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खुद जीवित रहने के लिए निगल रहा औषधीय व लाभकारी वनस्पति

- पशु-पक्षियों व पर्यावरण के लिए खतरा बना विलायती बबूल- अपने आस-पास नहीं उगने देता वनस्पति

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पाली

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Suresh Hemnani

Nov 13, 2021

खुद जीवित रहने के लिए निगल रहा औषधीय व लाभकारी वनस्पति

खुद जीवित रहने के लिए निगल रहा औषधीय व लाभकारी वनस्पति

पाली/निमाज। काम का न काज का दुश्मन अनाज का... यूं तो यह कहावत खाली लोगों के लिए कही जाती रही है, लेकिन जिले समेत प्रदेश को हरा-भरा करने के उद्देश्य से उगाया गया एक हरा पौधा ऐसा भी है जो कि खुद जीवित रहने के लिए आसपास की लाभकारी व औषधीय वनस्पति को भी निगल रहा है। यह हरा पौधा है विलायती बबूल। इसका जिले में बढ़ता दायरा अन्य वनस्पति के लिए संकटकारी बन गया है। यह पौधा कंटीला होने से पशु-पक्षियों को ही नहीं, पर्यावरण के लिए भी खतरा बन गया है। लगभग तीन दशक पहले अरावली पर्वत शृंखला को हरा-भरा करने के लिए हेलीकॉफ्टर से विलायती बबूल के बीज बिखेरे गए थे। इन विलायती बबूल के पेड़ों से अरावली पर्वतमाला तो कम हरी हो पाई, लेकिन जिले के खेत, क्यार, जंगल इससे हरे हो चुके हैं। विलायती बबूल को यहां की जमीन इतरी रास आई कि इसके सामने अन्य दूसरी प्रजातियों के पौधों का अस्तित्व संकट में आ गया। इस कंटीले पौधों का दुष्प्रभाव अब जनजीवन पर भी पडऩे लगा है। ये कंटीले पौधे जीव-जंतु व पक्षी के लिए घातक होने के साथ ही पर्यावरण को भी निगल रहा है।

लाभकारी वनस्पति के लिए बना संकट
विलायती बबूल के पौधों के आसपास अन्य वनस्पति के साथ औषधीय पौधे गुग्गल, चिरमी, ग्वार पाठा, सफेद मूसली जैसी कई वनस्पतियों के लिए संकट बन गया है। सरकारी स्तर पर विलायती बबूल को हटाने का काम शुरू तो हुआ, लेकिन अंग्रेजी बबूल के पेड़ों के बढ़ते क्षेत्रफल के आगे निष्फल ही साबित हुआ है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के एक प्रोफेसर ने लंबे समय से विलायती बबूल के पर्यावरण और जैवविविधता पर दुष्प्रभाव का अध्ययन किया है। उन्होंने अपने रिसर्च में कहा कि विलायती बबूल भारत में आने के बाद अब तक देशी पेड़-पौधों की करीबन 500 प्रजातियों को खत्म कर चुका है।

फैक्ट फाइल
-12 मीटर तक होती है ऊंचाई
-10 सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं फलियां
-30 तक होती है फलियों में बीजों की संख्या
-10 साल उगने योग्य होता है इसका बीज

पशु पक्षियों को भी खतरा
विलायती बबूल में कांटे होने के कारण यह पशु पक्षियों के लिए नुकसानदेह रहता है। पशु हरा चारे की आस में इन कंटीले पौधों में फंस जख्मी होने के साथ ही पक्षी भी कांटों में फंसकर घायल हो जाते है। वन विभाग ने अलग-अलग योजनाओं के तहत राज्य योजना के तहत नाबार्ड, कैंपा डीएफएल जैसी अनेकों योजनाओं में विलायती बबूल के पेड़ों को हटाने की शुरुआत की, लेकिन ये सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं।

आसपास क्षेत्र में नहीं रहता कोई पेड़
विलायती बबूल के नीचे कोई पेड़ तो होना अलग बात है, लेकिन उसके नीचे घास भी नहीं उगती है। इससे पर्यावरण को भी नुकसान होता है। अरावली के आसपास के रहने वाले किसान कहते हैं कि पहले वो अपने पशुओं को पहाड़ में चरने के लिए छोड़ देते थे। उनके पशु वहां घास चरकर पल जाते थे। जब से अंग्रेजी बबूल के पेड़ लगाए हैं, पहाड़ों में घास भी नष्ट हो गई है। इसके नीचे दूसरे पेड़ भी खत्म हो गए हंै।

बबूल के कारण सडक़ें हो रही संकरी
विलायती बबूल के सडक़ किनारे लगने से इसकी झाडिय़ां सडक़ को घेर लेती हैं। इन झाडियों के कारण कई बार सडक पर घुमाव पर सामने से आना वाला वाहन दिखाई नहीं देता, जिससे दुर्घटना की आशंका रहती है।

यह है विलायती बबूल का इतिहास
वन विभाग ने अंग्रेजों के जमाने में भारत आए इजराइली बबूल की पौध को अरावली परियोजना में शामिल किया था। अरावली में आज इन्हीं पौधे की बनी कंटीली झाडिय़ों की भरमार है। पहले राजस्थान में कुछ स्थानों पर इसका सीमित उपयोग था, लेकिन वर्ष 1999 में जब यूरोपियन देशों की मदद से अरावली परियोजना शुरू की तब राजस्थान से लाकर इजराइली बबूल के पौधे को इंट्रोड्यूस किया गया। गांव-देहात में इसे विलायती कीकर भी कहा जाता है।

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