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अहिंसा को ही क्यों बनाया हथियार

सत्य और अहिंसा को आधार बना कर महात्मा गांधी ने आजादी के लिए आंदोलन का जो मार्ग अपनाया, वह समय और परिस्थितियों के अनुरूप उचित था। उस काल में दूसरा कोई विकल्प सफलता दिलवाने में अक्षम ही सिद्ध होता। कई देशों को महात्मा गांधी की प्रेरणा से अंग्रेजों से स्वतंत्र होने के लिए सत्य व अहिंसा का नया हथियार मिल गया। जिस अंग्रेजी राज का सूर्यास्त नहीं होता था, उसके अहंकार का नाश सत्य और अहिंसा से हो गया।

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Patrika Desk

Jan 30, 2023

अहिंसा को ही क्यों बनाया हथियार

अहिंसा को ही क्यों बनाया हथियार

एन.एम. सिंघवी
प्रशासनिक सुधार मानव संसाधन विकास व जनशक्ति आयोजना समिति, राजस्थान के अध्यक्ष रहे हैं

महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने वाले क्रांतिकारी थे। स्वतंत्रता के लिए वे हर आंदोलन शांति की राह पर चलाते रहे। इस पथ पर चलने से पहले उन्होंने अनेक प्रयोग भी किए। प्रयोगों की सफलता के उपरांत ही वे मार्ग का चुनाव करते थे। जो भी प्रयोग बापू करते उस प्रयोग की सफलता या विफलता पर अपने विचार नि:संकोच प्रकट भी करते। जिस पथ को बापू चुनते, उसमें यदि हिंसा या अशांति का भाव उत्पन्न हो जाता, तब वे नि:संकोच अपना आंदोलन वापस ले लेते। इसी व्यवस्था को अपनाकर उन्होंने देश में आंदोलन किए। वे अहिंसा और सत्य के बल पर सम्पूर्ण भारत की जनता के दिल में स्वतंत्रता की अलख जगाने में सफल हुए। जब भी बापू को अंग्रेज जेल में ले जाते, तब पूरे देश जनता सड़कों पर आ जाती थी। महात्मा गांधी के इस नैतिक बल से ही अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह भी सच है कि अंग्रेजों ने देश को बंटवारे का जख्म भी दे दिया।
स्वतंत्रता आंदोलन की रूपरेखा बापू ने देश की यात्रा के साथ तैयार की। इन यात्राओं से बापू को न केवल समाज व्यवस्था समझ में आई, अपितु वे देश और अंग्रेजों की अर्थव्यवस्था को भी समझ पाए। इसी समझ से अंग्रेजों की अर्थव्यवस्था को चौपट करने के लिए स्वदेशी उत्पादन व उपभोग का पाठ पढ़ाया। छुआछूत के शाप से अभिशप्त समाज को इस बुराई से मुक्त कराने के लिए भी सत्य और अहिंसा का मार्ग ही सहज मार्ग था। गरीब की गरीबी को बापू ने देशाटन से समझा और अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के उत्थान के प्रयास में जुट गए।
स्वतंत्रता संग्राम पर चर्चा करना और गांधी को गलत ठहराना आजकल फैशन बन गया है। गहनता और सच्चाई से दूर रहकर लोग इस चर्चा से जुड़े रहते हैं। सवाल यह है कि बापू ने सत्य और अहिंसा का मार्ग ही क्यों चुना? क्या आजादी पाने का कोई और दूसरा रास्ता संभव था? कुछ प्रश्न हैं, जिनका उत्तर तलाशने हुए हम स्वतंत्रता आंदोलन के मार्ग के चुनाव तक पहुंच सकते हैं। हमारे लिए क्या युद्ध मार्ग अपनाना संभव था? हमारे अपनों ने ही धोखा दिया था। जैसे कि 1757 में प्लासी के युद्ध के मैदान में मीर जाफर ने अंग्रेजों के हाथों बिक कर सिराजुद्दौला को धोखा दे दिया और अंग्रेजों ने पांव पसारने शुरू कर दिए। हम 1857 में सशस्त्र क्रांति कर चुके थे, तब हमारे पास कुछ हथियार भी थे, पर हम सफल नहीं हो पाए। हमारे पूर्वज यदि युद्ध का मार्ग अपनाते तो क्या हमारे पास हथियार थे या हथियारों के निर्माण के कारखाने थे? यदि नहीं थे, तो क्या हमारे पास हथियार क्रय करने के लिए धन था? यदि हमारे पास धन भी होता तो क्या अंग्रेज हमें हथियार लाने देते? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है तो फिर हम युद्ध किस प्रकार लड़ते? क्या अंग्रेज सेना से देशी कट्टों से युद्ध लड़ा जाता और हम जीत जाते? अंग्रेजी राज पूरी दुनिया में था और हमारे यहां जो भी छोटे-मोटे गोला बारूद के कारखाने थे, वे सब अंगे्रज सरकार के अधीन थे। पूरी दुनिया में जहां भी अंग्रेजी राज था, वहां से हथियार मिलना मुश्किल था। ऐसे हालत में हमें युद्ध के अलावा कोई विकल्प तलाशना था। बापू ने सत्य और अहिंसा के बल पर न केवल भारत को स्वतंत्र करवाया, बल्कि अंग्रेजों को भारत छोड़ कर भी जाना पड़ा।
भारत की स्वतंत्रता के साथ अंग्रेज भी भारत छोड़ कर चले गए, पर कई देशों में ऐसा नहीं हुआ। उदाहरणत: दक्षिण अफ्रीका में आज भी अंग्रेज बहुत बड़ी संख्या में निवास कर रहे हैं और वहां के प्रशासन में भी भाग ले रहे हंै। सत्य और अहिंसा को आधार बना कर महात्मा गांधी ने आजादी के लिए आंदोलन का जो मार्ग अपनाया, वह समय और परिस्थितियों के अनुरूप उचित था। उस काल में दूसरा कोई विकल्प सफलता दिलवाने में अक्षम ही सिद्ध होता। कई देशों को महात्मा गांधी की प्रेरणा से अंग्रेजों से स्वतंत्र होने के लिए सत्य व अहिंसा का नया हथियार मिल गया। जिस अंग्रेजी राज का सूर्यास्त नहीं होता था, उसके अहंकार का नाश सत्य और अहिंसा से हो गया।