
प्रो. मनोज सक्सेना
अधिष्ठाता व विभागाध्यक्ष शिक्षा स्कूल, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय
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डॉ. सुमित चौहान
प्राचार्य, अवस्थी शिक्षा महाविद्यालय, धर्मशाला
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यह महत्त्वपूर्ण है कि छात्र-छात्राएं अपने स्मार्टफोन के उपयोग के प्रति सचेत रहें, सीमाएं निर्धारित करें और अपने शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।
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आज की बढ़ती डिजिटल दुनिया में स्मार्टफोन के बिना एक दिन गुजारने की कल्पना कठिन है। हम इनका उपयोग हर चीज के लिए करते हैं - जैसे मौसम की जांच करने से लेकर दोस्तों और परिवार के संपर्क में रहने तक। पर कुछ लोगों के लिए अपने फोन के बिना रहने का विचार अत्यधिक चिंता का कारण बन गया है। इस डर को नोमोफोबिया के नाम से जाना जाता है। यह अपेक्षाकृत नया शब्द है।
नोमोफोबिया शब्द का अर्थ नो-मोबाइल-फोन-फोबिया है। मोबाइल फोन के बिना रहने का यह डर भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर में फैला हुआ है। आज की तेज-तर्रार प्रौद्योगिकी-संचालित दुनिया में हमारे स्मार्टफोन दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं। हम उनका उपयोग संचार और मनोरंजन के साथ उत्पादकता बढ़ाने के लिए कई तरह से करते हैं। पर क्या होता है जब हम अपने फोन के बिना होते हैं? कई भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए फोन के बिना रहने का विचार भय और चिंता की भावना को उत्पन्न करता है जिसका नतीजा है नोमोफोबिया। डिजिटल तकनीक की यह देन एक ऐसी चिंता है जिसका सामना लोग अपने स्मार्टफोन का इस्तेमाल न कर पाने के दौरान करते हैं। फोन में सिग्नल न होना, बैटरी खत्म होने का डर या कुछ समय तक नोटिफिकेशन न मिलने से भी वे चिंतित हो जाते हैं और यह चिंता उनमें विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा करती है। युवा पीढ़ी में यह समस्या आम देखी जा रही है।
नोमोफोबिया के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं, पर सामान्य संकेतों में बार-बार फोन चेक करना, बैटरी कम होने चिड़चिड़ा महसूस करना और जेब में फोन न होते हुए भी फोन के कंपन को महसूस करना शामिल है।
इसके अतिरिक्त नोमोफोबिया छात्रों की नींद के पैटर्न को भी बाधित करता है क्योंकि उन्हें देर रात में भी अपने उपकरणों की लगातार जांच करने की जरूरत महसूस होती है। इससे उनका शैक्षणिक प्रदर्शन और समग्र विकास प्रभावित होता है, क्योंकि हम सामाजिक संपर्क के लिए अपने फोन पर तेजी से निर्भर हो रहे हैं। इस निर्भरता से छात्र-छात्राओं के एकाग्रता के स्तर में भी कमी हो रही है।
नोमोफोबिया से निपटने के लिए शिक्षण संस्थानों को स्मार्टफोन के इस्तेमाल के लिए सख्त नियम बनाने चाहिए। उन्हें छात्रों को स्मार्टफोन के उपयोग के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों के बारे में जागरूक करना चाहिए। जब फोन के उपयोग की बात आती है तो सीमाएं निर्धारित करना और स्वस्थ आदतें स्थापित करना भी महत्त्वपूर्ण है जैसे फोन से ब्रेक लेना, ऐसी गतिविधियों में शामिल होना, जिनमें स्क्रीन शामिल नहीं हो और फोन पर ऐसी ऐप्स या सुविधाओं का उपयोग करना जो स्क्रीन समय को ट्रैक करती हों व उपयोग की सीमा निर्धारित करती हों। इससे आपको यह जानने में मदद मिल सकती है कि आप अपने डिवाइस पर कितना समय बिता रहे है। यह बदलाव लाने में मददगार हो सकता है। स्मार्टफोन ने निस्संदेह हमारे जीवन जीने के तरीके को बदल दिया है, यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि वे सिर्फ उपकरण हैं और वास्तविक मानवीय कनेक्शन का प्रतिस्थापन नहीं हैं। हम अपने मानवीय जीवन व डिजिटल दुनिया में एक स्वस्थ संतुलन बना सकते हैं।
कुल मिलाकर नोमोफोबिया तनाव और चिंता देकर अकेलेपन व अलगाव की भावना को बढ़ा रहा है और शैक्षणिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को बाधित करके विशेष रूप से छात्र-छात्राओं के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। उनके लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वे अपने स्मार्टफोन के उपयोग के प्रति सचेत रहें, सीमाएं निर्धारित करें और अपने शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए उचित कदम उठाएं।
Published on:
14 Jul 2024 09:39 pm
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