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आपकी बातः महिलाओं के पहनावे पर ही क्यों हमेशा सवाल खड़े होते हैं?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

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Patrika Desk

Aug 19, 2022

प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

स्त्री हो या पुरुष, भारतीय संस्कृति के अनुरूप हो पहनावा
वेश-भूषा व्यक्तित्व का आईना होती है। स्त्री हो या पुरुष, शालीन वेश-भूषा सदैव आदर्श होती है। स्त्री-पुरुष समानता के नाम पर व पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से पुरुषों की तुलना में महिलाओं के पहनावे में अधिक बदलाव देखे जा रहे हैं। विपरीत जेंडर की तरफ आकर्षण स्वभाविक है, विचित्र वेश-भूषा, शालीनता से हटकर पहने गए वस्त्र और अधिक आकर्षण के साथ-साथ आलोचना का कारण बन जाते हैं। ऐसे में महिलाओं को पहनावे पर टोका-टोकी एक सवाल के रूप में समझा जाता है, पाश्चात्य संस्कृति से ग्रसित महिलाएं स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर इसे अपना अपमान समझती हैं जो गलत है। निष्कर्षत: यह सत्य है कि महिलाओं के पहनावे पर सवाल खड़े होते हैं किंतु यह भी सौ फीसदी सत्य है कि शालीन वस्त्र स्त्री या पुरुष जो भी पहने किसी पर कोई सवाल खड़ा नहीं होता। अत: सभी स्त्री-पुरुषों को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए, भारतीय संस्कृति के अनुरूप शालीन वस्त्र पहनने चाहिए ताकि वेश-भूषा को लेकर कोई सवाल खड़ा न हो। यह भी सत्य है कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में इससे कमी आएगी।
-आजाद पूरण सिंह राजावत
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पहनावे पर सवाल गलत, मादक पदार्थों का बढ़ता इस्तेमाल जिम्मेदार
बढ़ते अपराध व यौन शोषण, बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए महिलाओं द्वारा उत्तेजित करने वाले कपड़े पहनना, अपने अंगों को दिखाने वाले कपड़े पहनने व महिलाओं के पहनावे को पुरुषों द्वारा जिम्मेदार मानने की बात गले नहीं उतरती तथा महिलाओं पर सवाल उठाना लाजिमी नहीं लगता। बल्कि पुरुषों द्वारा भी उत्तेजित करने वाले कपड़े पहने जाते रहे हैं। मेरी नजर में महिला अपराध बढ़ने, यौन शोषण व बलात्कार की घटनाओं के बढ़ने के लिए शराब, ड्रग्स व मादक वस्तुओं का उपयोग तथा अश्लील साहित्य व पोर्न फिल्मों का बढ़ता चलन जिम्मेदार है।
-शिवजी लाल मीना, जयपुर
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भावना शुद्ध रखनी होगी
महिलाओं के पहनावे पर ही इसलिए सवाल खड़े होते हैं कि हम यह भूल चुके हैं कि भावना को कैसे शुद्ध रखा जा सकता है। किस प्रकार ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए कामुक विचारों से दूर रहा जा सकता है। आज इस चारित्रिक कमजोरी के कारण उकसावे व उत्तेजना में कई माता बहनों के साथ जो पीड़ादायी अपराध घटित हो रहे हैं उनमें किसी प्रकार की कमी कैसे आए । महिलाओं के परिधान को जरूरत ज्यादा तूल दिया जा रहा है।
-गोपाल लाल पंचोली, शाहपुरा, भीलवाड़ा
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संकीर्ण मानसिकता
महिलाओं के पहनावे पर सवाल खड़ा करना दूषित व संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक हैं। मानसिक अवचेतना तथा आध्यात्मिक दृष्टिकोण व सोच के दायरे में कमी का ही नतीजा हैं कि इस प्रकार की बयानबाजी होती हैं। फोकस आचरण, वर्तमान में नारियों की बढ़ती हर क्षेत्रों में महत्ता, उनका कौशल उन्नयन तथा प्रतिस्पर्धा पर होकर उनका सम्मान व मनोबल बढ़ाने पर होना चाहिए।
-संजय माकोड़े, बैतूल
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पसंद के पहनावे का अधिकार
हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और यहां सबको अपने हिसाब से काम करने का अधिकार है। महिलाओं को ये अधिकार है कि वो अपनी पसंद के पहनावे का चयन कर सकें, लेकिन सही-गलत के बीच फर्क समझने के बजाए महिलाएं पहनावे पर की गई टिप्पणी को आत्मसम्मान से जोड़ लेती हैं। उन्हें लगता है कि संकीर्ण मानसिकता से ग्रसित पुरुष उनके आगे बढ़ने से जलते हैं।
-शान मिश्रा, बिलासपुर
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पहनावा ही जिम्मेदार
इस बात में कोई संदेह नहीं कि व्यक्ति के व्यक्तित्व पर पोशाक का प्रभाव अवश्य ही पड़ता है। यदि महिलाएं तंग कपड़े और अंग प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहनेंगी तो उन पर लोगों की कुदृष्टि पड़े बिना नहीं रह सकती। चिंता की बात यह है कि अभिभावक भी अपनी बच्चियों को इस प्रकार की पौशाकों में देखकर खुश होते हैं । ऐसे पहनावे से बचना चाहिए।
-मंजू देवी मोदी, सादुलपुर (चूरु)
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शरीर की शोभा शालीनता से
नारी को हमारे यहां पूजा योग्य माना जाता है। मां बहन और बेटी जैसे पावन रिश्तोंं से जुड़ी स्त्री को संस्कार व सभ्यता की प्रतिमा माना जाता है। ऐसे में यदि महिलाएं बेहूदा पोशाक पहनकर पुरुषों के सामने जाती हैं तो वे लोगों की बुरी नजरों का शिकार होंगी ही। महिलाओं का पहनावा ही अक्सर लोगों की दृष्टि,मन, वह दिलोदिमाग में सभ्य और असभ्यता का विचार उत्पन्न करता है।
-प्रदीप कुमार, जोधपुर
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नजरिया बदलने की जरूरत
हर व्यक्ति का अधिकार है कि उसे क्या पहनना है और क्या खाना है? महिलाओं के पहनावे पर ही सवाल खड़े करना ओछी मानसिकता का परिचायक है! भला हम कैसे दूसरे पर अपना नजरिया थोप सकते है ! ऐसे कुत्सित विचारधारा वाले लोगों को अपनी नजर और नजरिया दोनों बदलने की जरूरत है।
-जितेश कुमार शर्मा, रोशनपुरा बनेडिया, जयपुर
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सारा दोष लड़कियों का ही क्यों?
भारत पुरुष प्रधान देश रहा है । पुरुष कुछ भी कर ले , कोई सवाल खड़े नहीं होते । सारे प्रतिबंध महिलाओं पर ही लगाए है , पुरुष प्रधान समाज में माता - पिता का सिर लड़कियों के कुछ कामों से नीचा हो जाता है। वे ही काम लडक़ों ने किए हों तो इतना असर नहीं पड़ता। परिवार की नाक लड़कियों के कारण कटती है । यही वजह है कि महिलाओं के पहनावे पर हमेशा सवाल खड़े होते है ।
- रणजीत सिंह भाटी, राजाखेड़ी, मंदसौर (म.प्र.)
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आजादी पर चोट
महिलाओं के पहनावे पर सवाल उठाने वालों के मूल में पुरुषवादी अहं कार्य कर रहा है। महिलाओं को वे अपने फैसले स्वयं लेने की आजादी वे देना नही चाहते हैं। स्त्रियों की बराबरी आज भी एक बड़े वर्ग को खटकने वाली सी लगती हैं। बोलने-चलने, आने-जाने, खाने-पीने तक पर वे महिलाओं को अपने इशारों पर नचाना चाहते हैं। महिलाओं के पहनावे पर सवाल उठाना पुरुष एक तरह से अपना जन्म सिद्ध अधिकार मान बैठे हैं।
-छाया कानूनगो, देवास (म.प्र.)