
जाखामाता के नाम पर बसा है जाखामाता व जखोड़ा गांव, क्या है इतिहास, पढ़ें पूरी खबर...
पाली/सुमेरपुर। पाली जिले के सुमेरपुर में प्रवेश करने से पहले पाना वाला के पास स्थित जाखामाता मंदिर, शहरवासियों के साथ ही मंदिर के आगे से गुजरते हर वाहन चालक के लिए आस्था का केन्द्र है। प्राचीन मंदिर होने के कारण नवरात्र में साल में दो बार गरबा नृत्य का आयोजन होता है। जहां देररात तक चलने वाले माता के भजनों व गरबा की आवाज शहर के अंतिम छोर जवाईनदी तक जाती है। सुमेरपुर बसने से पूर्व मंदिर तक पहुंचने में परेशानी होती थी। भगतसिंह सर्कल से मंदिर तक रात को सूनसान नजर आता था, लेकिन आज पूरे मार्ग तक हाइमास्ट लाइट है।
परिवार के वंशज भवानीसिंह राठौड़ बताते हैं कि सुमेरपुर की स्थापना से पूर्व ऊन्दरी नाम से गांव था। मारवाड़ के तत्कालीन महाराजा सुमेरसिंह के नाम से सुमेरपुर बसाने की परिकल्पना शुरू हुई। ऊन्दरी के तत्कालीन जागीरदार बख्तावरसिंह ने सहमति जताई। बदले में तीन जागीरें चुनने का अवसर दिया। इसके बाद सुमेरपुर के पास जादरी गांव की जागीरी मिली। परिजनों को साथ लेकर जैसे ही ऊन्दरी सरहद लांघकर जाखोडा सरहद में प्रवेश किया। उस समय कुछ अपशकुन हुए।
बैलगाड़ी में विराजित जाखामाता की प्रतिमा खराब हो गई। रात्रि विश्राम वहीं किया। स्वप्न में पूर्वज स्थल नहीं छोड़ने का संकेत मिला, लेकिन जिद के धनी ठाकुर बख्तावरसिंह ने मूर्ति को वहीं स्थापित कर पूजन कर रवाना हो गए। यही स्थान जूना जाखामाता के नाम से जाना जाता है। अब नवीन स्वरुप में शिखरबद्ध मंदिर बना हुआ है। जहां इस परिवार के सदस्य जात देने आते हैं। आज भी उषापुरी गेट के आसपास वाला क्षेत्र को अधिकांश लोग ऊन्दरी के नाम से ही पुकारते हैं।
चालकों के लिए भी आस्था का केन्द्र
ब्यावर-पिंडवाड़ा फोरलेन निर्माण से पूर्व दिल्ली-अहमदाबाद राजमार्ग जाखानगर होते हुए सुमेरपुर में प्रवेश कर आगे जाता था। राजमार्ग से गुजरने वाले प्रत्येक वाहन चालक अपना वाहन रोककर माता की प्रतिमा को थोक लगाकर आगे निकलता था।
Published on:
01 Oct 2022 03:21 pm
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