
पुलिस से सेना तक, एथलीट से कोच तक, लेकिन अब जीवन-मौत के बीच जुझ रहे हैं हकम सिंह भट्टल
नई दिल्ली। ध्यान चंद अवॉर्ड से नवाजे गए हकम सिंह भट्टल आज जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहें हैं। कभी एशियन गोल्ड मेडलिस्ट विजेता रहे हकम सिंह का परिवार आज उन्हें अपने आंखों के सामने तिल-तिल कर मरते देख रहा है। बेहतर इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर उनका परिवार आज भी मदद की बाट जोह रहा है। लेकिन अभी तक किसी ने अपने हाथ नहीं बढाए हैं। भट्टल को लिवर और किडनी से संबंधित बीमारी है। जिसके कारण वो लम्बे समय से अस्पताल के चक्कर काट रहे थे लेकिन अब वो उठ कर चलने के हालत में नहीं हैं।
पैसों के किल्लत से परेशान है परिवार
किसी ने सच ही कहा है कोई खिलाड़ी चाहे 2 रूपये के लिए मर जाए कोई मदद के लिए आगे नहीं आता लेकिन जब उसी खिलाड़ी के जीवन पर फिल्म बनती है। तो 200 करोड़ की कमाई होती है। हकम सिंह भट्टल की जीवनी रुपहले परदे पर देखने को मिलती है या नहीं यह कहना तो मुश्किल है। लेकिन किसी खिलाड़ी को जिसने अपना जीवन देश के लिए मेडल लाने में लगा दिया हो ऐसे विपत्ति के समय जब कोई साथ ना आये तो यह अपने देश का दुर्भाग्य ही है। भारत के लिए मैडल जीतने वाले हकम सिंह ने भारतीय सेना को भी अपने सेवाएं दी हैं। उन्होंने 1972 में 6 सिख रेजिमेंट में हवलदार के तौर पर जॉइन किया था। खेल के विकास में अहम योगदान के लिए उन्हें 29 अगस्त, 2008 को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने ध्यान चंद अवॉर्ड से सम्मानित मिल चुका है। इसके बाद भी आज उनके परिवार को इलाज के लिए पैसों के लिए भटकना पड़ रहा है।
पंजाब पुलिस को भी दे चुके हैं सेवाएं
हकम सिंह ने इसके साथ ही बैंकॉक एशियन गेम्स-1978 में पुरुषों के 20 किमी पैदल चाल स्पर्धा का गोल्ड मेडल अपने नाम किया था। हकम ने तब यह गोल्ड नए रेकॉर्ड के साथ हासिल किया था। 1981 में लगी एक खतरनाक चोट की वजह से उन्हें खेलना छोड़ना पड़ा, लेकिन वह ऐथलेटिक्स से जुड़े रहे। 1987 में आर्मी से जब वह रिटायर हुए तो उनके अनुभव और क्षमता को देखते हुए पंजाब पुलिस में 2003 में उन्हें ऐथलेटिक्स कोच के तौर पर कॉन्स्टेबल रैंक की नौकरी मिली। यहां से वह 2014 में रिटायर हुए। रिटायर होने से पहले खेल हमक सिंह ने खेल के क्षेत्र में कई बहुमूल्य काम किये।
अभी एक निजी अस्पताल में हो रहा इलाज
हकम सिंह की पत्नी बेअंत कौर ने बतया 'मेरे पति को इलाज के लिए राज्य सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिली है। उनका लिवर लगभग पूरी तरह खराब हो चुका है। और डॉक्टर्स का कहना है उनका इलाज अभी लंबा चल सकता है। उन्हें पहले बरनाला के एक हॉस्पिटल में 4 दिन के लिए भर्ती कराया गया था। लेकिन अभी फिलहाल वह एक संगरूर में एक निजी अस्पताल में हैं।' इस बारे में बरनाला के डिप्टी कमिश्नर धरमपाल गुप्ता ने कहा कि वह इस मामले को राज्य सरकार के पास भेजेंगे और उन्हें उम्मीद है राज्य सरकार उन्हें वित्तीय मदद जरूर करेगी।
Published on:
29 Jul 2018 04:34 pm
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