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रोहट में जन्मे थे तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य जयाचार्य

-आचार्य जयाचार्य के 141वें निर्वाण दिवस पर विशेष-गेस्ट राइटर : साध्वी हेमरेखा, तेरापंथ भवन, पाली

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पाली

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Suresh Hemnani

Sep 04, 2021

रोहट में जन्मे थे तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य जयाचार्य

रोहट में जन्मे थे तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य जयाचार्य

पाली। पाली की धर्मधरा पर संतों व साध्वियों का जन्म होने से यह पावन है। पाली के निकट रोहट में तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य जयाचार्य का जन्म विक्रम संवत 1860 में हुआ था। आचार्य जयाचार्य उस वैराग्य का नाम है, जो महज सात वर्ष की आयु में हाथ में पात्र लेकर गोचरी का अभिनय करते थे। उन्होंने दस वर्ष की आयु में जयपुर में दीक्षा ली। उनके दीक्षा गुरु आचार्य रायचंद्र स्वामी थे। उनके शिक्षा गुरु हेमराज स्वामी थे। आचार्य जयाचार्य ने तेरापंथ संघ में साहित्य की अविरल धारा प्रवाहित की। आचार्य जयाचार्य के तीन भाई, मां व बुआ भी वैराग्य पंथ के अनुगामी बने। आचार्य जयाचार्य के हाथों में ही तेरापंथ समाज व्यवस्था का सूत्रपात हुआ। वह युग तेरापंथ की दूसरी शताब्दी का था। आचार्य ने 30 वर्ष तक तेरापंथ संघ को कुशल नेतृत्व दिया।

अल्प आयु में प्रज्ञापना सूत्र का किया पद्यानुवाद
आचार्य जयाचार्य ने महज 11 वर्ष की अवस्था में कविता करना शुरू कर दिया था। उन्होंने 19 वर्ष की अवस्था में जैनागम प्रज्ञापना सूत्र का संक्षिप्त पद्यानुवाद कर दिया था। वर्तमान आगमों में सबसे बड़े भगवती सूत्र की पद्यमय टीका की। उसकी 80 हजार गाथाएं है। आचार्य की सभी रचनाओं का परिमाण साढ़े तीन लाख गाथाएं है।

‘तेरापंथ की जड़ को कोई नहीं हिला सकता’
आचार्य जयाचार्य बहुत एकाग्र थे। हेमराज स्वामी एक बार पाली पधारे। वे बाजार की दुकानों पर ठहरे। जीतमल मुनि (जयाचार्य) उनके साथ थे। बाजार में एक नट मंडली नाटक/खेल दिखा रही थी। शहर के बड़ी संख्या में लोग वहां खेल देखने पहुंचे। उस समय मुनि जीतमल चौबारे लिख रहे थे। उनके सामने नाटक/खेल चल रहा था। वहां एक व्यक्ति था, जिसने सोचा बालक साधु एक बार नाटक की तरफ देखे तो उनको निंदा का अवसर मिलेगा, लेकिन एेसा नहीं हुआ। नाटक समाप्त होने के बाद उस व्यक्ति ने कहा, जिस संस्था का एक बालक साधु भी इतना एकाग्रचित व दृढ़ है। उसकी जड़ कोई नहीं खोद सकता। मैं कहता हूं कि तेरापंथ की जड़ आगामी सौ वर्षों तक कोई नहीं हिला सकता।

15 वर्ष तक रहे युवाचार्य
विक्रम संवत 1894 में जयाचार्य को युवाचार्य बनाया गया। वे पन्द्रह वर्ष तक युवाचार्य रहे। उनको विक्रम संवत 1908 में बीदासर में आचार्य पद से सुशोभित किया गया। तेरापंथ संघ के तीन महोत्सवों चरमोत्सव, पाटमहोत्सव तथा मर्यादा महोत्सव आचार्य जयाचार्य की ही देन है। आचार्य का महाप्रयाण विक्रम संवत 1938 को जयपुर में हुआ। आचार्य के शासनकाल में 330 दीक्षाएं हुई।