
लैंगिक समानता से भी जुड़ा है महिला शिक्षा का मुद्दा
हेमा स्वामीनाथन, प्रोफेसर, सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी, आइआइएम बैंगलोर
बालिका शिक्षा में निवेश किसी भी देश के लिए पहली नीतिगत प्राथमिकता होनी चाहिए। खास तौर पर, भारत जैसे देश में, जहां युवा जनसंख्या अधिक है। बालिका शिक्षा कई मायनों में बहुत सी समस्याओं के लिए एक सटीक समाधान है। शिक्षा से युवतियों में सशक्तीकरण की भावना पनपती है, उन्हें बेहतर अवसर मिलते हैं व आत्मविश्वास बढ़ता है। बालिका शिक्षा के बहुत से फायदे भी हैं। अक्सर जटिल सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानदंड शिक्षा तक उनकी पहुंच को सीमित करते हैं। संभवत: कम आय एवं पितृसत्तात्मक अवधारणा वाले समाज में पुत्र को तरजीह और पुत्रियों को पराया धन के रूप में देखना इसका कारण है। ऐसे में वे नीतिगत कदम जो उक्त वास्तविकताओं से सामंजस्य नहीं बिठा पाते, अक्सर पूरी तरह सफल भी नहीं हो पाते। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कार्यक्रम मुख्यत: संसाधनों और आधारभूत ढांचे को लक्ष्य कर बनाए जाते हैं, जबकि साक्ष्य बताते हैं कि लैंगिक मानदंडों को परिवर्तित करने और वंचित वर्ग के लिए लक्षित कार्यक्रमों के सफल होने की संभावनाएं व्यापक हैं।
भारत सरकार ने 1989 में महिला समाख्या (एमएस) नामक एक ऐसा ही अद्वितीय और दूरदर्शी कार्यक्रम शुरू किया था। इसके माध्यम से शिक्षा में लैंगिक असमानता को दूर करने का प्रयास किया गया। वंचित वर्ग की महिलाओं को अपने जीवन की अवधारणा को पुन: परिभाषित करने के लिए सुरक्षित माहौल दिया गया। एमएस कार्यक्रम ने पारम्परिक प्रारूप से आगे बढ़ कर स्थापित किया कि महिला शिक्षा के लिए महिला सशक्तीकरण आवश्यक है। एमएस कार्यक्रम की खासियत यह थी कि यह स्थानीय संगठनों में लागू किया गया, जहां महिला समूहों को उनकी चिंताओं को लेकर आवाज उठाने, एजेंडा तय करने, रणनीतियां बनाने व स्थानीय सामूहिक कार्यवाही के जरिये दमनकारी ताकतों को चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
एमएस का बालिका शिक्षा और लड़कियों की शादी सही उम्र में करने पर संकलित प्रभाव पड़ा है। काफी कम तकरीबन 60-70 करोड़ रुपए के सालाना बजट के साथ एमएस वित्तीय लिहाज से भी सफल योजना रही है। दुर्भाग्यवश, भारत सरकार ने ढाई दशक बाद एमएस को एक बड़े स्तर के सरकारी कार्यक्रम राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) का ही हिस्सा बना दिया। एनआरएलएम चूंकि आजीविका और वित्तीय सेवा पर केंद्रित है, इसलिए इसमें एमएस की तुलना में महिलाओं के लिए संभावनाएं कम हैं। यह सांगठनिक रूप से कम सक्रिय है और स्थानीय स्तर पर इसकी वैसी पहुंच भी नहीं है। महिला सशक्तीकरण अभी दूर की कौड़ी है, ऐसे में सरकार एमएस को खत्म क्यों करेगी, समझ से परे है। रोचक तथ्य यह है कि केरल, कर्नाटक, गुजरात ने राज्य स्तर पर योजना को बरकरार रखा है।
हमारे समाज का पितृसत्तात्मक स्वरूप हाल के वर्षों में मुखर होकर सामने आया है। बढ़ती असमानता और सार्थक रोजगार के कुछ ही अवसर के साथ पितृसत्तात्मक रवैया पुरुषों को महिलाओं पर नियंत्रण और अधिकार जताने का मिथ्या आभास करवाता है। अब जरूरत इस बात की है कि पुरुषों को, खास तौर पर युवाओं को भी सुरक्षित माहौल प्रदान किया जाए ताकि वे भविष्य के प्रति अपनी चिंताओं और असुरक्षाओं के बारे में खुल कर बात कर सकें। हमें महिला समाख्या को पुरुष समाख्या के साथ वापस लाना चाहिए!
Published on:
01 Feb 2021 09:16 am
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