खर्च करने के चक्कर में कई लोग कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। यानी समाज मे केवल कुछ धनी लोगों की वजह से शादियों मे फिजूलखर्ची का दौर आ गया है। गरीब लोगों को इस दिखावे में नुकसान उठाना पडता है।
अशोक कुमार शर्मा, जयपुर

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कोविड काल में हुए सादा विवाह हो सकते हैं प्रेरक
समाज में आर्थिक असमानता बहुत अधिक हो गई है। जिस वर्ग की आर्थिक स्थिति अच्छी है, विवाह कार्यक्रम पर अंधाधुंध पैसा खर्च करते है। वहीं अन्य वर्ग जिनकी स्थिति उतनी ठीक नहीं, फिर भी पैसे खर्च करना समाज में रहने के लिए मूल आवश्यकता बन गई है। चाहे पैसों के लिए कर्जा लें। इससे समाज में बिखराव पैदा होता है। कोविड काल में हुए विवाहों के मात्र चाय पिलाकर बेटी विदा करने के उदाहरण बहुत अच्छे उदाहरण थे। इस प्रकार के सहज बदलाव से समाज पर शादियों के अतिरिक्त खर्चों से बचाया जा सकता है।
—इंदु मणि, जयपुर

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खर्चीली शादियां कभी न खत्म होने वाली होड
खर्चीली शादियों में अहम् भूमिका अंतहीन होड़ की है। हर धनी परिवार कुछ नया करने के चक्कर में अनाप शनाप पैसा खर्च करते हैं। इसके बावजूद कमियां रह जाती हैं। कम पैसे वालों पर इसका खासा असर दिखता है। उनमें तनाव, कुंठा, घबराहट, कर्ज का बोझ व भविष्य की चिंता सताती है। उनके दिलोदिमाग पर गहरा असर पडता है।
—दर्शना जैन, खंडवा मप्र

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सामूहिक विवाह हो सकता है बेहतर विकल्प
विवाह भारतीय संस्कृति में अतिआवश्यक संस्कार है । विवाह से ही परिवार का निर्माण होता है। आज शादियों में अनावश्यक दिखावे का प्रचलन बढ़ गया है। यह दिखावा बड़े अमीर परिवारों के बजट में रहता है तो उन पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे भी उसी प्रकार के दिखावे का अपेक्षा करने लगते हैं। जिसके कारण परिवार के मुखिया को जमीन बेचना पड़ जाती है या कर्ज लेना पड़ता है या बरसों के जमापूंजी अनावश्यक चीजों में खर्च हो जाती है जो उचित नहीं है। जिन परिवारों को उचित लगे उनके लिए आज सामूहिक आदर्श विवाह भी एक बेहतर विकल्प है। शादियों में खर्च अपने बजट के अनुसार ही करने चाहिए। शादियों में अत्यधिक अनावश्यक खर्च के स्थान पर अपने बच्चों के अच्छे शिक्षा पर खर्च करनी चाहिए जो उनके भविष्य में काम आए।
- उमराव सिंह वर्मा, बेमेतरा छत्तीसगढ़

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खर्चीली शादियों से टूटने की कगार पर परिवार
देश में शादी समारोह में फिजूल खर्ची का एक फैशन सा बन गया है। धनी परिवार के लोग विवाह के अलावा प्रीवेडिंग के नाम पर भी अनाप शनाप खर्च कर रहे हैं। उनकी देखादेखी मध्यमवर्गीय परिवार भी इस ट्रैप में फंस रहे हैं। कर्ज लेकर परिवार विवाह में हैसियत से अधिक खर्च कर देते हैं। लेकिन बाद में ब्याज के जाल में फंस जाते हैं। फिर परिवारों में झगडे होते हैं। कई जगह तो परिवार टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं, यह आत्महत्याएं व अपराध के क्षेत्र में पहुंचा देते हैं।
—कमल किशोर,बरसनी

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खर्चीली शादियां समाज के लिए घातक
खर्चीली शादियां समाज में प्रतिष्ठा का प्रतीक बनती जा रही हैं। यह समाज के लिए घातक है। इन शादियों की चकाचौंध और सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते विडियोज ने तो इसे आमजन का सपना बना दिया है । वो इस सपने को पूरा करने में या तो जीवन की पूरी जमा पूंजी लगा देता है या उधार लेकर इसे पूरा करते हैं। अनके साधारण परिवारों के लिए ये खुशियां नही जी का जंजाल बनती जा रही हैं। हमें समझना होगा और इस चकाचौंध से इतर सादा समारोह का आयोजन कर आगे की जिंदगी खुशहाल होगी।
—गजेंद्र चौहान, कसौदा, जिला डीग

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निम्न व मध्यमवर्गीय समाज पर बुरा असर
खर्चीली शादियों का बुरा असर निम्न व मध्यमवर्गीय समाज पर पड रहा है। बराबर दिखाने के चक्कर मे ब्याजखोरों से महंगे ब्याज पर धन उधार लेकर शादियां तो कर दी जाती हैं, लेकिन कर्ज नही चुकाने की स्थिति में निम्न व मध्यमवर्गीय परिवारों को अचल संपत्ति यथा खेती की जमीन, मकान, गहने तक को बेचान करना पड़ता है। इन सब के बाद भी धन चुक जाए, यह पक्का नही।
गजानंद गुरू, अभयपुरा-सागानेर।