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World Autism Day: योद्धा बन हरा दिया ऑटिज्म को, जयपुर के अक्षय ने हासिल की सरकारी नौकरी

World Autism Awareness Day 2026: ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि अलग तरीके से दुनिया को समझने का रूप है। ऐसे बच्चे कम नहीं होते। वे ओर से अलग होते हैं। उन्हें जरूरत होती है समझ, धैर्य और सही मार्गदर्शन की।

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पाली

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Santosh Trivedi

Apr 02, 2026

अक्षय भटनागर

अक्षय भटनागर

World Autism Awareness Day 2026: ऑटिज्म को एक बीमारी नहीं कहना चाहिए। यह एक विकार है। जो व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार, संवाद व सीखने को प्रभावित करता है। इस बीमारी से ग्रसितों का मस्तिष्क सामान्य व्यक्ति की तुलना में अलग तरह से कार्य करता है, जिससे इनका व्यवहार व समझ भी अलग होती है। उनमें बोलने, समझने की कठिनाई होती है। वे देखकर दोहराते नहीं हैं। दिनचर्या में बदलाव से परेशान होते हैं। ऐसे बच्चों को लोग हीन भावना से भी देखने लगते हैं, जबकि यदि उनको सही मार्गदर्शन दिया जाए तो वे आसमान छू सकते है। ऐसे ही दो युवाओं की कहानी हम आपको बता रहे हैं।

अक्षय ने संघर्ष से पाया मुकाम

जयपुर के मानसरोवर निवासी अक्षय भटनागर ऑटिज्म से प्रभावित हैं। उन्होंने 12 साल से अधिक तक संघर्ष कर सरकारी नौकरी हासिल की और आज वे सचिवालय में सीनियर क्लर्क है। अक्षय जब महज 2-3 साल के थे तब पता चला कि वे ऑटिज्म से पीड़ित है।

स्कूल व कॉलेज में पढ़ाई के दौरान समस्याएं आई। उनकी मां को सिस्टम से परेशान होकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। उनकी मां प्रतिभा भटनागर ने बताया कि 12 बार कोर्ट में इन्हें ऑटिज्म श्रेणी में आवेदन करने के लिए याचिकाएं दायर करनी पड़ी। प्रतियोगी परीक्षा में पास होकर अक्षय ने ऑटिज्म दिव्यांग कोटे से क्लर्क की नौकरी हासिल की।

मां-पिता ने किया सपोर्ट आदित बन गया आत्मनिर्भर

महाराष्ट्र के पुणे में रहने वाला आदित मुरूगकर महज 20 साल का है। उसका स्वयं का स्टार्टअप है। उसके माता-पिता ने ऑटिज्म का पता लगने पर ही बेटे को आत्मनिर्भर बनाने का सपना बुन लिया। उसे वे नए शहरों में ले जाते। नए लोगों से मिलाते। उनसे संवाद कराते। उसे पियानो, जेम्बे और तबला बजाना सिखाया।

उसने 12वीं के बाद बीएससी ग्राफिक डिजाइन की पढ़ाई की। इसके बाद खुद का स्टार्टअप शुरू किया। आज वह उपहार सामग्री का डिजाइन व प्रिंटिंग करता है। उसे असिस्टेक फाउंडेशन से इमेजिनेट फ़ेलोशिप भी मिली। जिसमें व्यवसाय विकास के लिए 9 महीनों तक प्रशिक्षण मिलेगा।

टॉपिक एक्सपर्ट

ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि अलग तरीके से दुनिया को समझने का रूप है। ऐसे बच्चे कम नहीं होते। वे ओर से अलग होते हैं। उन्हें जरूरत होती है समझ, धैर्य और सही मार्गदर्शन की। कई बार सामाजिक छवि के डर से परिवार ऑटिज्म से जुड़े बच्चों को घर तक सीमित कर देते हैं।

इससे बच्चों को सीखने, लोगों से जुड़ने और अपनी क्षमताएं दिखाने के अवसर नहीं मिल पाते। जबकि सही एक्सपोजर, स्वीकार्यता और समर्थन मिलने पर यही बच्चे आगे बढ़ते हैं। ऑटिज्म के बाद भी कई बच्चे आज सरकारी नौकरी कर रहे है। पैरा-ओलंपिक खेलों में और कलाकार के रूप में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं।

  • वैभव भंडारी, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट