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जैवमंडल के लिए पौधों की पारिस्थितिकी से जुड़ें युवा

अंतरराष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य दिवस (आइडीपीएच): 12 मई किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में पौधों का होना उनके जैविक व अजैविक घटकों के परस्पर प्रभाव और एक-दूसरे पर निर्भरता का परिणाम है, इसलिए पादप स्वास्थ्य को इससे अलग नहीं माना जा सकता।

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Patrika Desk

May 12, 2023

जैवमंडल के लिए पौधों की पारिस्थितिकी से जुड़ें युवा

जैवमंडल के लिए पौधों की पारिस्थितिकी से जुड़ें युवा

डॉ. शशिरेखा सुरेशकुमार
वनस्पति विज्ञानी, मीठीबाई कॉलेज, मुंबई यूनिवर्सिटी में बॉटनी विभागाध्यक्ष रह चुकी हैं
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पेड़-पौधों की सेहत के लिए समर्पित अंतरराष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य दिवस 12 मई को विश्व भर में मनाया जाना पौधों के स्वास्थ्य संरक्षण के लिए सराहनीय कदम है। इस बात पर गौर करना आवश्यक है कि पौधे इस जैवमंडल के उतने ही महत्त्वपूर्ण जीव हैं, जितने कि अन्य। बल्कि कहा जाना चाहिए कि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे उत्पादक हैं जो जीवन को बनाए रखते हैं। किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में पौधों का होना उनके जैविक व अजैविक घटकों के परस्पर प्रभाव और एक-दूसरे पर निर्भरता का परिणाम है, इसलिए पादप स्वास्थ्य को इससे अलग नहीं माना जा सकता। किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र या प्राकृतिक आवास में प्रत्येक पौधे को उसकी किस्म, गुणवत्ता और वायु, जल, मृदा की मात्रा से जोडक़र देखा जाता है। ये सभी तापमान, पौधों, पशुओं और सूक्ष्म जीवों के बीच समन्वय स्थापित करने वाले पोषक सेतु के घटक हैं। ऐसा नहीं है कि पौधों का स्वास्थ्य स्थूल जलवायु अवस्थाओं से ही प्रभावित होता हो, इस पर सूक्ष्म जलवायु अवस्थाओं का भी असर पड़ता है। अगर इनमें से कोई एक भी घटक लम्बे समय तक असंगत है तो उसका पौधों पर कठोर प्रभाव पड़ता है। इससे उनकी संख्या कम हो सकती है, उनमें इतने भौतिक व शारीरिक बदलाव आते हैं कि यदि वे इन्हें सह नहीं पाएं तो विलुप्त भी हो जाते हैं। भूमि का अनुचित उपयोग और प्रबंधन के तरीके, विकास परियोजनाओं को मंजूरी, वनीकरण के लिए पौधों का अनियोजित चयन और पुन:हरितीकरण परियोजना, विदेशी किस्मों के या तेजी से फैलने वाले पौधे आदि ऐसे कारक हैं जो मृदा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। मिट्टी या उसके भौतिक, रासायनिक एवं जैविक तत्व ही सबसे पहले व सर्वाधिक आसानी से प्रभावित होते हैं।

पौधों का मूल पर्यावरण उनके अस्तित्व व स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण है। पौधों के स्वास्थ्य का आकलन पत्तियों, फूलों व फलों के आकृति विज्ञान तथा उनके भौतिक विकास और पुनरुत्पादक बीज पैदा करने की प्रजनन क्षमता के आधार पर किया जाता है। ऐसा तब संभव है जब कीड़े, पक्षी व अन्य एजेंट जैसे विशिष्ट परागकणकारी आस-पास के वातावरण में मौजूद हों। मिट्टी में मौजूद कवक व अन्य जीवाणु भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। ये पृथक्करण और खनिजीकरण के लिए उपयोगी हैं। प्रत्येक पादप प्रजाति का विशिष्ट मृदा माइक्रोफ्लोरा होता है। हर पारिस्थितिकी में मौजूद कवक का एक विस्तृत माइसीलिया नेटवर्क होता है जो प्रत्येक पौधे की जड़ को एक पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ता है। पौधे की जड़ और कवक के बीच जुड़े इसी माइकोरिजल नेटवर्क से आवश्यक पोषक तत्वों की मांग व आपूर्ति की शृंखला बनी रहती है। यहां तक कि यही वह सेतु है, जो रोगाणुओं के संभावित हमलों के प्रति पौधों को चेतावनी देता है। पौधों का माइक्रोबियोम (बैक्टीरिया, कवक, जीवाणु और उनके जीन का समूह) उनका स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। इसी से पारिस्थितिकी तंत्र का स्वास्थ्य बना रहता है। पेड़, पौधों के मुकाबले मजबूत होते हैं और परिवर्तन के सामने भी खड़े रहते हैं लेकिन वे भी प्रदूषण के दुष्प्रभावों से अछूते नहीं हैं। एक अरसे से पेड़ों की प्रजातियां धीरे-धीरे विलुप्त होती देखी जा रही हैं। जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में पानी उन पौधों के विकास के लिए पोषण का मुख्य स्रोत है जो जलाशयों व उनके आस-पास उगते हैं। प्रदूषणकारी गतिविधियां जैसे पानी में सीवेज लाइन का खुलना, घरेलू व औद्योगिक कचरा डालना, झीलों और नदियों के घुलनशील पोषक तत्वों की हानि, जलीय पौधों व पशुओं की मृत्यु का कारण बनती हैं। इससे जलाशयों में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है। अंतत: झीलें व जलाशय सूख जाते हैं।
निर्वनीकरण और वानस्पतिक आवरण घटने और पोषक तत्वों में बदलाव से ऐसे पौधों की संख्या बढ़ जाती है, जो घरेलू या स्थानीय प्रजातियों के अस्तित्व में बाधा बनते हैं। मिट्टी प्रत्येक जैव इकाई को जैवमंडल से जोड़ती है। किसी क्षेत्र में प्रदूषण और क्षति के प्रभाव दूरगामी होते हैं। अगर किसी पौधे का समुचित विकास नहीं हो रहा है तो समझ जाना चाहिए कि उसके इर्द-गिर्द जलवायु ठीक नहीं है। या तो वहां की मिट्टी में खराबी है या फिर उसके साथ लगे पौधे मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों में प्रतिद्वंद्विता रखते हुए ज्यादा हिस्सा उपयोग ले रहे हैं।

पौधे, खास तौर पर जो पेड़ बन चुके हैं, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर यों ही नहीं स्थानांतरित किया जा सकता। इसके लिए अनुकूल मृदा घटक जरूरी हैं। ऐसा नहीं कि उन्हें अपनी सुविधानुसार, किसी निर्जीव फर्नीचर की तरह एक जगह से दूसरी जगह रख दिया जाए। इससे मिट्टी की संरचना और माइकोरिजल सेतु प्रभावित होते हैं। पेड़ के लिए नई जगह की मिट्टी की सूक्ष्मजैविकी और आस-पास के अन्य पौधों के साथ सामंजस्य बिठाना मुश्किल होता है। ये सब घटक मिलकर पारिस्थितिकी तंत्र के जल स्रोतों के लिए जिम्मेदार हैं। ये जल स्रोत ही हर जीव के जीवन के लिए सबसे जरूरी हैं। पादप जीवन के इन्हीं मूलभूत तत्वों के प्रति जनजागरूकता के प्रसार की आवश्यकता है, खास तौर पर युवाओं के बीच, जिन पर पौधों के संरक्षण और जैवमंडल की रक्षा की महती जिम्मेदारी है। हमारी गतिविधियां पौधे की भूमिका पर केंद्रित होनी चाहिए और ऐसी होनी चाहिए जो जैवमंडल के अन्य घटकों के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकें।