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कुटिल ‘ड्रेगन’

पिछले चार सालों को देखें तो चीन हर साल अपने रक्षा बजट में 7 से 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी करता रहा है। ऐसे में हमें हर पल सावधान रहने की जरूरत है।

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china and india

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भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कौन, यदि यह सवाल किसी भारतीय बच्चे से नींद में उठाकर भी पूछा जाए तो उसका जवाब होगा द्ग पाकिस्तान। और यदि भारत के ताकतवर एवं धूर्त दुश्मन की बात की जाए तो जवाब आएगा द्ग चीन। और यदि दोनों मिल जाएं तो! तब वही होगा जो पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में हो रहा है। भारत और पाकिस्तान की दुश्मनी का यों देखें तो कोई बड़ा कारण नहीं है सिवाय इसके कि पाकिस्तान भारत के ही टुकड़े करके बना। लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद वहां की सरकारों ने भारत से जो दुश्मनी साधी, उसकी सजा दोनों देश आज तक भोग रहे हैं। कोई कम, कोई ज्यादा। सीमाओं की रक्षा करने वाली सेनाओं पर होने वाला खर्च तो दोनों को करना ही पड़ रहा है, लेकिन पाकिस्तान जिस तरह आतंकवाद फैला रहा है, उससे पार पाने के लिए भारत को जो खर्च करना पड़ रहा है, वह हमारी अर्थव्यवस्था के लिए भारी है। इस मामले में पाकिस्तान कहीं नहीं है। उसकी अर्थव्यवस्था चौपट है। बुरी तरह से कर्ज के महासागर में डूबी है। उसके तमाम तरह के खर्च पहले अमरीका उठाता था। अब चीन उठाता है। चीन में चूंकि लोकतंत्र नहीं है, इसलिए वहां शासकों की मनमानी चलती है। फिर चाहे वह माओ त्से तुंग या चाऊ एन लाई हों या फिर शी जिन पिंग। विस्तारवाद चीन की फितरत में है, इसलिए भारत-पाकिस्तान उसकी निगाह में सबसे पहले होते हैं। चूंकि पाकिस्तान की अपनी कोई हैसियत नहीं है, इसलिए चीन ने उसे बहुत आसानी से अपने चंगुल में ले लिया है।

यह समय की ही बात है लेकिन जिस तरह चीन ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में बड़ा पैसा लगाया है और उसकी सुरक्षा के नाम पर वहां अपने सैनिक बिठाए हैं, देर-सबेर वह उस पर काबिज होता लगता है। हमें दबाना उसके लिए आसान नहीं है। 'हिन्दी-चीनी, भाई-भाई' का नारा देकर 1962 में उसने हमें जो धोखा दिया, उससे हमने सबक सीखा है, फिर भी जो विस्तारवाद चीन के खून में है, उससे हमें बहुत सावधान रहने की जरूरत है। मंगलवार को चीन ने अपना जो रक्षा बजट, चीनी संसद में रखा है, उसमें पिछले वर्ष की तुलना में 7.5 प्रतिशत की वृद्धि की है। पिछले चार सालों को देखें तो चीन हर साल अपने रक्षा बजट में 7 से 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी करता रहा है। चीन का रक्षा बजट हमारे रक्षा बजट का तीन गुना है। वह दिखाने को अपनी थल सेना 'पीपुल्स लिबरेशन आर्मी' की संख्या घटा रहा है, पर आज भी वह बीस लाख से ज्यादा है। चीन के समर्थक कहते हैं कि अपना रक्षा बजट पहले वह डबल डिजिट में बढ़ाता था, अब उसने सिंगल डिजिट में कर दिया। यह सच भी हो, तब भी वह मुख्य रूप से है तो भारत के ही खिलाफ। चीन पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका सब की मदद उसी नीयत से करता भी है। वह जिस तरह अपनी नौसेना और वायुसेना को मजबूत कर रहा है, उस पर भी निगाह रखने की जरूरत है।

एक जमाना था जब हमारे पास सोवियत संघ, युगोस्लाविया जैसे मजबूत दोस्त थे। हमारा अपना निर्गुट आंदोलन था। वक्त के साथ वो सब कमजोर पड़े हैं। उधर दुश्मन या 'मुंह में राम-बगल में छुरी' वाले देशों की संख्या बढ़ी है। ऐसे में हमें हर पल सावधान रहने की जरूरत है। चाहे कहीं और कमी कर लें, लेकिन रक्षा बजट पर्याप्त होना चाहिए। हमारी सेना के तीनों अंग आधुनिकतम हथियारों से लैस होने चाहिए। बोफोर्स से लेकर रफाल तक हथियारों की खरीद में, भ्रष्टाचार का जो माहौल हम देश में बनाते हैं, वह रुकना चाहिए। तभी हम कुटिल पड़ोसियों से अपनी रक्षा भरोसे से कर पाएंगे।