
नई दिल्ली । कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता,एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो ... इस पंक्ति को हकीकत में बिहार की एक बेटी ने बदला है । बिहार महिला हैंडबाल की कप्तान खुशबू उज्बेकिस्तान के ताशकंद में होने वाले एशियन विमन क्लब लीग हैंडबॉल चैंपियनशिप में हिस्सा लेने जा रही है । ताशकंद में तिरंगा को फहराकर देश का नाम रोशन करने वाली इस बेटी को कई सालों तक सामाजिक और पारिवारिक बन्धनों का सामना करना पड़ना ....लेकिन मजबूत इरादे के आगे जल्द ही बंधनो की हर एक गांठें आहिस्ते आहिस्ते खुलने लगी.....एक रोज ऐसा भी आया जब तमाम सड़ी-गली सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन धीरे -धीरे कमजोर होकर टूटने लगी और खुशबू घर, परिवार,समाज और देश के वातावरण में अपने नाम के मुताबिक खुशबू फैलाने लगी ।
कई रात खुशबू ने रोकर बिताया है -
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में खुशबू ने बताया कि कई रोज ऐसा भी होता था जब वो अकेले बैठ रोती रहती थी । जब दोस्तों को खेलने जाते देखती थी और घरवाले आस पड़ोसियों के दबाब उलहाने की वजह से खुशबू को खेलने जाने से मना करते थे तब खुशबू अकेले बैठ रोने लगती थी । खुशबू ने बताया की उस वक्त मन कर्त अतः की भाग जाऊं घर छोड़ कर .... कुछ कर लूँ .... बंद पिंजरे के किसी तोते सा आजादी की दिवास्वप्न में हर रोज हर पल खुशबू तड़पती रहती थी .....वह छाती थी कि काश उसे भी पंक होता और आजाद होती ...तो खुले आसमान में खूब उड़ान भरती....एक दिन ऐसा ही हुआ जब खुशबू के इरादे के आगे घर वालों ने हार मान ली और उसे खेल कि बड़ी सी दुनिया में उड़ान भरने के लिए एक मौका दिया ...मौका मिलते ही खुशबू हैंडबाल के मैदान में छा गयी।
नवादा में आटा चक्की चलाते हैं पिता -
बिहार के छोटे से शहर में आटा चक्की कि दूकान चलाने वाले अनिल कुमार ने कभी ये सोचा भी नहीं होगा कि एक रोज उनकी बेटी देश भर में उनका नाम रोशन करेगी ।यही वजह था कि आस पड़ोस के लोगों के दबाव में आकर अनिल ने अपनी बेटी को खेल के मैदान पर जाने से मना कर दिया था । आज ख़ुशबू भारतीय हैंडबॉल महिला टीम में बिहार की इकलौती खिलाड़ी हैं ।मगर वह इस जगह न होतीं, अगर एक चिट्ठी ने उनका जीवन न बदला होता ।
ख़ुशबू बताती हैं, "खेल की प्रैक्टिस की वजह से मैं कभी-कभी देर रात घर पहुंचती थी ।कोई लड़की यह खेल नहीं खेलती थी, ऐसे में प्रैक्टिस लड़कों के साथ होती थी. आस-पड़ोस का कोई देख लेता था तो मम्मी-पापा को ताने मारने लगता था । हालांकि माँ ने सकत दिया पर पापा ने साफ़ इंकार कर दिया, बड़ी मुश्किल से एक मौका घर वालों से लिया और आज यहाँ तक पहुंची हूँ ।
जब आस- पड़ोसियों को भी खुशबू पर नाज है -
खुशबू ने आसमान में सुराख करने जैसा ही कुछ काम कर दिखाया है । दरअसल खुशबू ने समाज के ताने बाने के खिलाफ जाकर अपने दायरे को खुद तय किया । घर परिवार समाज सबके दंश को झेला आज उसके सफलता पर पुरे गांव में जश्न मनाया जाता है । माँ पा को भी जब अपने बेटी पर नाज है । बीबीसी संवादाता को खुशबू कि माँ ने भी बताया कि जिस रोज वो जीतकर आ रही थी ढोल -नगाड़े की आवाज सुन ऐसा लगा जैसे पड़ोस में किसी की ब्याह हो ...अपनी बेटी को फूल माला से लदे देख बहुत ख़ुशी होती है ।
Published on:
22 Sept 2017 01:09 pm
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