
प्रो. हरबंश दीक्षित
अधिष्ठाता, विधि संकाय,
तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद
उच्चतम न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण पहल करते हुए कुछ मामलों में अपनी कार्यवाही का सीधा-प्रसारण शुरू कर दिया है। पारदर्शिता लोकशाही की सबसे बड़ी ताकत होती है। सुप्रीम कोर्ट में भी इसको लेकर लंबे समय से मंथन चल रहा था। ठीक चार साल पहले 27 सितम्बर 2018 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा तथा न्यायाधीश ए.एम. खानविलकर एवं न्यायाधीश डी.वाइ. चन्द्रचूड़ की पीठ ने अपने निर्णय में मुकदमों की सुनवाई के सीधे प्रसारण पर सिद्धान्तत: सहमति जताते हुए इसका मार्ग प्रशस्त किया था। प्रयोग के तौर पर कुछ महत्त्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के सीधे प्रसारण का निर्णय देते हुए तकनीकी समिति को इस मामले में नियमों का मसविदा बनाने का निर्देश दिया था। तकनीकी समिति का सुझाव था कि अदालती कार्यवाही का तुरंत सीधा प्रसारण करने की बजाय उसे दस मिनट बाद शुरू किया जाए, सभी मुकदमों का सीधा प्रसारण हो और यू-ट्यूब सहित किसी भी प्लेटफार्म को चुनने का अधिकार अदालत के विवेक पर हो। गुजरात तथा कर्नाटक उच्च न्यायालयों सहित कुछ जगहों पर तो पहले से ही इस पर अमल कर लिया गया था और वहां पर कुछ अदालतों में मुकदमों की सुनवाई का सीधा प्रसारण शुरू हो गया था, किन्तु सुप्रीम कोर्ट में इसकी शुरुआत 27 सितम्बर 2022 को हुई।
दुनिया की दूसरी अदालतें भी अलग-अलग तरीकों को अपनाकर अपनी कार्यवाही का प्रसारण शुरू कर चुकी हैं। जैसे अमरीका की सर्वोच्च अदालत सप्ताह के अंत में अपनी कार्यवाही की वीडियो रेकॉर्डिंग की बजाय ऑडियो रेकॉर्डिंग अपलोडकर देती है। ब्राजील में फेडरल सुप्रीम कोर्ट अपनी कार्यवाही का सीधा प्रसारण करता है। ब्रिटेन और कनाडा की सर्वोच्च अदालतें अपनी वेबसाइट पर सभी मुकदमों की सुनवाई का सीधा प्रसारण करती हैं। कीनिया की सर्वोच्च अदालत ने अपनी कार्यवाही का सीधा प्रसारण करने के लिए टी.वी. समाचार चैनलों का माध्यम चुना है, जबकि दक्षिण अफ्रीका की सर्वोच्च अदालत यू-ट्यूब के माध्यम से कार्यवाही का सीधा प्रसारण करती है। अभी जर्मनी और फ्रांस की अदालतों ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।
अन्य देशों के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए अपने यहां व्यापक दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। जैसे अदालतों को सीधे प्रसारण के लिए प्लेटफार्म चुनने पर कोई पाबन्दी नहीं है, किंतु कुछ संवेदनशील मुद्दों पर होने वाली सुनवाई को सीधे प्रसारण से अलग रखा गया है। इसी तरह इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए यह व्यवस्था भी है कि अदालत की अनुमति के बगैर उसका संपादन या उसे साझा करने पर प्रतिबंध है। मीडिया को सीधा-प्रसारण का अधिकार है तथा शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए भी उसके उपयोग पर कोई पाबंदी नहीं है।
अदालतों की कार्यवाही के सीधे प्रसारण के दूरगामी सकारात्मक असर होंगे। हमारे अधिवक्तागणों के सम्बन्ध में कई बार मुवक्किलों और दूसरे लोगों की शिकायत रहती है कि वे उचित तैयारी के बगैर ही अदालत में आ जाते हैं और यह भी कि उनका स्तर दिन पर दिन गिरता जा रहा है। सीधे प्रसारण से लोगों को वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी और अधिवक्ताओं पर भी अपनी गुणवत्ता को ऊंचा उठाने का दबाव रहेगा। इस तरह प्रचलित भ्रांतियों को दूर करने में तो मदद मिलेगी ही, इसके साथ ही न्याय और न्यायालय की गुणवत्ता को और भी बेहतर करने में मदद मिलेगी। देशभर में कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए अपनी बड़ी अदालतों की कार्यवाही देखना एक सपने जैसा होता है। सुरक्षा और अन्य कारणों से अब तो वहां प्रवेश के नियम भी बहुत कठोर हो गए हैं। हमारे विद्यार्थी ही भविष्य के न्यायाधीश, अधिवक्ता तथा विधि निर्माता और समाज-सेवी हैं। अदालती कार्यवाही के सीधे प्रसारण से वे अपनी शिक्षण-संस्थाओं से ही रूबरू हो पाएंगे और यह उनके स्तर को सुधारने और व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा।
वर्ष 1985 के टैगोर लॉ लेक्चर में 'ज्यूडिशियरी एंड ज्यूडिशियल प्रोसेस' के व्याख्यान के दौरान न्यायाधीश एच.आर. खन्ना ने कहा था, 'आम आदमी के मन में व्याप्त भरोसा और उनका अदालत के लिए सम्मान ही न्यायपालिका की सबसे बड़ी निधि और सबसे धारदार हथियार है।' जनविश्वास के महत्त्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया था कि अदालतों को अपनी सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता के माध्यम से इस लक्ष्य को हासिल करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दिशा में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पहल की है, जो आगे चलकर दूसरे जरूरी सुधारों का भी मार्ग प्रशस्त करेगी
Updated on:
11 Oct 2022 08:48 pm
Published on:
11 Oct 2022 07:08 pm
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