
राजस्थान का यह गांव शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध, सात समुंदर पार भी यहां बने रथ व मंदिर की है मांग
-मोतीलाल सिद्धावत
सुमेरपुर। पाली जिले के सुमेरपुर शहर से सटा छोटा सा गांव कोलीवाड़ा अपनी शिल्प कला के लिए आज दुनिया भर में ख्याति प्राप्त कर चुका है। गांव में निवास कर रहे सुथार समाज के कारीगरों के हाथ से बने रथ व मंदिर हजारों किलोमीटर दूर विदेशों में प्रसिद्ध हैं। आजादी से पूर्व पुरखों द्वारा छोडी गई विरासत को युवा वर्ग संभाले हुए है।
सुमेरपुर उपखण्ड का कोलीवाड़ा सुमेरपुर से मात्र 3 किलोमीटर दूर है। गांव में प्रवेश करते ही किसी शहर के औद्योगिक क्षेत्र की तरह नजर आता हैं। यहा सबसे अधिक देवासी समाज के लोग रहते हैं। इसके बाद मेघवाल समाज के लोग निवास करते हैं। सुथार समाज के भी लगभग सौ घर हैं। अधिकांश परिवार शिल्प कला के कार्य में जुटे हुए हैं।
सात समुंदर पार कोलीवाड़ा की पहचान
कोलीवाड़ा के जयंतीलाल सुथार बताते हैं कि कोलीवाड़ा में उनके कारखाने में एक साल में लगभग 10-15 स्वर्ण पॉलिश से निर्मित रथ बनाए जाते हैं। जैन धर्म के देश के किसी भी भाग में होने वाले बड़े धार्मिक कार्यक्रम के लिए उनके यहां से निर्मित रथ ही उपयोग में लिए जाते हैं। यहां पर मुम्बई समेत अन्य प्रदेशों से विशेष प्रशिक्षित कारीगरों को बुलाया जाता है। जो सोने की नक्काशी कर रथ को भव्य रूप देते हैं। दक्षिण भारत समेत दिल्ली से भी ऑर्डर आते हैं। वे बताते हैं कि उनके पुरखे इस कार्य में लगे थे। रियासतकाल में राजा-महाराजाओं के रथ का निर्माण उनके पूर्वज पूनमचंद सुथार ही करते थे। उनके बाद अंग्रेजों के आने पर उनके लिए विशेष रूप से तांगे बनाए जाते थे।
गांव में दस कारखानों से हजारों को मिल रहा रोजगार
कोलीवाड़ा में पिछले तीन दशक से कार्य में जुटे लक्ष्मण सुथार ने बताया कि कोलीवाड़ा में मूर्तिकला, मंदिरों की सजावट, विशेष रथ, सिंहासन, मुकुट, कवच समेत कई प्रकार की सामग्री का निर्माण होता है। यहां के प्रवीणकुमार सुथार को राजस्थान का श्रेष्ठ शिल्पी होने का गौरव प्राप्त है। वर्ष 2004-05 में जयपुर में आयोजित प्रदेश स्तरीय समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उन्हें श्रेष्ठ शिल्पकार के रूप में सम्मानित किया था। नैरोबी, सिगंापुर, दुबई आदि देशों में यहां के मंदिर आज भी गांव की याद दिलाते हैं। गांव के पूनमचंद, डूंगाराम, रताराम व वीशाराम सुथार ने सबसे पहले कार्य की शुरूआत की थी। इनके हाथों के हुनर को देखकर अंग्रेज की दांतों तले अंगुली दबाने को विवश हो गए थे। कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में भी कोलीवाड़ा के शिल्पकारों की याद ताजा करती है। आज इनके वंशज कार्य को आगे बढाने में जुटे हैं। विशेष बात तो यह है कि सभी कार्य हाथ से किया जाता है। गांव के खेताराम, खुमाराम, गोविंदराम, जगदीशभाई, भवानीशंकर, रमेशकुमार, नारायणलाल, मोहनलाल के नेतृत्व में दिनरात कारीगर रथ व मंदिर समेत विभिन्न सामग्री को तैयार करने में जुटे हैं।
छोटा सा गांव, फिर भी दो कॉलेज
कोलीवाडा ग्राम पंचायत मुख्यालय होने के कारण एक राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उप स्वास्थ्य केन्द्र चल रहा है। सुमेरपुर-जवाईबांध स्टेशन मुख्य मार्ग से गांव तक पहुंचने के लिए डामरीकृत सडक़ है। गांव में प्रवेश करते ही किसी शहर का अहसास होता हैं। छोटा सा गांव होने के बावजूद यहा अरावली पीजी कॉलेज है। वही हिलग्रोव कॉलेज भी संचालित होता है। इसके अलावा श्रीराम गोशाला एक ट्रस्ट के माध्यम से संचालित होती है। जिसमें लगभग एक हजार से भी अधिक गोवंश पल रहा है। महात्मा ज्योतिबा फुले राष्ट्रीय अनाथालय-वृद्धाश्रम का कार्य भी प्रगति पर है। गांव के बाहरी इलाके में आस्था वैदिक संस्थान की ओर से विजय अक्षर वन का निर्माण करवाया। संस्था संचालक नरेन्द्र आस्था व कमलेश परिहार ने बताया कि इस उद्यान में आयुर्वेद को बढावा देने के लिए सैकडों प्रकार के औषधीय पौधे लगाए गए हैं।
Published on:
04 Apr 2019 02:03 pm
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