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स्त्रियों के सुख की परिभाषा और पितृसत्ता

आधी आबादी: दुख भी दुख क्यों नहीं लगते

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Sunil Sharma

Jul 06, 2021

two miscreants barged into the house of the Thalewale and gang-raped his wife

कोरोना पॉजीटिव अस्पताल में गनप्वाइंट पर पत्नी से गैंगरेप

- अंकिता जैन, ‘ऐसी वैसी औरत’ कहानी संग्रह की लेखिका, स्त्री मुद्दों पर लेखन

पितृसत्ता की वजह से स्त्रियां अपना अस्तित्व तक भूल गई हैं। स्त्रियों ने इसे इस हद तक सहज मान लिया है कि अब उनको इससे मिलने वाले दुख भी दुख नहीं लगते। संसार की हर स्त्री दुखी ही है, ऐसी मेरी सोच कतई नहीं है। पर, संसार की सुखी स्त्रियों के सुख की परिभाषा क्या है, यह समझने की कोशिश कर रही हूं। मेरी कई सहेलियां नौकरीपेशा हैं, मेट्रोपॉलिटन शहरों और विदेशों में भी रहती हैं। कुछ के बच्चे भी हैं, लेकिन वे भी कई बार अपनी बातचीत के दौरान यह कहती मिलती हैं कि, ‘बच्चे को तो हमें ही संभालना है’, ‘अभी-अभी ऑफिस से आई हूं, खाना बनाना है’, ‘सास-ससुर आ रहे हैं, अब कुछ दिन के लिए शॉर्ट्स अंदर रख दूंगी’, ‘बेटी/बेटा तीन-चार साल का नहीं होता, तब तक तो नौकरी के बारे में सोच भी नहीं सकती’। इसके बाद भी वे सुखी हैं। वे कहती हैं,‘पति से प्यार करते हैं’, ‘ये सब तो लड़कियों को करना ही पड़ता है’, ‘पहले से तो बहुत बदल गया है’, ‘मेरे पति तो अब हर साल हॉलिडे प्लान करते हैं’, ‘इस बार तो एनिवर्सरी पर डायमंड रिंग दी’, ‘अरे अब कितना तो इंडिया आती हूं। महीना-पंद्रह दिन साड़ी पहनकर सर ढक भी लिया, तो क्या बिगड़ जाएगा’, ‘वह तो दिन-भर का थका हुआ आता है, मैं तो घर में ही रहती हूं’।

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इसके अलावा छोटे शहरों में जो अक्सर सुख की परिभाषा देखने मिलती है, वह कुछ ऐसी होती है, ‘अरे तो क्या हो गया, पति तो सनक ही जाते हैं, तुम थोड़ा शांत रह लो’, ‘तुम्हारे अंकल कितने बुरे थे, लेकिन हमने कभी अलग होने के बारे में सोचा? अरे हम औरतें ही तो घर को बनाकर रखती हैं, दो-चार गाली खा भी लें तो क्या?’ ‘आदमी ऐसे ही होते हैं, इसे नजरअंदाज करना सीख लोगी, तो सुखी रहोगी।’ इनमें से कोई भी बात काल्पनिक नहीं है। ये वे बातें हैं जो स्त्रियां अपनी अगली पीढ़ी पर थोपती जा रही हैं। अभी कुछ दिन पहले की बात है, मैं मायके में थी। बेटा हर दिन पापा के साथ बाजार से एक खिलौना लाता था। एक दिन दोनों हाथों में चूड़ी पहनकर आया। मैं हैरान थी यह देखकर कि मेरे स्टीरियोटाइप पिता एक लडक़े को चूड़ी कैसे पहना लाए, लेकिन फिर खुुश हुई कि उन्होंने नन्हीं-रंग-बिरंगी चूड़ी को महज खिलौने की तरह देखा, न कि स्त्री के किसी एक गहने की तरह। पर, यह इतना सहज सभी के लिए नहीं था, कई लोगों ने टोका ‘ए पगला! लडक़ा होकर चूड़ी पहनता है।’

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पितृसत्ता के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में सुट्टा, शराब, और शॉर्ट्स शामिल करने की बजाय बच्चों की परवरिश लडक़ा-लडक़ी की तरह नहीं इंसान की तरह करने का संकल्प करें, तो ज्यादा बेहतर होगा। हम यह न मानें कि चूड़ी पहन लेने या मांग भर लेने से पति की उम्र बढ़ जाती है। हम यह भी न मानें कि दिनभर नौकरी से थका-हारा पति शाम को थोड़ा गुस्सा कर भी ले तो क्या। हमारे सुख की परिभाषा जिस दिन बदलेगी, उस दिन सही मायने में यह लड़ाई शुरू होगी।