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क्या नेता, ठेकेदार और इंजीनियर बदल जाएंगे?

पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी के जन्मशती वर्ष के मौके पर उनके रचना संसार से जुड़ी साप्ताहिक कड़ियों की शुरुआत की गई है। इनमें उनके अग्रलेख, यात्रा वृत्तांत, वेद विज्ञान से जुड़ी जानकारी और काव्य रचनाओं के चुने हुए अंश हर सप्ताह पाठकों तक पहुंचाए जा रहे हैं।

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मानसून मेहरबान हो तो सबको अच्छा लगता है। वर्षा, जब बाढ़ की विनाशलीला का रूप लेने लगे तो सबसे पहले विकास कार्यों की पोल खुलने लगती है। इन दिनों राजस्थान व देश के दूसरे कई हिस्सों में अतिवृष्टि का दौर देखने को मिल रहा है तो कई जगह भयावह नतीजे भी सामने आ रहे हैं। जयपुर में जुलाई 1981 में आई विनाशकारी बाढ़ के दौर में 44 साल पहले श्रद्धेय कुलिश जी के आलेख में उठाए गए वे सवाल जिनका जवाब आज भी हुक्मरानों के पास नहीं है। आलेख के प्रमुख अंश:

वर्षा के बाद बड़े- बड़े पुल जो राज्य में बने हुए हैं वे क्यों ढह जाते हैं? क्या यह माना जाए कि हमारे पास इंजीनियरी विद्या का अभाव है? क्या यह माना जाए कि हमारे चरित्र में इतनी गिरावट आ गई है कि समाज के बजाय केवल व्यक्तिगत हितों के शिकार हो गए। यह ऐसा मसला है जिस पर गंभीर विचार और आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। आजादी के बाद निर्माण के नाम पर सडक़ें बनी, पुल बने, बांध और नहरें बनी लेकिन मौसम का झटका पड़ते ही वे डोल क्यों जाते हैं? और तो और, राष्ट्रीय पैमाने पर बनी हुई कई परियोजनाएं भी वैसी ही गति को प्राप्त हुई जैसे बरसात के कीड़ों की होती है। जयपुर की बाढ़ में ऐसी विनाशलीला हुई जिसकी कहानियां पीढिय़ों तक कही जाएगी, जैसे छप्पन के अकाल के बारे में कहा जाता है। किन्तु ये सभी कहानियां नए जयपुर में हुए विकास के बारे में होगी। हवामहल का तो कंगूरा भी नहीं टूटा और ओटीएस का विशाल भवन भूमिसात हो गया। पानी को बहने का रास्ता ही नहीं मिला। गंदे नाले पर बने हुए सभी पुल ढह गए, सडक़ें कट गईं, मकानों के तहखानों में पानी भर गया और सडक़ें मिट्टी से पट गईं।
जो ध्वंस हुआ वह दोषपूर्ण रचना के कारण हुआ। क्या सरकार में वास्तुकला और नगर निर्माण विद्या के जानकार नहीं थे? क्या सरकार ने ऐसी कोई तजबीज की जिसमें जरूरतमंद परिवार रात गुजारने के लिए सलीके के साथ अपना घर बसा ले? क्या सरकार ने आवास की जरूरत को और आदमी की बसने की मजबूरी को कभी महसूस किया? यह आवश्यक है कि हम यह सोचें कि इस विनाश की पुनरावृत्ति को किस तरह से रोक लिया जाएगा? क्या भविष्य में हमारे नेता, ठेकेदार और इंजीनियर बदल जाएंगे? क्या हमारी आवास की जरूरत बदल जाएगी? क्या चंदे, चिट्ठे, रिश्वत, मुनाफाखोरी, विद्याविहीनता और चारित्रिक पतन पर पाबंदी लग जाएगी? यह एक राष्ट्रीय धरातल पर जांच का विषय है कि हमारी आजादी और विकास के दौर को किसने मोड़ दिया और उसके प्रसाद को कौन चाट गया? और, क्या गारंटी है कि वह अब नहीं चाटेगा?

हाथ मलने को मिट्टी दे गया

तीन दिन में लगातार तैंतीस इंच वर्षा के बावजूद चारदीवारी वाले जयपुर में ध्वंसलीला देखने में नहीं आई परन्तु नई बस्तियां तो इन्द्रजाल के करिश्मे की तरह बह गई। देखते-देखते ही जयपुर के बाहर का तो भूगोल ही बदल गया। कहने का अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि पुराना शहर कभी पानी के प्रहार से नहीं ढह सकता परन्तु यह कि तुलनात्मक दृष्टि से वह टिकाऊ साबित हुआ और आजादी के बाद बसा हुआ शहर छिन्न-भिन्न हो गया। कहने का अभिप्राय यह भी नहीं लगाया जाए कि मैं आजादी को कोस रहा हूं, बल्कि मेरी लेखनी की खोज यह है कि आजादी से मिले हुए स्वर्ण अवसर के स्वर्ण को कौन चाट गया और हमारे हाथ मलने के लिए मिट्टी दे गया। आखिर यह हुआ क्या और क्यों हुआ? आजादी के बाद के वर्षों में जो कुछ भी निर्माण के नाम पर हुआ वह सभी झटका खाते- हिलते नजर आए।
(28 जुलाई 1981 को ‘आजादी का प्रसाद कौन चाट गया ’ आलेख के अंश)

जागते रहो!

स रकारी जमीन खाली पड़ी रहे और बेघरबार वाले गलत-सलत तरीके से मकान बनवाते फिरें। क्यों? क्या सरकार का काम जमीन का बंदोबस्त करके उसका जनता के हित में उपयोग करना नहीं है? क्या वह गुनहगार नहीं है कि वह जमीन का बंदोबस्त करने के बजाए मालिक बनी हुई है और मनमाने ढंग का बर्ताव कर रही है। जब कोई आवाज उठाता है तो सीधा सा जवाब मिलता है कि यह तो बरसों से होता आ रहा है। वही भाषा, वही शैली, वही भ्रष्ट आचरण, वही ढर्रा। कुछ भी तो नहीं बदला। लोकतंत्र की यही सतत प्रक्रिया है। जागते रहो!
(कुलिश जी के आलेखों पर आधारित पुस्तक ‘दृष्टिकोण’ से)