चातुर्मास नाम से ही स्पष्ट हो जाता है चार माह का काल, लेकिन इस बार श्रावण दो होने से चातुर्मास पांच माह के होंगे। धार्मिक जगत की धुरी माने जाने वाले इस बार के चातुर्मास में हर तरफ धर्म के साथ प्रकृति के संरक्षण और उसके सौन्दर्य की महक भी बिखरेगी।
आचार्य जयानंद सूरिश्वर बताते हैं कि प्रकृति रानी बड़ी चुलबुली है। इसके परिधान बदलने से गर्मी, सर्दी व चौमासा आता है। जैन शास्त्र में आषाढ़ी चौमासा का उल्लेख हुआ है। व्यवहार में भी इसी चौमासे को चातुर्मास के रूप में ख्याति मिली है। चातुर्मास का महत्व लौकिक व आध्यात्मिक जगत दोनों में है। इसी अवधि में बार-बार बादलों का योग बनता है, पानी की वृद्घि होती है, जो लौकिक समृदि्ध का आधार है। लोकोत्तर जगत में इस अवधि में गुरु का योग बनता है, पानी की वृष्टि होती है, जो आध्यात्मिक समृदि्ध का आधार है। भगवान महावीर ने चातुर्मास काल में जिनवाणी से जीने की कला से विश्व को अवगत कराया है।
चातुर्मास का मूल अर्थ वर्षा योग
चातुर्मास साधुचर्या का शब्द है। चातुर्मास के चार महीने की अवधि साधु विधिपूर्वक एक ही स्थान पर बिताते हैं। इसका मूल अर्थ वर्षा योग है। जैन शास्त्र में चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से प्रारंभ होता है और कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी की रात तक माना जाता है। यह काल पर्यावरण व कृषि के दृष्टिकोण से विशेष है। वर्षा ऋतु में जीवोत्पत्ति विशेष रूप से होती है। पानी के सम्पर्क में आकर भूमि में दबे बीज अंकुरित हो जाते हैं।
इस कारण नहीं करते साधु विहार
आचार्य रघुनाथ स्मृति जैन भवन में चातुर्मास के लिए आए साध्वी सुमित्रा मनोहर व डॉ. सुप्रिया ने बताया कि इस काल में जगह-जगह जल एकत्रित हो जाने से एक गांव से दूसरे गांव तक पगडण्डी से विहार संभव नहीं हो पाता है। आगम शास्त्रों में निर्देश हैं कि चातुर्मास के दौरान साधु-साध्वियों को विहार नहीं करना चाहिए। चातुर्मास का संयोग हमारी मन:स्थिति में भरे विभिन्न प्रदूषणों को समाप्त करने के साथ ही दुष्प्रवृत्तियों को सत्य वृत्तियों में बदलने का कार्य करता है।
त्याग, वैभव, तप और संयम में लगाएंगे ध्यान
त्याग, वैभव, तप, व्रत और संयम का सागर लहराएंगे। साधना व आराधना व अहिंसा से प्रभावित होकर अधिक संयम का अभ्यास करेंगे। जप, तप, सत्संग आदि में समर्पित भाव से सहभागी बनेंगे।
यह होता है चातुर्मास में
● चिंतन में सत्प्रवृत्तियों का समावेश
● चरित्र में आदर्शवाद के प्रति अगाध निष्ठा उत्पन्न होती है
● गुरु के दिशा-दर्शन के फलस्वरूप सभी लोगों में धर्म का भाव जागता है। निष्ठा, श्रद्धा व समर्पण का भाव जागता है।
● संस्कृति प्रवृत्ति, उपलब्धियों और संभावनाओं को समझकर उनके गुणों को आत्मसात करते हैं।
● चातुर्मास धन और धर्म दोनों के माध्यम से उपलब्धियां प्रदान कराता है।
देवशयनी एकादशी से चातुर्मास
गांधी मूर्ति स्थित रामद्वारा में चातुर्मास कर रहे संत मुमुक्षुराम ने कहा कि हमारी संस्कृति में देव शयनी एकादशी से देव उठनी एकादशी तक चातुर्मास रहता है। इस काल में देव झूलनी एकादशी आती है। उसे परिवर्तनी एकादशी भी कहते है। इसका कारण यह है कि उस दिन भगवान करवट बदलते हैं। सनातन धर्म में चातुर्मास का अर्थ है भगवान की आराधना करने का अवसर।
● तेरापंथ भवन
● साध्वी प्रमोद, साध्वी धन कुमारी, साध्वी विजय प्रभा पाली में चौथी बार चातुर्मास करने आई हैं। साध्वी आदर्श प्रभा तीसरी बार व साध्वी पार्श्व प्रभा पहली बार पाली में चातुर्मास कर रही हैं।
● महावीर नगर
● खरतरगच्छ संघ की साध्वी नीलांजना व साध्वी दीप्ति प्रज्ञा वर्ष 1997 में पाली आई थी। अब पाली में चातुर्मास कर रही हैं। साध्वी आज्ञांजना व साध्वी आगम रुचि पहली बार चातुर्मास कर रही है।
● रघुनाथ स्मृति जैन भवन
● पंजाब व हरियाणा मूल की साध्वी सुमित्रा, साध्वी सुप्रिया, साध्वी साक्षी, साध्वी हितेशी व साध्वी प्रियांशी पाली सहित मारवाड़ क्षेत्र में पहली बार आई हैं। ये अमरमुनि महाराज की शिष्या है।
● रत्नेश्वर महादेव मंदिर
● नागौर के संत गोविन्दराम व संत मनमोहन राम चातुर्मास कर रहे हैं। रामस्नेही सम्प्रदाय के शाहपुरा पीठ के संत है।
● गुजराती कटला उपाश्रय
● पंन्यास परमयश विजय के साथ संत चातुर्मास कर रहे हैं। वे आचार्य योगप्रेम विजय सूरिश्वर के शिष्य है।
जिले में ये संत बहाएंगे प्रवचन की गंगा
● रामद्वारा में राम नाम का गुणगान
● पाली के गांधी मूर्ति स्थित रामद्वारा में रामस्नेही संत मुमुक्षुराम आमेठ चातुर्मास कर रहे हैं।
● बाली में मुनि श्रुतानंद विजय सहित संतों का चातुर्मास।
● इटंदरा में साध्वी संयमशीला सहित अन्य साध्वियां।
● सादड़ी में साध्वी वैभवशीला व साध्वियां।
● बिजोवा में आचार्य चिदानंद सूरिश्वर व जैन संत।
● फालना में साध्वी कल्पलता व साध्वियां।
● खुडाला में साध्वी अमित माला व साध्वियां।
● घाणेराव में जैन संत प्रशांत शेखर विजय व अन्य संत।
● बारवा के आत्मधाम गुरु मंदिर तीर्थ पर दीनदयाल महाराज, खेतेश्वर गोशाला आश्रम इंद्रप्रस्थ खिरोड़ी प्रथम बार चातुर्मास कर रहे हैं।
● सुमेरपुर में अक्षयरसाश्री महाराज के साथ अन्य साधु-साध्वियों का जैन मंदिर में चातुर्मास।
@ तेरापंथ भवन
जमीकंद में होते अनंत जीव – जैन साध्वी
पाली के मंडिया रोड स्थित तेरापंथ भवन में साध्वी प्रमोद के साथ चातुर्मास कर रही साध्वियों का कहना है कि जमीकंद में अनंत जीव माने जाते हैं। इस कारण उनका सेवन नहीं किया जाता है। कई श्रावक-श्राविकाएं वर्ष में इनका उपयोग कर लेते हैं, कम से कम चातुर्मास में हम उनसे ऐसा नहीं करने का संकल्प करवाते हैं। उन्होंने बताया कि चातुर्मास में त्याग व तपस्या करने के साथ आसन बिछाकर जमीन पर सोना चाहिए। जमीन को साफ करना चलना चाहिए। पौषध व उपवास करने चाहिए।
● चातुर्मास कार्यशाला का आयोजन, तत्व ज्ञान।
● जैन विद्या की परीक्षा कार्तिक या आसोज मास में।
● प्रेक्षा ध्यान शिविर तीन से पांच दिन का, जिसमें कायात्सर्ग, प्राणायाम, योगासन आदि का ज्ञान कराया जाता है।
● बच्चों को मंत्र दीक्षा दी जाती है।
● नशा मुक्ति का संकल्प करवाएंगे।
● हर रविवार को रात में धर्म आधारित प्रतियोगिताओं का आयोजन।
रात में सिकुड़ जाता है नाभि कमल, नहीं करना चाहिए भोजन – नीलांजना
खरतरगच्छ संघ की साध्वी नीलांजना ने बताया कि चातुर्मास में श्रावक-श्राविकाओं को आत्मस्वरूप को समझाकर जीवन की दुर्लभता के बारे में बताया जाएगा। हिंसा का पूर्ण त्याग रहेगा। चातुर्मास में श्रावक-श्राविकाओं को पंखे तक का उपयोग नहीं करना चाहिए। रात्रि भोजन का त्याग करना चाहिए। रात्रि में भोजन करना तामसिकता का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि नाभि कमल सूर्यास्त के बाद सिकुड़ जाता है। इस कारण भोजन का पाचन ढंग से नहीं होता है। इससे गैस, एसिडिटी आदि की समस्या होती है। यहीं रात में भोजन नहीं करने का वैज्ञानिक कारण भी है। चातुर्मास में एक ही स्थान पर रहकर आराधना-साधना करने का कारण यह है कि इस काल में जीवों की उत्पत्ति होती है। गमन करने पर जीव हत्या हो सकती है।
● चातुर्मास में शनिवार व रविवार को महिलाओं व बालकों के शिविर लगाए जाएंगे।
● स्वाध्याय करवाया जाएगा।
● तत्वज्ञान करवाया जाएगा, जिससे कि जीवन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा पीठ में इस बार चार माह का चातुर्मास
रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा पीठ के संत गोविन्दराम बताते हैं कि उनके सम्प्रदाय में पहले चार मास का ही चातुर्मास होता था। इसके बाद संतों ने सहमति से तीन माह का कर दिया। इस बार श्रावण दो होने से चातुर्मास चार माह का होगा। चातुर्मास में गृहस्थ को सूर्यास्त से पहले भोजन करना चाहिए, भूमि पर शयन करना चाहिए, हरि कीर्तन व सत्संग करना चाहिए। हरी सब्जी का सेवन नहीं करना चाहिए
वातावरण में नमी से शरीर में बढ़ जाता है जल – साध्वी सुप्रिया
● श्रावक-श्राविकाओं को स्वाध्याय करवाया जाएगा।
● बच्चों के लिए संस्कार शिविर का आयोजन।
● फैशन व व्यसन मुक्ति के लिए शिविर आयोजन।
● नाट्य मंचन के माध्यम से संस्कारों व धर्म का ज्ञान।
● पन्द्रह अगस्त पर देश भक्ति कार्यक्रम कर आजादी का महत्व बताया जाएगा।
● कृष्ण जनमाष्टमी पर भगवान कृष्ण व उनके जीवन, शिक्षा का ज्ञान करवाएंगे।
● पर्युषण में रोजाना एक विषय पर ज्ञान देंगे।
● रक्षा बंधन पर जैन व हिन्दू धर्म में इनके महत्व की देंगे जानकारी।
रघुनाथ स्मृति जैन भवन में चातुर्मास कर रही साध्वी सुप्रिया का कहना है कि चातुर्मास के समय वातावरण में नमी रहती है। शरीर में भी जल की मात्रा बढ़ जाती है। इस समय हरी सब्जियों आदि का सेवन करने से जल की मात्रा और अधिक होती है। शरीर रोगग्रसित हो सकता है। इस कारण चातुर्मास में उपवास करने से शरीर का संतुलन ठीक रहता है। तप करने से पुण्य मिलने के साथ शरीर में निरोगता आती है।
रोजाना करते प्रतिक्रमण
चातुर्मास का जैन धर्म में बहुत महत्व है। इस काल में रोजाना सुबह व शाम को प्रतिक्रमण किया जाता है। संत नित्य प्रवचन करते हैं। श्रावक-श्राविकाएं तप व तपस्या के साथ धर्म की आराधना करते हैं। इसमें पर्युषण महापर्व भी आता है।
ओमप्रकाश छाजेड़, सचिव, सेठ नवलचंद सुप्रतचंद जैन देवकी पेढ़ी, पाली
रात्रि भोजन का त्याग
चातुर्मास में रात्रि भोजन का पूरी तरह से त्याग रहता है। यह पूरा समय तप व आराधना के साथ मन को शुद्ध करने में गुजारा जाता है। बच्चों के लिए संस्कार व ज्ञान शिविर लगाए जाते हैं। रोजाना प्रवचन की गंगा बहती है। तेला, बेला व अट्ठाई आदि तप करते हैं।
सुरेन्द्र सालेचा, अध्यक्ष, तेरापंथ सभा, पाली
आत्म कल्याण का समय
चातुर्मास आत्मकल्याण का समय है। जिसका जैन धर्म में बहुत महत्व है। संतों की निश्रा में रहकर धर्म आराधना की जाती है। उपवास, व्रत व आयम्बिल करते हैं। चातुर्मास के समय इंद्रियों पर विजय पाने का प्रयास किया जाता है।
जगदीशचंद भंसाली, अध्यक्ष, जिन कुशल जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ, पाली
उपवास व आयम्बिल करते हैं
चातुर्मास में श्रावक-श्राविकाएं संतों व साध्वियों की निश्रा में उपवास व आयम्बिल आदि करते हैं। आत्म शुद्धि का प्रयास किया जाता है। चातुर्मास में बच्चों को धर्म का ज्ञान देने व संस्कारवान बनाने के शिविर भी साध्वियों के सान्निध्य में लगाए जाएंगे।
पदमचंद ललवाणी, मंत्री, वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रुई कटला, पाली