
क्रोध व चिंता को रखें काबू में, बढ़ेगी रोग प्रतिरोधक क्षमता
पाली। व्यक्ति में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर वह जल्दी रोगों की चपेट में आ जाता है। यह क्षमता चिंता, क्रोध, व्यसन, तनाव, ठण्डा व दुषित भोजन करने, रात में जागने आदि से कम होती है। इसके अलावा वृद्ध व मधुमेह, कैंसर आदि के रोगियों व शल्य क्रियाओं के बाद कम हो जाती है। इसे हम आसानी से बढ़ा भी सकते है। जरूरत सिर्फ भोजन व दिनचर्या पर ध्यान देने की है। वैसे तो प्रोटीन, कारर्बोहाइड्रेड, वसा, मिनरल्स व विटामिन युक्त भोजन को संतुलित भोजन कहा जाता है। इससे कुपोषण दूर होता है, लेकिन रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं बढ़ती है।
आयुर्वेद में षड रस युक्त (छह रसों वाला) भोजन करना बताया गया है। इसमें मधुर, अम्ल, लवण, कटू, तिक्त और कषाय रस वाला भोजन होता है। भोजन शरीर की सप्त धातुओं का पोषण करने वाला, त्रिदोष शामक होने के साथ रुचिकर होना चाहिए। यह विविध वर्ण (हरा, पीला, लाल, सफेद, काला आदि रंगों का) युक्त होना चाहिए। इसके साथ ही भोजन में सभी मसाले यथा लौंग, कालीमिर्च, दालचीनी, तेजपत्ता, सोठ, हींग, जीरा, मैथी, हल्दी, धनिया, मिर्च, जायफल, जावित्री, अदरक व लहसून आदि होने चाहिए।
यह नहीं करना चाहिए
विरुद्ध आहार (जैसे दूध के साथ खटाई या नमक), अधिक या कम मात्रा में भोजन, अधिक ठण्डा या अधिक गर्म भोजन, असमय भोजन, रात में भोजन, जंक फूड, फास्ट फूड, फ्रिज के व्यंजन, खड़े या चलते हुए भोजन नहीं करना चाहिए।
यह करना चाहिए
भूख लगने पर एक तिहाई पेट भरने जितना ही भोजन करना चाहिए। भोजन दिन में दो से तीन बार करना चाहिए। रात्रि का भोजन सोने से तीन घंटे पूर्व कर लेना चाहिए। भोजन धीरे-धीरे व चबा-चबा कर करना चाहिए। भोजन को स्वाद के बजाय स्वास्थ्य ठीक रखने और जीवित रहने के उद्देश्य से करना चाहिए।
नींद लेना भी जरूरी
भोजन के बाद रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए नींद आवश्यक है। कम नींद लेने से प्रतिरक्षा प्रणाली और पाचनतंत्र कमजोर होता है। मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। कहा गया है अद्र्ध रोग हरि निंद्रा...इसका अर्थ है आधे रोग नींद हर लेती है। इसके साथ ही व्यायाम भी करना चाहिए।
Published on:
29 Apr 2020 02:48 pm
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