
नेताओं की खर्चीली शादियों का समाज पर क्या असर पड़ता है?
विपरीत असर
नेताओं की खर्चीली शादियों से समाज पर विपरीत और दूरगामी असर पड़ता है। जो व्यक्ति जनसेवक होकर मतदाताओं की सेवा करने का दायित्व ग्रहण करने की शपथ लेता है, उस जननायक के प्रति आमजन में नकारात्मक सोच उत्पन्न हो जाती है। आमजन स्वयं को ठगा सा महसूस करते हंै। सादगी की विचारधारा पर विपरीत असर पड़ता है।
-सुनील पारीक, बहरोड़
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शादी समारोह सादगी से हों
शादियों में अनाप शनाप खर्च और दिखावा अपना स्टेटस बढ़ाने और समाज में रूतबा कायम करने का जरिया बन रहा है। नेता खुद की या अपने परिजन की शादी में बेशुुमार खर्च करते हैं। इसके देखा-देखी समाज के दूसरे लोग भी करते हैं। बेहतर तो यह है कि शादियां सादगी से होनी चाहिए।
-सत्तार खान कायमखानी, कुचेरा, नागौर
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बढ़ जाता है कर्ज
मनुष्य में स्वाभाविक रूप से अनुकरण की प्रवृत्ति होती है। नेताओं की खर्चीली शादियां देखकर जन सामान्य में भी ज्यादा खर्च करने की भावना जागृत हो सकती है। इस कारण से उन पर कर्ज का भार बढ़ सकता है। शादियों में व्यर्थ का तामझाम करने एवं फिजूलखर्ची की अपेक्षा बची हुई धनराशि का समाज के हित में उपयोग करना ज्यादा श्रेयस्कर है।
-ललित महालकरी, इंदौर
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समाज पर बुरा असर नेताओं के परिवार में होने वाले शादी समारोह बहुत ज्यादा खर्चीले हो रहे हैं। देखादेखी दूसरे भी खर्च करते हैं और मुश्किल में पड़ जाते हैं। ऐसे आयोजनों से लोगों में हीन भावना पनपती है। -लता अग्रवाल, चित्तौडग़ढ़
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पब्लिक सब जानती है नेताओं की खर्चीली शादियां समाज पर विपरीत असर डालती हंै। इससे नेताओं की कथनी और करनी में फर्क साफ नजर आता है, जनता भी यह जान लेती है कि इन नेताओं के दिखाने के दांत और खाने के दांत अलग-अलग हंै।
- डॉ. भरत जोशी, सलूंबर
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सामूहिक विवाह बेहतर विकल्प वर्तमान में समाज में खर्चीली शादियों, दहेज, दिखावे का अत्यधिक प्रचलन है। नेताओं व धनाढ्य वर्ग द्वारा की जा रही खर्चीली शादियों का समाज पर नकारात्मक असर हो रहा है। खर्चीली शादियां रोकी जाएं, क्योंकि ऐसी शादियों में भोजन की भी बर्बादी होती है। कई लोग दहेज प्रथा एवं खर्चीली शादियों को ठेंगा दिखाते हुए सादगी पूर्ण रूप से शादी कर अनूठी मिसाल पेश करते हैं। सामूहिक विवाह खर्चीली शादियों का बेहतर विकल्प है।
-डॉ.राजेन्द्र कुमावत, जयपुर
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गलत संदेश
जनप्रतिनिधियों से लोग प्रेरणा लेते हैं। सही नेतृत्व से समाज को नई दिशा मिलती है। यदि समाज सुधारक ही कुरीतियों और फिजूलखर्ची को बढ़ावा देते हैं तो सुधार की उम्मीद धूमिल हो जाती है। आम आदमी का रहनुमा यदि विवाह पर बहुत ज्यादा खर्च करता है, तो समाज में गलत संदेश जाएगा।
-हुकुम सिंह पंवार, इन्दौर, मध्य प्रदेश
Published on:
26 Sept 2023 06:04 pm
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