
राष्ट्र और नीति निर्माण में भागीदारी निभाएं युवा
ओम बिरला
लोकसभा अध्यक्ष
ऋग्वेद का एक मंत्र है- 'संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् देवा भागं यथापूर्वे संजानाना उपासते।। समानो मन्त्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम्।' ऋग्वेद के दशम मण्डल के इस संज्ञान सूक्त का भावार्थ है कि 'हम सब एक साथ चलें, आपस में संवाद करें, हमारे मन-विचार एक हों। उसी तरह, जिस प्रकार पहले विद्वान/देवता अपने नियत कार्य के लिए एक होते थे। मिलकर कार्य करने वालों का मंत्र समान होता है, अर्थात परस्पर मंत्रणा करके एक निर्णय पर पहुंचा जाता है।' इतिहास के प्रत्येक कालखंड में किसी भी व्यवस्था, राष्ट्र या समाज के सशक्तीकरण में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन सदा ही युवाशक्ति ने किया है। देश की स्वाधीनता से लेकर देश के निर्माण और विकास में युवा वर्ग का योगदान सर्व प्रमुख रहा है। अपनी सक्रियता और समर्पण से भारत के लोकतंत्र के सशक्तीकरण में भी युवाओं की मुख्य भागीदारी रही है।
भारत का लोकतंत्र हमें स्वाधीनता के बाद मिला उपहार नहीं है, बल्कि यह हमारी वह विरासत की निरंतरता है, जिसकी जड़ें हमारे राष्ट्र के प्राचीनतम काल से दिखाई देती हैं। यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में 'लोकतंत्र' शब्द की गूंज से बहुत पहले ही भारतीय उपमहाद्वीप लोकतांत्रिक सिद्धांतों की जन्मभूमि के रूप में विकसित हो चुका था। प्राचीन सिंधु-सरस्वती सभ्यता, वैदिक काल, जनपद काल के दौरान भी हमारे यहां लोकतांत्रिक रीति-नीति का होना प्रमाणित हुआ है। इसी व्यवस्था को स्वतंत्रता पश्चात आधुनिक स्वरूप में हमने अपनाया और पिछले 75 से अधिक वर्षों से समय में इसे और अधिक सशक्त और सुसंगत बनाया है। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस का विषय है- 'आने वाली पीढ़ी का सशक्तीकरण।' यह सशक्तीकरण ज्ञान से हो, कत्र्तव्य बोध और समर्पण से हो। राष्ट्र-निर्माण की अनवरत प्रक्रिया में युवा वर्ग को आवश्यक भूमिका निभानी है। युवा वर्ग की रचनात्मकता, नवप्रवर्तन और ऊर्जा हमारे समाज के हर क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। युवा वर्ग की जिज्ञासा, समाधान खोजने की ललक और बड़े सपने देखने की क्षमता देश की प्रगति के पीछे प्रेरक शक्ति है। युवा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल हों। किसी भी विषय के विद्यार्थी हों, कार्य क्षेत्र कोई भी हो; भारत के पवित्र संविधान का अध्ययन अवश्य करें। राष्ट्रीय स्वाधीनता के साथ संविधान सभा में जो विमर्श हुआ था, जो चर्चाएं हुई थीं, उनका अध्ययन करें। अपने-अपने प्रदेश और देश की विधायिका के सत्रों में हुए चर्चा संवाद को पढ़ें। विधायी प्रणाली के बारे में जानने के लिए अपनी रुचि पैदा करें। युवाओं के लिए लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ मतदान करने तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। हर बार चुनाव में मतदान करना हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा है, मगर मतदान करने भर से लोकतांत्रिक जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है, बल्कि मतदान से तो यह जिम्मेदारी शुरू होती है। जिन प्रतिनिधियों का चुनाव किया है, वे निष्ठा और पारदर्शिता के साथ काम कर रहे हैं या नहीं, वे अपने संसदीय दायित्वों एवं मर्यादाओं का निर्वहन कर रहे हैं या नहीं इसका आकलन निरंतर करना होगा। युवा वर्ग की जिम्मेदारी है कि वह राष्ट्र और समाज निर्माण के हर एक नीति-निर्णय में भागीदारी करे। महत्त्वपूर्ण विधेयकों और कानूनों का विश्लेषण करे। विधेयक किस तरह सदन में पारित होते हैं, विधि निर्माण की कैसी प्रक्रिया होती है; इन सभी पहलुओं को समझे।
युवाओं को संसदीय प्रणाली से जोडऩे के लिए इन वर्षों में संसद में अभिनव प्रयोग किए गए हैं। देश के युवाओं को युवा संसद के माध्यम से संसदीय आचार-विचार से जोडऩे के अतिरिक्त संसद के केन्द्रीय कक्ष में देश के विभिन्न राज्यों से चयनित युवा हमारे महापुरुषों के जीवन, उनके योगदान पर अपने विचार साझा करते हैं। हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों एवं महापुरुषों के जीवन को गहराई से समझें, जानें और उनके जीवन से प्रेरणा लेकर देश के अलग-अलग राज्यों में स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच में इस प्रकार के कार्यक्रम का आयोजन किया जाए ताकि आने वाली युवा पीढ़ी हमारे स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों और आदर्शों को आत्मसात कर राष्ट्र निर्माण में योगदान कर सके। शिक्षार्थियों के लिए संसद भ्रमण को समय के साथ अधिक सहज और सुविधाजनक बनाया गया है। संसद की अधिकाधिक चर्चाएं ऑनलाइन माध्यम एवं डिजिटल संसद ऐप पर उपलब्ध हैं। संसद पुस्तकालय में आप संविधान सभा की चर्चाओं का अध्ययन कर सकते हैं। यह पुस्तकालय डिजिटल ऐप में भी उपलब्ध है। लोकतंत्र, संसदीय प्रणाली और संविधान के प्रति समझ जितनी गहरी होगी, संवैधानिक आदर्शों के प्रति सम्मान में उतनी ही अधिक बढ़ोतरी होगी। इससे व्यक्तित्व का विकास होगा। युवा वर्ग को सभी क्षेत्रों में नवाचार व उद्यम के माध्यम से अपने आपको विकसित करना है। कत्र्तव्य भावना, समर्पण और संकल्प से देश को बढाऩा है। स्वयं को अपने लिए, अपने समाज के लिए, अपने देश के लिए कत्र्तव्य की कसौटी पर कसिए। राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कत्र्तव्यों के लिए जितना परिश्रम करेंगे, अधिकारों को भी उतना ही बल मिलेगा।
हाल ही विश्व भर में युवाओं के चिर प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्म सम्मेलन में उद्बोधन के 130 वर्ष पूर्ण हुए हैं। स्वामी विवेकानंद जब भारत के भविष्य की बात करते थे, तो उनकी आंखों के सामने मां भारती की भव्यता का चित्र होता था। वे कहते थे कि जहां तक हो सके अतीत की ओर देखो, इतिहास से सीखो और आगे बढ़ो; और भारत को पहले से भी कहीं ज्यादा उज्जवल, महान और श्रेष्ठ बनाओ। युवा इसी भावना से राष्ट्र के प्रति स्वयं को पुन: समर्पित करें।
Published on:
15 Sept 2023 08:58 pm
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