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विश्व यूनानी दिवस: स्वास्थ्य प्रणाली की पूरक है यूनानी चिकित्सा

- हकीम अजमल खान की जयंती पर मनाया जाता है आज ही के दिन विश्व यूनानी दिवस- अपने मान्यता प्राप्त चिकित्सकों, अस्पतालों और शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थानों के साथ चिकित्सा की यूनानी प्रणाली आज स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने की राष्ट्रीय प्रणाली का एक अभिन्न हिस्सा है। जरूरत है कि इस प्रणाली की पहुंच जमीनी स्तर तक आसान बनाई जाए।

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विश्व यूनानी दिवस: स्वास्थ्य प्रणाली की पूरक है यूनानी चिकित्सा

विश्व यूनानी दिवस: स्वास्थ्य प्रणाली की पूरक है यूनानी चिकित्सा

रूबी अंजुम

प्रोफेसर और अध्यक्ष, तहफुजी व समाजी तिब विभाग, अजमल खान तिब्बिया कॉलेज, एएमयू यूनानी चिकित्सा पद्धति यों तो विश्व की सबसे पुरानी उपचार पद्धतियों में से एक है जिसकी शुरुआत ग्रीस (यूनान) से हुई, लेकिन भारत में बीसवीं सदी की शुरुआत में दिल्ली में तिब्बिया कॉलेज की स्थापना करके यूनानी चिकित्सा का पुनरुत्थान करने का श्रेय हकीम अजमल खान को ही जाता है। पेशे से हकीमों के परिवार में 11 फरवरी 1863 को दिल्ली में जन्मे अजमल खान एक राष्ट्रवादी नेता, विचारक और स्वतंत्रता सेनानी थे। धर्म, राजनीति और चिकित्सा पद्धति पर उनके विचार सभी को समान रूप से प्रभावित करते थे।

यूनानी चिकित्सा पद्धति के शोध और अभ्यास के विस्तार से जुड़ी महत्त्वपूर्ण संस्थाओं हिन्दुस्तानी दवाखाना और आयुर्वेदिक और यूनानी तिब्बिया कॉलेज (दिल्ली) को आकार देने में हकीम अजमल खान की अहम भूमिका रही। उनके अथक प्रयास का ही परिणाम था कि ब्रिटिश शासन में समाप्ति की कगार पर पहुंच चुकी भारतीय यूनानी चिकित्सा प्रणाली में नई ऊर्जा और जीवन का संचार हुआ। यूनानी प्रणाली के साथ-साथ चिकित्सा की सभी पारंपरिक प्रणालियों को ब्रिटिश शासन की लगभग दो सदियों तक पूरी तरह उपेक्षा का सामना करना पड़ा था। राज्य द्वारा संरक्षण वापस लिए जाने के बावजूद आम जनता के यूनानी चिकित्सा पद्धति में विश्वास और हकीम अजमल खान की कोशिशों का परिणाम यह हुआ कि इसका अभ्यास जारी रहा।

हकीम अजमल खान ने मूल रूप से दवा की यूनानी प्रणाली में 1920 के दशक में अनुसंधान की अवधारणा विकसित की। अपने समय की एक बहुमुखी प्रतिभा, हकीम अजमल खान ने बहुत जल्द ही अनुसंधान के महत्त्व को अनुभव किया। आजादी के बाद भारत सरकार ने इन प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए 1971 में हैदराबाद में यूनानी चिकित्सा पद्धति के लिए केंद्रीय शोध संस्थान (सीआरआइयूएम) की स्थापना की और 2016 में हकीम अजमल खान के जन्मदिवस ११ फरवरी को उनके सम्मान में यूनानी दिवस के रूप में घोषित किया। आज सीआरआइयूएम एक ऐसा विकेंद्रीकृत संस्थान है, जिसका संचालन यूनानी चिकित्सा में अनुसंधान के लिए केंद्रीय परिषद (सीसीआरयूएम) के अधीन किया जा रहा है।

यूनानी: समग्र दृष्टिकोण पर आधारित-
यूनानी चिकित्सा पद्धति में बीमारियों की जांच नब्ज टटोल कर और मल-मूत्र की जांच के उपरांत की जाती है। यूनानी चिकित्सा मानव जाति को स्वस्थ और रोगमुक्त बनाने के लिए कई सदियों से प्रयासरत है ताकि मनुष्य न्यूनतम या शून्य बीमारी के साथ एक स्वस्थ जीवन जी सके। यह पूरी तरह से समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है। इस पद्धति में उपचार के नियम और विधियां हैं - इलाज बिल दवा (फार्मकोथेरपी), इलाज बिल गिजा (डाइटोथेरपी), इलाज बिल तदबीर (रेजिमेंटल थेरपी) और इलाज बिल यद (सर्जरी)। इस पद्धति में न सिर्फ रोग का इलाज किया जाता है, बल्कि रोगों से बचने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसे बढ़ाई जाए यह भी बताया गया है। यूनानी चिकित्सा का मानना है कि मनुष्य का स्वास्थ्य आसपास के वातावरण से भी प्रभावित होता है। यही कारण है कि मानव जाति और उसके वातावरण में संतुलन बनाना जरूरी है। इस प्रणाली में स्वास्थ्य के लिए छह अहम कारक माने गए हैं, जिन्हें असबाब-ए-सित्ता-जरूरिया कहते हैं। इन्हीं कारकों की वजह से मनुष्य स्वस्थ या रोगग्रस्त रहता है। ये कारक हैं - हवा,खाद्य और पेय पदार्थ, शारीरिक हरकत और आराम, मानसिक हरकत और आराम, सोना और जागना, निकास और प्रतिधारण।

यूनानी चिकित्सा का शानदार रेकॉर्ड-
यूनानी चिकित्सा पद्धति का भारत में लंबा और शानदार रेकॉर्ड रहा है। देश में आज यूनानी चिकित्सा से संबंधित कई प्रतिष्ठित शैक्षिक, अनुसंधान और स्वास्थ्य देखभाल करने वाले संस्थान हैं। इसका कारण यह है कि आजादी के बाद औषधि की भारतीय प्रणाली के साथ-साथ यूनानी प्रणाली को केंद्र सरकार और लोगों का संरक्षण और विश्वास प्राप्त हुआ। भारत सरकार ने भी इस प्रणाली के सर्वांगीण विकास के लिए समय-समय पर कई कदम उठाए, यूनानी चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण को विनियमित करने और बढ़ावा देने के लिए कानून पारित किए और यूनानी दवाओं के उत्पादन और अभ्यास के लिए अनुसंधान संस्थानों, परीक्षण प्रयोगशालाओं और मानकीकृत नियमों की स्थापना की।आज देश में सरकारी और निजी क्षेत्र में कई यूनानी दवा निर्माण इकाइयां सक्रिय हैं। फार्माकोपिया लेबोरेटरी फॉर इंडियन मेडिसन (पीएलआइएम), भारतीय फार्माकोपिया आयोग के अधीन जिन पारंपरिक औषधियों के परीक्षण के लिए १९७० से बतौर अपेलट लेबोरेटरी कार्य कर रही है, उनमें यूनानी दवाएं भी शामिल हैं। इन्फॉर्मेशन एजुकेशन कम्युनिकेशन (आइईसी) गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से यूनानी चिकित्सा पद्धति के प्रचार-प्रसार की दिशा में कई कदम उठाए भी गए हैं। इनमें देश-विदेश में आरोग्य सेमिनार, वर्कशॉप और कॉन्फ्रेंस के साथ स्वास्थ्य प्रदर्शनी और शिविरों का आयोजन शामिल है। विदेशों में भी यूनानी चिकित्सा पद्धति को लोकप्रिय बनाने की दिशा में प्रयास जारी हैं और इसी के चलते यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न केप, दक्षिण अफ्रीका में यूनानी मेडिसन चेयर की स्थापना भी की गई है।

अपने मान्यता प्राप्त चिकित्सकों, अस्पतालों और शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थानों के साथ चिकित्सा की यूनानी प्रणाली आज स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने की राष्ट्रीय प्रणाली का एक अभिन्न हिस्सा है। जरूरत है कि इस प्रणाली की पहुंच जमीनी स्तर तक आसान बनाई जाए ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग इस व्यापक और सर्वसमावेशी चिकित्सा प्रणाली का लाभ उठा सकें।

(लेखिका अजमल खान तिब्बिया कॉलेज, एएमयू में तहफुजी व समाजी तिब विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष हैं)