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रोजगार पर युवाओं में बढ़ रहा है रोष

कई-कई साल तक परीक्षाएं टाली जाती हैं और परिणाम आने के बाद भी नियुक्ति पत्र नहीं मिलते। नौकरी में जॉइनिंग नहीं करवाई जाती।

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Sunil Sharma

Mar 19, 2018

indian youth

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- योगेन्द्र यादव, टिप्पणीकार

नया हम एक राष्ट्रव्यापी युवा आंदोलन की शुरूआत देख रहे हैं? क्या बेरोजगारी का मुद्दा देश की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बनेगा? क्या दुनिया के इस सबसे युवा देश में युवाओं के मुद्दे और उनकी ऊर्जा राजनीति को संचालित करेगी? एसएससी विरोधी आंदोलन के कारण यह सवाल बहुत लोगों के मन में आया है। अगर इसका सिरा पकड़े रखें तो यह सवाल हमें हमारी व्यवस्था के पूरे सच को उजागर करने में मदद देता है। पहली पायदान पर खड़े होकर देखें तो मामला छोटा सा है। केंद्र सरकार के स्टाफ सलेक्शन कमीशन (एसएससी) की सीजीएल नामक परीक्षा के कुछ केंद्रों पर धांधली होने का आरोप था। इस धांधली के कुछ प्रमाण भी परीक्षार्थियों के हाथ लग गए।

इस मुद्दे पर परीक्षार्थियों ने सीबीआइ द्वारा स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग को लेकर एसएससी के दफ्तर के बाहर मोर्चा संभाले हैं। विरोध प्रदर्शन अब एक बड़ा रूप धारण कर चुका है। शुरुआत में एक विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठे हुए युवा पिछले कई दिनों से वहीं दिन-रात टिके हुए हैं। सोशल मीडिया पर हजारों युवाओं ने इस आंदोलन का जमकर समर्थन किया। फिर अलग-अलग शहरों में इस आंदोलन के पक्ष में युवा संगठनों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है। इस घटना से एक राष्ट्रव्यापी युवा आंदोलन की सुगबुगाहट महसूस होने लगी है।

कई लोगों को गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और बिहार आंदोलन की याद आने लगी है, जहां एक छोटे से मुद्दे से शुरू होकर एकाएक एक बड़ा युवा आंदोलन खड़ा हो गया था। ऐसे क्यों हुआ? यह सवाल हमें दूसरी पायदान पर उतरने को विवश करता है। हम पाते हैं, यह मामला इतना छोटा भी नहीं था। केंद्र सरकार की यह संस्था सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए कई परीक्षाएं कराती है। इनमें परीक्षार्थियों की संख्या एक करोड़ से भी अधिक है।
जिस सीजीएल परीक्षा में धांधली के सवाल पर आंदोलन शुरू हुआ था उसमें कुल 8,000 नियुक्तियां होनी थी जिसके लिए कोई 30 लाख लोगों ने आवेदन किया था।

यों भी एसएससी में घपले और घोटाले की यह कोई पहली शिकायत नहीं है। पिछले कई वर्षों में एसएससी द्वारा आयोजित अनेक परीक्षाओं के बारे में शिकायतें आती रही है। एक बड़ी शिकायत एसएससी द्वारा परीक्षाएं आयोजित करने का ठेका एक प्राइवेट कंपनी को दिए जाने के बारे में है। यह कंपनी अनेक व्यावसायिक संस्थानों को परीक्षा केंद्र बना देती है। परीक्षा कैसे ली जा रही है इस पर एसएससी का कोई नियंत्रण नहीं होता है। लेकिन आज तक एसएससी इन शिकायतों के निवारण की कोई व्यवस्था नहीं बना पाई है। एक पायदान और उतरे तो हम पाएंगे कि यह समस्या किसी एक संस्था या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार के साथ-साथ लगभग सभी राज्य सरकारों में भी नौकरियों में नियुक्ति में बड़े पैमाने पर धांधली की शिकायत आती रहती है। सरकारी नौकरियां बहुत कम है और उम्मीदवार बेहिसाब।

इसलिए जाहिर है इन चंद नौकरियों के लिए जानलेवा प्रतिस्पर्धा होती है। विद्यार्थी कई-कई साल तक इन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। मां-बाप के सीमित संसाधन में किसी तरह पैसा निकाल कर कोचिंग लेते हैं। सामान्य घर से आने वाले हैं विद्यार्थियों की पूरी जवानी इसी चक्कर में बीत जाती है। इसलिए जब इन परीक्षाओं में धांधली की बात सामने आती है तो युवाओं के गुस्से की आग स्वाभाविक है। एक सीढ़ी और गहराई में जाने पर हम देखते हैं कि यह समस्या सिर्फ सरकारी नौकरियों में धांधली की नहीं है। इस समस्या की जड़ में है देश में व्यापक बेरोजगारी। हर साल कोई एक करोड़ युवा रोजगार के बाजार में उतरते हैं और हमारी व्यवस्था इनमें से मुट्ठी भर को ही कायदे का रोजगार दे पाती है। आंकड़ों में तो देश में आर्थिक वृद्धि हुई है। पर इसका रत्ती भर भी असर रोजगार के अवसरों में वृद्धि के रूप में दिखाई नहीं देता। रोजगार की तलाश में घूम रहे अधिकांश युवाओं को किसी ना किसी कच्ची नौकरी से संतोष करना पड़ता है।

या तो असंगठित क्षेत्र की नौकरी जिसमें जब मालिक का मन हुआ लगाया जब मन हुआ हटा दिया। या फिर पिछले दो दशक में इसी कच्ची नौकरी के नए स्वरूप यानी कॉन्ट्रेक्ट की नौकरी। प्राइवेट सेक्टर ही नहीं, सरकारी नौकरी में भी अब इन्हीं अस्थायी कॉन्ट्रेक्ट नौकरियों की भरमार है। कहने को यहां नियुक्ति पत्र मिलता है, बैंक में वेतन भी मिलता है। पर असल में यह नौकरी असंगठित क्षेत्र की कच्ची नौकरी से बहुत अलग नहीं है।

बेरोजगारों की संख्या सरकारी आंकड़े से बहुत अधिक है। एसएससी दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन सिर्फ संस्था के विरुद्ध नहीं है। यह उस व्यवस्था के विरुद्ध है जो नियमित रूप से बेरोजगारी को जन्म देती है। सीबीआइ जांच से शायद कुछ खुलासा हो। यदि हॉस्टल मेस के खाने की पड़ताल से शुरू हुआ नवनिर्माण आंदोलन गुजरात में सत्ता की जड़ हिला सकता है तो एसएससी घोटाले के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन हमारी राजनीति के ढर्रे को बदल सकता है।