व्यंग्य राही की कलम से
महान् कलियुगी डाकू गब्बर सिंह ने हाहाकारी फिल्म 'शोले' में सलमान के अब्बा प्रिंस सलीम का लिखा एक डायलॉग बोला था- जो डर गया वो मर गया। समकालीन भारतीय राजनीति में यह डायलॉग मील के पत्थर की तरह है। नरेन्द्र भाई अपनी पार्टी के किसी 'बुड्ढे' से नहीं 'डरे' तो आज प्रधानमंत्री हैं और राहुल गांधी हमेशा जिम्मेदारी लेने से 'डरते' रहे तो आज ये दिन देख रहे हैं। पर मुद्दा 'डरने' का नहीं, 'मरने' का है। मरना यानी कागजों में 'मर' जाना। आदमी दो तरह मरता है एक 'सचमुच' में, दूसरा 'फाइलों' में। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मारना हो तो सचमुच इस धरती से उठा लेना पर किसी सरकारी बाबू के हाथों फाइलों में मत मार देना।
कसम से यह सिद्ध करना मुश्किल हो जाएगा कि हम 'जिंदा' हैं। हमारी सरकार का करिश्मा देखिए। उसने करीब तीन लाख लोगों को 'मृत' बताकर उनकी पेंशन बंद कर दी जबकि वे बेचारे 'जीवित-मृत' दावा करते घूम रहे हैं कि वे जिंदा हैं, रोटी, पानी, 'ऑक्सीजन' ग्रहण कर रहे हैं, जैसे वे सरकारी बाबू और मंत्री जो जिंदा हैं और सरकारी वेतन और भत्ते उठा रहे हैं। वैसे बेचारी वर्तमान सरकार भी क्या करे। पिछली सरकार ने ऐन चुनावों से पहले पेंशन की रेवड़ी बांटी और उसे उन लोगों ने हड़प लिया जिन्हें पेंशन की जरूरत ही नहीं थी। जो पेंशन के पात्र थे वे 'टापते' रह गए।
अब वर्तमान सरकार क्या कर रही है। वह भी उसी रास्ते पर है यानी जो जीवित और पात्र है उन्हें 'मरा' हुआ बता रही है। एक बात का ख्याल रखना। मरना हो तो सचमुच मर जाना पर सरकारी कागजों में मर गए तो फिर साक्षात् 'देव चित्रगुप्त' भी आकर कहें कि तुम 'जिंदा' हो तो भी उनकी गवाही निरस्त हो जाएगी। सरकारी कागजों में 'मर' कर 'जिंदा' होना एवरेस्ट पर्वत पर चढऩे से भी ज्यादा दुष्कर काम है। जो 'डर' गया वो तो फिर भी 'जी' सकता है पर जो कागजों में 'मर' गया उसका तो बाप भी नहीं 'जी' सकता।