
indian girl in kitchen
- प्रो. पद्मिनी स्वामिनाथन
हमारी संस्कृति में बच्चों व बुजुर्गों की जरूरतों का ध्यान रखना, उनकी देखभाल करना उत्तरदायित्व में मानते हंै। उत्तरदायित्व के निर्वहन में स्नेह और ममता बड़ी भूमिका निभाते हैं।
देश में घरेलू कामकाज करने वाली महिलाएं जिन्हें इस काम के लिए तनख्वाह मिलती है, उनकी आय को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शामिल किया जाता है। जो महिलाएं अपने ही घर में परिवार के लिए ऐसा काम करती हैं, जिसे कोई अन्य व्यक्ति करे तो उसका भुगतान भी करना पड़े, उसे जीडीपी में शामिल नहीं किया जाता। उदाहरण के तौर पर इस तरह के कामों में बच्चों और बजुर्गों की देखभाल विशेषतौर पर शामिल की जाती है।
यदि इस काम के लिए आया को रखा जाए तो इसके लिए पर्याप्त वेतन देना पड़ेगा। लेकिन, भारतीय समाज में आमतौर पर इसे महिलाओं के लिए मानकर छोड़ दिया जाता है। महिलाएं भी इस काम के लिए कोई पैसा नहीं मांगती जो बिल्कुल सही भी है क्योंकि हमारी संस्कृति में बच्चों और बुजुर्गों की जरूरतों का ध्यान रखना उत्तरदायित्व में ही शामिल होता है। उत्तरदायित्व के निर्वहन में स्नेह बड़ी भूमिका निभाता है। बुजुर्गों के प्रति स्नेह और बच्चों के प्रति ममता का मूल्यांकन ना ही किया जा सकता है और ना ही इसे किया जाना चाहिए।
ऐसा करना हमारी संस्कृति और महिलाओं का ही अपमान कहा जाएगा। इसके साथ ही मेरा मानना है कि परिवार के लिए घरेलू कामकाज करने वाली महिलाओं के काम में परिवार के अन्य सदस्यों को हाथ बंटाना चाहिए। महिलाएं भोजन पकाएं, घर की साफ-सफाई का ध्यान रखें तो उसमें हाथ बंटाना ही चाहिए। देश में घरेलू कामकाज को लेकर आधारभूत सुविधाओं का अभाव जबर्दस्त है तो उसे पूरा करने की कोशिश होनी चाहिए।
कई बार समाज में मानकर चला जाता है कि महिलाएं परिवार के लिए घरेलू कामकाज करती हैं तो असुविधाओं को झेलना भी उस कामकाज के दायित्व में ही शामिल है। उनके काम को लेकर इस तरह की सोच बिल्कुल गलत है। उदाहरण के तौर पर घर से दूर जाकर पानी भरकर लाना होता है तो घर में पानी का कनेक्शन ले और नल लगवाएं। चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी लेने दूर जाना पड़ता है तो रसोई गैस उपलब्ध करवानी चाहिए।
परिवार में ऐसे बहुत से काम होते हैं जो बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल से अलग परिवार के खर्च को बचाते हैं। उदाहरण के तौर पर किचन गार्डनिंग परिवार के खर्च में बचत करने वाला काम है। इनका परोक्ष मूल्य हो सकता है। इस तरह के काम परिवार को परोक्ष तौर पर आर्थिक सहायता देते हैं, उन्हें जरूर सकल घरेलू उत्पाद में शामिल किया जा सकता है। हालांकि कुछ महिलाएं जो परिवार में प्रत्यक्ष आर्थिक सहयोग देती हैं, और उनकी आय जीडीपी में होती है। यदि वे घरेलू कामकाज करती हैं तो उनके संस्थानों को उनके प्रति संवेदनशील होना चाहिए। हमारे यहां ऐसा कम देखने को मिलता है।

Published on:
19 Nov 2017 01:29 pm
