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स्त्री

पुरुष और नारी दोनों एक हैं। ब्रह्म, सृष्टि में अकेला है। वही स्वयं की माया बनकर सृष्टि की रचना करता है। माया सोम अवस्था का रूप है। अग्नि में सदा सोम आहुत होकर गौण हो जाता है। इसी यज्ञ से सृष्टि विस्तार चलता रहता है।

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Gulab Kothari

Mar 08, 2021

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- गुलाब कोठारी

शास्त्र कहते हैं-'प्रकृति और पुरुष' मिलकर सृष्टि का संचालन करते हैं। इसमें भी राम से पहले सीता और महेश के पहले उमा रहती है। दोनों में से कोई भी अकेला सृष्टि नहीं कर सकता। 'यथाण्डे तथा पिण्डे' के अनुसार हमारा जीवन और ब्रह्माण्ड एक सिद्धान्त पर कार्य करते हैं। स्थूल रूप में पुरुष (नर) और नारी ही प्रकृति रूप हैं।

पुरुष और नारी दोनों एक हैं। ब्रह्म, सृष्टि में अकेला है। वही स्वयं की माया बनकर सृष्टि की रचना करता है। माया सोम अवस्था का रूप है। अग्नि में सदा सोम आहुत होकर गौण हो जाता है। इसी यज्ञ से सृष्टि विस्तार चलता रहता है। घर में कन्या या पुत्री का होना भी विचार और भावनाओं को प्रभावित करता है। नारी के तीन स्वरूप है मां- शक्ति-माया। मां सात्विक भाव है और शक्ति रजस है तथा माया भाव तमस है। आज मातृत्व की शिक्षा तो मां भी नहीं देती। मातृत्व के प्रति आकर्षण भी घट रहा है।

अद्र्धनारीश्वर की अवधारणा के अनुरूप स्त्री और पुरुष दोनों में ही दोनों के गुण व्याप्त हैं। जिन गुणों का अधिक पोषण होता है, वे अधिक परिलक्षित होते हैं। आज इस अद्र्धनारीश्वर सिद्धान्त पर किसको विश्वास रह गया है? सच तो यह है कि शरीर को स्त्री-पुरुष मान बैठे। आत्म-स्वरूप पूर्णरूपेण विस्मृत हो गया। शास्त्र कहते हैं कि शरीर मेरा है, मैं नहीं हूं। शिक्षा कहती है कि 'जीओ शरीर के लिए।' इसका कारण यह है कि हम जीवन को खण्ड-खण्ड करके देखते हैं। कैसा विरोधाभास? जीवन दो साधनों के सहारे चलने लगता है। एक शरीर और दूसरा बुद्धि। शरीर का अर्थ होता है, भौतिक सुख और बुद्धि का अर्थ है-अहंकार। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के सामने समर्पण नहीं करना चाहेगा। घर के कामकाज में पति न बोले, जीविकोपार्जन में पत्नी न बोले (हस्तक्षेप न करे) यही समर्पण का रूप होता है।

स्त्री स्वरूप में नारी रूप पत्नी भी है और मां भी। दोनों के अलग-अलग व्यक्तित्व होते हैं। पुरुष में पति और पिता के रूप में इतना भेद नहीं होता। वह अधिकार बनाए रखने का प्रयास अवश्य करता है किन्तु कब यह उसके हाथ से निकलकर पत्नी के हाथ में चला जाता है, पता ही नहीं चलता। स्त्री में ही यह क्षमता है कि वह विरोधाभासी भूमिका पूरी उम्र निभा सकती है। सृष्टि क्रम के विकास से यह स्पष्ट हो जाता है कि पुरुष जीवन का सारा क्रम स्त्री के हाथ में ही होता है। स्त्री, चाहे जो स्वरूप दे सकती है पुरुष को। संतान क्रम में मां शायद स्त्री ही नहीं होती। वह प्रकृति स्वरूपा साक्षात् मायाभाव में होती है। मीठी से मीठी, कठोर से कठोरतम।

हमने एक शब्द सुन रखा है-पे्रम। साहित्य, सिनेमा, व्यवहार सर्वत्र इसका दुरुपयोग देखा जा सकता है। वास्तव में यह कई शब्दों का संगम है। इसका अभ्यास अत्यन्त कठिन भी है। बड़ों के प्रति पे्रम को श्रद्धा कहते हैं। यह भी एक कठिन मार्ग है-जैसे जल का ऊपर चढऩा। छोटों के प्रति प्रेम को वात्सल्य कहा जाता है। जहां दोनों का बराबर का सम्बन्ध है, मित्रवत् है, उनके प्रेम का नाम स्नेह है। जड़ पदार्थों के प्रति प्रेम को 'कामना' या काम कहा जाता है। इन चारों भावों का संगम, जहां सारे भाव मिलते हैं, उस प्रेम को रति कहते हैं। इसके दो ही उदाहरण हैं-देवता के साथ तथा जीवन साथी के साथ (दाम्पत्य रति)। इसी कारण दाम्पत्य भाव को दो आत्माओं का मिलन कहा गया है।

स्त्री जीवन का आधार कामना है। आज जो जीवन के नए रूप सामने आ रहे हैं वहां स्त्री की कामना की व्यापकता भी बढ़ी है। स्त्री ने एक आक्रामक रुख धारण कर लिया है। वह भी पुरुष की तरह ही जीना चाहती है। स्त्री जीवन के बंधन उसे स्वीकार्य नहीं। व्यवहार में भी भावना का स्थान बुद्धि लेती जा रही है। कामना की यह मार पश्चिम देशों में स्त्रियों को जिस निष्ठुरता से झेलनी पड़ रही है, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

आज व्यक्ति, केवल शरीर के लिए जीने लगा है। विश्व सुखों से भरा है लेकिन शांति उजड़ गई है। स्त्री के पुरुष भाव के असंयत विकास से अशांत और सुखों के पीछे भागने वाली पीढ़ी पैदा हो रही है। शिक्षा-विज्ञान-मीडिया, आग में घी का काम कर रहे हैं। लोक संस्कृति लुटती जा रही है और भोग संस्कृति ने मानव समाज को ही भोग की वस्तु बना दिया है। दाम्पत्य भाव भी शरीर के आगे नहीं जाता। जीवन भर दोनों गृहस्थाश्रम में ही जीते हैं। जीवन का लक्ष्य मात्र भोग-शारीरिक सुख-रह जाता है। आज की नारी पति से भिन्न पहचान और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही है। इसमें अनेक प्रश्न अपना उत्तर मांगते हैं। घर से बाहर स्वयं अपनी सुरक्षा में समर्थ नहीं है। सृष्टि में देवता एक चौथाई तथा असुर तीन चौथाई होते हैं। हर बार देवता ही पराजित होते हैं। वे ही असुर शक्ति से हारते हैं। स्त्री स्वयं को पति की शक्ति बनाने को तैयार क्यों नहीं है?

सन् 1984 में जब मैं पहली बार अमरीका गया, तब वहां के एक समाचार-पत्र 'मोनरो-टाइम्स' के कार्यालय गया। सम्पादक सहित अधिकांश कर्मी महिलाएं थीं। अमरीका में उस समय 'वुमन्स लिब'-नारी स्वतंत्रता-का मुद्दा अपने चरम पर था। मेरा प्रश्न था कि हम दोनों को अलग क्यों मानते हैं? स्त्री पति के अलावा किसी अन्य पुरुष से सुरक्षा मांग रही है। क्या यह संभव है? क्या इससे पति को भी नए-नए साथी बनाने का मार्ग नहीं खुल जाएगा? सन्तान के संस्कारों का, भावी समाज के निर्माण का दायित्व कौन उठाएगा? मैं अकेला, चारों ओर से घिरा था। लगभग पौन घण्टे बहस चली होगी। अन्त में सम्पादिका जी ने स्वीकारा कि बात तो आपकी ही सही है। हमें भी नहीं मालूम ये झण्डा उठाने वाली महिलाएं कौन हैं? बहुत लम्बा नहीं चलेगा यह सब। अगले दिन अखबार में बड़े चित्र के साथ समाचार भी छापा।

शिक्षित महिला को, कामकाजी महिला को 'समर्पण' शब्द किसी अपशब्द जैसा लगता है। वुमन्स लिब के मूल में भी यही अवधारणा रही है। इकाई की पूर्णता स्त्री-पुरुष के युगल में निहित हैं। न तो अकेली स्त्री में और न अकेले पुरुष में यह पूर्णता है। वुमन्स लिब जैसे अभियानों ने प्रकृति के इस सिद्धांत को बड़ी चुनौती दे डाली है। स्त्रियों ने पुरुषों की भूमिका पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया तो स्त्रैण भाव ही संस्कृति से तिरोहित हो गया। वे पुरुषों की तरह जीने लगीं। टकराव बढ़ा। घर बिखरे और अहंकार का ताण्डव दुनिया ने देखा।

विकसित देशों में कानून भी व्यक्ति-प्रधान ही बन रहे हैं। वहां न समाज की प्रधानता रहती है, न परिवार की। आप पुन: आदि-मानव की तरह कंकरीट के जंगल में भटकते रहो। आप किसी को अपने साथ बांधना चाहते हो तो आपको बंधने की तैयारी भी दिखानी पड़ेगी। अपने प्राकृतिक स्वरूप को छोडऩा ही आत्मा को विस्मृत कर देना है। उसका व्यक्तित्व-स्त्री हो या पुरुष-उसी दिन ध्वस्त हो जाता है। हमें उनके जीवन का-निजी जीवन का-भी अध्ययन करना चाहिए। क्या उनका जीवन सुख प्राप्ति के लिए नकल करने जैसा है। अथवा, क्या हम उनकी तरह जीवन जीने को तैयार हैं? आज क्या हो रहा है-हमें यह भी चाहिए, वो भी चाहिए। दो घोड़ों की सवारी उम्रभर संभव नहीं है।

भारत में कहते हैं-'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।' आज भी यह सही दिखता है। पश्चिम की नकल और शिक्षा ने नारी को भोग की वस्तु बना दिया। वह भी उसी रूप में आ गई। व्यक्ति परिवेश से बनता-बिगड़ता है। वरना, स्त्री द्वारा तैयार किया गया लड़का, संस्कारित होकर, किसी स्त्री से अभद्र व्यवहार कर सकता है? स्त्री की यही वह भूमिका है जो देश का निर्माण करती है। यह शक्ति प्रकृति ने पुरुष को नहीं दी। पुरुष भी स्त्री के गर्भ में नौ माह बाद शिक्षा ग्रहण करता है। स्त्री की इस भूमिका के अभाव में ही पृथ्वी पर ताण्डव दिखाई दे रहा है। स्त्री-पुरुष का भविष्य कोई बाहर से आकर नहीं संवारेगा।

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